
क्षेत्रीय दल कमजोर-बीजेपी मजबूत, असम में नया राजनीतिक ट्रेंड
असम चुनाव 2026 के नतीजों ने बदलती सियासत का संकेत मिल रहे हैं, जहां ध्रुवीकरण, कमजोर विपक्ष और बीजेपी की रणनीति ने नए राजनीतिक समीकरण गढ़े।
2026 के असम विधानसभा चुनाव के नतीजों ने राज्य की राजनीति में एक नई बहस छेड़ दी है। सवाल यह है कि क्या मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा वोटों को धार्मिक आधार पर संगठित करने में सफल रहे हैं, और क्या राज्य की चुनावी तस्वीर में कोई गहरा बदलाव आया है?
नतीजों में दिखा स्पष्ट पैटर्न
चुनाव परिणामों में खासकर अपर असम की कई सीटों पर एक दिलचस्प ट्रेंड देखने को मिला। कांग्रेस नेतृत्व वाले विपक्ष के कई प्रमुख हिंदू चेहरे हार गए, जबकि केवल दो उम्मीदवार ही जीत दर्ज कर सके।जय प्रकाश दास (नौबोइचा) और अखिल गोगोई (शिवसागर)। नौबोइचा सीट अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित है, लेकिन यहां मुस्लिम वोटरों की अच्छी-खासी संख्या है, जिससे यह नतीजा और जटिल हो जाता है। वहीं, अखिल गोगोई की जीत उनके मजबूत स्थानीय आधार के कारण पहले से अनुमानित मानी जा रही थी।
धार्मिक ध्रुवीकरण पर बढ़ी चिंता
संयुक्त विपक्ष की सीमित जीत में केवल दो विजेता हिंदू समुदाय से होना, बीजेपी के उस दावे को मजबूत करता है कि असम में विपक्ष अब मुख्यतः अल्पसंख्यक क्षेत्रों तक सीमित होता जा रहा है।हालांकि, राजनीतिक विश्लेषक प्रसेनजीत बिस्वास इसे केवल सांप्रदायिक नजरिए से देखने के खिलाफ चेतावनी देते हैं। उनके मुताबिक, “समाज को हिंदू बनाम मुस्लिम के रूप में देखना गलत होगा, खासकर तब जब किसी पार्टी को भारी जनादेश मिला हो।”उन्होंने यह भी कहा कि मुस्लिम आबादी के अनुपात के मुकाबले विधानसभा में उनका प्रतिनिधित्व अभी भी कम है।
विकल्पों की कमी का असर
अल्पसंख्यक नेता इकरामुल हुदा का मानना है कि वोटिंग पैटर्न का कारण विपक्ष की कमजोरी भी है।उनके अनुसार, “कांग्रेस को मिलने वाला अल्पसंख्यक समर्थन उसकी ताकत से ज्यादा विकल्पों की कमी का परिणाम है। पहले कुछ हद तक ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट पर भरोसा था, लेकिन अब वह कमजोर पड़ गया है।” उन्होंने परिसीमन (delimitation) के असर की ओर भी इशारा किया। मुस्लिम बहुल सीटों की संख्या 32 से घटकर 22 हो गई है, जिससे चुनावी गणित बदला है।
हिंदू वोटरों का झुकाव बीजेपी की ओर
कांग्रेस और बीजेपी के सीधे मुकाबले में कांग्रेस को केवल उन्हीं सीटों पर सफलता मिली, जहां मुस्लिम वोटरों की संख्या ज्यादा थी—जैसे धुबरी, बिरसिंह जरुआ, समागुरी और करीमगंज नॉर्थ।इन क्षेत्रों में जनसंख्या का संतुलन ही चुनावी नतीजों को प्रभावित करता है। उदाहरण के तौर पर, धुबरी में करीब 75% मुस्लिम और 24% हिंदू मतदाता हैं।हुदा के अनुसार, “बीजेपी को हिंदू वोटरों का मजबूत समर्थन मिलता है, जिससे वह इन सीटों पर दूसरे स्थान पर रहती है, लेकिन कांग्रेस की जीत का अंतर काफी बड़ा होता है।”
क्षेत्रीय दलों का घटता प्रभाव
इन चुनावों में ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट का प्रभाव काफी कम होता दिखा। पार्टी सिर्फ दो सीटें जीत पाई, हालांकि इसके प्रमुख बदरुद्दीन अजमल ने बिनाकांडी सीट बरकरार रखी।वहीं, असम गण परिषद जैसी क्षेत्रीय पार्टी भी कमजोर होती दिखी। NDA का हिस्सा होने के बावजूद उसकी सफलता दर बीजेपी और बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट के मुकाबले कम रही।एक वरिष्ठ AGP नेता ने नाम न छापने की शर्त पर कहा कि उन्हें अक्सर कठिन सीटें दी जाती हैं, जबकि बीजेपी मजबूत सीटों पर चुनाव लड़ती है।
बीजेपी की रणनीति बनी सफलता की कुंजी
बीजेपी ने पहचान की राजनीति को विकास और कल्याणकारी योजनाओं के साथ जोड़कर व्यापक वर्गों तक पहुंच बनाई है।विश्लेषक बिस्वास के अनुसार, यह “डुअल स्ट्रैटेजी”—सांस्कृतिक पहचान और सुशासन का मिश्रण—बीजेपी को राज्य की प्रमुख राजनीतिक ताकत बनाने में सफल रही है।
बदलती सियासत का संकेत
इन नतीजों से साफ है कि असम की राजनीति एक नए दौर में प्रवेश कर रही है। पारंपरिक वोट बैंक कमजोर पड़ रहे हैं, गठबंधन बदल रहे हैं और मतदाता अब पहचान, विकास और रणनीति तीनों के आधार पर वोट कर रहे हैं।आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या यह बदलाव स्थायी रूप लेता है या फिर राजनीतिक समीकरण एक बार फिर करवट लेते हैं।

