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पेपर लीक पर छात्रों का फूटा गुस्सा, चौतरफा संकट में घिरी मोदी सरकार

नीट और पेपर लीक के विरोध में दिल्ली से पटना तक सड़कों पर उतरी 'Gen Z', विपक्ष के तीखे तेवरों और पुलिस कार्रवाई से गरमाई देश की राजनीति।


Srini se Samvad: 20 जुलाई को पेपर लीक और नीट (NEET) जैसी धांधलियों के खिलाफ छात्रों ने संसद तक पैदल मार्च निकाला। इस दौरान दिल्ली की सड़कों पर पुलिस द्वारा चलाए गए वाटर कैनन, आंसू गैस और लाठीचार्ज के बाद लगभग 14 साल बाद (निर्भया कांड और किसान आंदोलन के बाद) ऐसा मंजर देखने को मिला। लेकिन अब यह आक्रोश सिर्फ सड़कों तक सीमित नहीं है, बल्कि संसद से लेकर प्रधानमंत्री आवास के दरवाजों तक पहुँच चुका है।


मंगलवार को राहुल गांधी, प्रियंका गांधी, अखिलेश यादव और उद्धव ठाकरे जैसे दिग्गज विपक्षी नेताओं ने प्रधानमंत्री आवास के बाहर अचानक विरोध प्रदर्शन किया और छात्रों पर हुई पुलिस कार्रवाई के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। आखिर भारतीय राजनीति में छात्रों के इस आंदोलन से क्या बड़ा बदलाव आने वाला है? क्या 12-13 सालों में पहली बार मोदी सरकार किसी ऐसे जनांदोलन से घिरी है, जिसकी उसने उम्मीद भी नहीं की थी?

'द फेडरल' के खास कार्यक्रम 'श्रीनी से संवाद' में संपादक-इन-चीफ एस. श्रीनिवासन के साथ हुई विश्लेषणात्मक चर्चा के आधार पर विस्तृत खबर:

'श्रीनि से संवाद' की विशेष विश्लेषणात्मक रिपोर्ट

1. 2011-12 का अन्ना आंदोलन बनाम 2026 का 'Gen Z' छात्र आंदोलन
'द फ़ेडरल' के एडिटर-इन-चीफ़ एस. श्रीनिवासन के अनुसार, 2011-12 के भ्रष्टाचार विरोधी (अन्ना हजारे) आंदोलन और वर्तमान छात्र आंदोलन में बड़ा बुनियादी अंतर है:

2011-12 की स्थिति: उस समय यूपीए-2 सरकार लगातार घोटालों (2G, कोल स्कैम, कॉमनवेल्थ) और नीतिगत अपंगता से ढलान पर थी। उस आंदोलन को बाहर से विपक्षी दलों (भाजपा/आरएसएस) का राजनीतिक और संगठनात्मक समर्थन प्राप्त था।

वर्तमान स्थिति: मोदी सरकार राजनीतिक और प्रशासनिक रूप से अत्यंत मजबूत स्थिति में मानी जाती रही है। ऐसे माहौल में बिना किसी बड़े राजनीतिक दल के आह्वान के 40,000 से 50,000 युवाओं और अभिभावकों का अचानक दिल्ली के बीचों-बीच सड़कों और जंतर-मंतर पर उतर आना सरकार और खुफिया तंत्र के लिए पूरी तरह अप्रत्याशित रहा।

2. पुलिस की बर्बरता, एफआईआर और कोर्ट का रुख
छात्रों पर कार्रवाई: जंतर-मंतर से संसद की ओर बढ़ रहे छात्रों पर लाठीचार्ज, वाटर कैनन और आंसू गैस का प्रयोग किया गया। कई छात्र गंभीर रूप से घायल हुए, जिनमें से कुछ की आंखों में पेलेट/चोटें आई हैं और वे अस्पताल में भर्ती हैं।

प्रशासनिक रुख: दिल्ली पुलिस ने करीब 10 एफआईआर दर्ज की हैं और सीसीटीवी फुटेज खंगालकर छात्रों पर कार्रवाई की बात कह रही है। दूसरी तरफ सोनम वांगचुक और अन्य नेताओं ने मांग की है कि गिरफ्तार छात्रों को रिहा किया जाए और एफआईआर रद्द की जाएं।

सुप्रीम कोर्ट और सीजेआई की टिप्पणी: पुलिस कार्रवाई और याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान सीजेआई सूर्यकांत के बयानों को लेकर भी विवाद गरमाया। सीजेआई द्वारा यह कहे जाने पर कि "हमारा और अपना समय बर्बाद न करें, यह प्रशासनिक मामला है", विपक्षी दलों और छात्र संगठनों में नाराजगी देखी गई।

3. विपक्ष की आक्रामक रणनीति और राहुल गांधी की 3 मुख्य मांगें
विपक्ष इस छात्र आंदोलन को सरकार के खिलाफ सबसे बड़ा हथियार बना रहा है:

छापेमारी शैली में प्रदर्शन: मल्लिकाअर्जुन खड़गे के आवास से अचानक निकलकर राहुल गांधी, प्रियंका गांधी और अखिलेश यादव का प्रधानमंत्री आवास (7, लोक कल्याण मार्ग) के बाहर धरने पर बैठना सरकार के लिए पूरी तरह से हैरान करने वाला कदम था।

राहुल गांधी की तीन प्रमुख मांगें:

केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का तत्काल इस्तीफा।

छात्रों पर बर्बर लाठीचार्ज कराने वाले दोषी अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा पीड़ित छात्रों और युवाओं से सार्वजनिक रूप से माफी।

4. देशव्यापी फैलाव और 'Gen Z' का गहरा आर्थिक आक्रोश
यह आक्रोश अब सिर्फ दिल्ली तक सीमित नहीं है। पटना, देहरादून, वाराणसी, लखनऊ, नागपुर, इंदौर और जयपुर जैसे शहरों में भी छात्र सड़कों पर हैं। पटना में भी छात्रों पर वाटर कैनन और लाठीचार्ज किया गया।

एस. श्रीनिवासन के विश्लेषण के अनुसार, नीट और पेपर लीक तो सिर्फ एक 'चिंगारी' (Trigger Point) है, असली वजह युवाओं के भीतर सालों से जमा हो रहा असंतोष है:

अटकी भर्ती परीक्षाएं: नीट और यूपीएससी के अलावा राज्यों की पटवारी और राज्य लोक सेवा आयोग (PSC) की परीक्षाएं सालों-साल अटकी रहती हैं या उनके पेपर लीक हो जाते हैं।

बेरोजगारी और कम वेतन: डिग्री पूरी करने के बाद भी युवाओं को उनकी योग्यता के अनुसार नौकरियां नहीं मिल रही हैं। वेतन वृद्धि ठप है और जीवन यापन की लागत (Cost of Living) लगातार बढ़ रही है।

महंगाई और वैश्विक दबाव: इंटरनेट, ट्रांसपोर्ट, ओटीटी से लेकर दैनिक जरूरतें महंगी हुई हैं। वैश्विक स्तर पर रूस-यूक्रेन व ईरान-अमेरिका संघर्ष के कारण तेल/एलपीजी के दाम और अमेरिकी टैरिफ नीतियों का असर भारत की अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है।

तकनीकी बदलाव (AI का असर): आईटी और सर्विसेज सेक्टर में एआई (AI) के आने से नई नौकरियों पर संकट खड़ा हो गया है, जबकि मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर पर्याप्त रोजगार पैदा नहीं कर पा रहा है।

5. संस्थागत विफलता
चर्चा में इस बात पर जोर दिया गया कि देश के प्रमुख स्तंभ—चाहे वह मुख्यधारा का मीडिया (Godi Media) हो, न्यायपालिका हो या प्रशासनिक व्यवस्था—युवाओं की समस्याओं को हल करने और उनकी आवाज को सही मंच देने में विफल रहे हैं। इसी कारण युवाओं का भरोसा मुख्यधारा की संस्थाओं से उठ रहा है और वे सड़कों पर उतरने को मजबूर हुए हैं।

12-13 सालों के कार्यकाल में मोदी सरकार के सामने यह सबसे बड़ा सामाजिक और राजनीतिक संकट बनकर उभरा है। यदि सरकार ने बल प्रयोग के बजाय संयम और युवाओं से सीधी बातचीत का रास्ता नहीं अपनाया, तो 'Gen Z' का यह आक्रोश आने वाले दिनों में देश की राजनीति का रुख बदल सकता है।


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