
बंगाल चुनाव में इतिहास बनाम वोट की जंग तेज,नैहाटी बना रणक्षेत्र
बंगाल चुनाव में बंकिम चंद्र की विरासत को लेकर बीजेपी और टीएमसी आमने-सामने हैं, नैहाटी सीट पर सांस्कृतिक पहचान बनाम राजनीति की बहस तेज हो गई है।
पश्चिम बंगाल की राजनीति में पहले “वंदे मातरम” को लेकर घमासान था, अब इस गीत के रचयिता बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय को लेकर सियासी जंग तेज हो गई है। पिछले साल राष्ट्रीय गीत “वंदे मातरम” की 150वीं वर्षगांठ के मौके पर भारतीय जनता पार्टी और तृणमूल कांग्रेस के बीच टकराव देखने को मिला था, जिसमें नरेंद्र मोदी भी शामिल थे। अब जैसे-जैसे राज्य में 29 अप्रैल को विधानसभा चुनाव के दूसरे चरण की वोटिंग नजदीक आ रही है, फोकस बंकिम चंद्र पर आ गया है।
नैहाटी सीट बनी केंद्र
दक्षिण बंगाल के नॉर्थ 24 परगना जिले की नैहाटी विधानसभा सीट इस सियासी बहस का केंद्र बन गई है। यहां सत्तारूढ़ टीएमसी और मुख्य विपक्षी बीजेपी, दोनों ही 19वीं सदी के इस महान साहित्यकार की विरासत को अपने-अपने पक्ष में इस्तेमाल करने की कोशिश कर रहे हैं।
नैहाटी 2011 से टीएमसी का गढ़ रही है, लेकिन इस बार बीजेपी ने बंकिम चंद्र के वंशज सुमित्रा चट्टोपाध्याय को मैदान में उतारकर चुनाव को दिलचस्प बना दिया है। बीजेपी नेता अपने प्रचार में लगातार उनके पारिवारिक संबंध को उभारते हुए इसे राष्ट्रवाद और सांस्कृतिक विरासत से जोड़ रहे हैं, खासतौर पर “वंदे मातरम” की विरासत के साथ।
ऐतिहासिक महत्व और जड़ें
नैहाटी का बंकिम चंद्र से गहरा ऐतिहासिक रिश्ता है। यहां के कांथलपाड़ा इलाके में स्थित उनका पैतृक घर आज भी एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक धरोहर माना जाता है। इतिहासकारों और क्यूरेटरों के अनुसार, यह सिर्फ एक निजी मकान नहीं, बल्कि राष्ट्रीय बौद्धिक विरासत का प्रतीक है।
इसी घर में बंकिम चंद्र ने अपनी साहित्यिक यात्रा को आकार दिया और “वंदे मातरम” जैसे ऐतिहासिक गीत की रचना की। पीढ़ियों से यह स्थान बंगाल के साहित्यिक पुनर्जागरण और राष्ट्रवादी विचारधारा का प्रतीक रहा है।
चुनावी राजनीति में विरासत का इस्तेमाल
मौजूदा चुनावी माहौल में बंकिम चंद्र की विरासत को राजनीतिक संदेश के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा है। बीजेपी इसे अपने राष्ट्रवादी एजेंडे से जोड़कर पेश कर रही है, जबकि टीएमसी इस पर कड़ा विरोध जता रही है। टीएमसी का आरोप है कि बीजेपी साहित्यकार की छवि का चयनात्मक राजनीतिक इस्तेमाल कर रही है।टीएमसी नेताओं ने यह भी कहा कि सांस्कृतिक प्रतीकों के बजाय उम्मीदवारों की जवाबदेही पर ध्यान दिया जाना चाहिए।
विरासत बनाम राजनीति
इतिहासकारों और शिक्षाविदों का मानना है कि बंकिम चंद्र को केवल वर्तमान राजनीति के नजरिए से देखना सही नहीं है। उनके अनुसार, वे भले ही अपने समय की धार्मिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि से जुड़े थे, लेकिन उनका साहित्यिक और दार्शनिक योगदान कहीं अधिक व्यापक है।एक विशेषज्ञ ने कहा, “बंकिम चंद्र निश्चित रूप से हिंदू थे, लेकिन उन्हें केवल राजनीतिक नजरिए से समझना उनके व्यापक योगदान को सीमित कर देता है।”
मतदाताओं में बंटे विचार
जमीनी स्तर पर नैहाटी के मतदाता भी बंटे हुए नजर आते हैं। कुछ लोग बंकिम चंद्र को शहर की पहचान मानते हैं, जबकि अन्य का कहना है कि चुनाव में मौजूदा विकास और शासन के मुद्दों पर ज्यादा ध्यान होना चाहिए।नैहाटी की यह चुनावी लड़ाई दिखाती है कि बंगाल के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक प्रतीक आज भी राजनीति को गहराई से प्रभावित करते हैं। यहां चुनाव प्रचार 27 अप्रैल को समाप्त होगा, जबकि मतदान 29 अप्रैल को राज्य की 141 अन्य सीटों के साथ कराया जाएगा। पहले चरण का मतदान 23 अप्रैल को हो चुका है।

