बंगाल चुनाव 2026: दिल्ली की वर्कशॉप छोड़, वोट डालने गाँव भागे कारीगर
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बंगाल चुनाव 2026: दिल्ली की वर्कशॉप छोड़, वोट डालने गाँव भागे कारीगर

दिल्ली के करोल बाग में रहने वाले बंगाली कारीगरों ने चुनाव पर तोड़ी चुप्पी। बेरोजगारी, 'कट मनी' और असुरक्षा को बताया बड़ा मुद्दा। इस बार बदलाव के लिए करेंगे वोट।


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West Bengal Elections 2026: पश्चिम बंगाल में आज लोकतंत्र का सबसे बड़ा त्योहार शुरू हो गया है। पहले चरण की वोटिंग पूरी होने जा रही है। लेकिन इस चुनावी शोर की धमक सिर्फ बंगाल की गलियों तक ही सीमित नहीं है। दिल्ली के करोल बाग की उन तंग गलियों में भी आज अजीब सा सन्नाटा है, जहाँ कभी दिन-रात सोने-चांदी को तराशने की आवाजें गूँजती थीं। यहाँ की ज्वेलरी वर्कशॉप में काम करने वाले हजारों बंगाली कारीगर आज दिल्ली में नहीं, बल्कि अपने गाँव के पोलिंग बूथ पर खड़े हैं।


ये वे लोग हैं जो सालों से दिल्ली में रहकर अपनी मेहनत से दूसरों का श्रृंगार कर रहे हैं। लेकिन आज ये लोग अपने राज्य की तकदीर तराशने के लिए बंगाल पहुँचे हैं। इन कारीगरों से बात करने पर जो दर्द और उम्मीदें निकलकर सामने आती हैं, वे किसी भी पत्थर दिल को पिघला सकती हैं। इनके लिए वोट सिर्फ एक बटन दबाना नहीं, बल्कि बरसों से घर से दूर रहने की मजबूरी का जवाब देना है।

खाली होती वर्कशॉप और भारी मन
करोल बाग में ज्वेलरी वर्कशॉप चलाने वाले नवीन पाल पिछले 35 सालों से दिल्ली में बसे हुए हैं। वे मूल रूप से हुगली के रहने वाले हैं। नवीन बताते हैं कि उनकी वर्कशॉप के लगभग सभी 17 कारीगर इस बार वोट डालने के लिए बंगाल चले गए हैं। नवीन खुद अब दिल्ली के वोटर हैं, पर उनका मन आज भी हुगली की उन गलियों में अटका है जहाँ उनका बचपन बीता।

नवीन पाल की मानें तो इस बार बंगाल का माहौल कुछ अलग है। वे कहते हैं कि लोग अब किसी चेहरे को नहीं, बल्कि काम को देख रहे हैं। उनके जानने वाले और रिश्तेदार फोन पर सिर्फ एक ही बात कहते हैं कि अब बहुत हुआ, अब कुछ बदलाव चाहिए।

घर से सैकड़ों मील दूर रहने का असली दर्द
हुगली के रहने वाले आलोक कुमार पिछले 30 सालों से दिल्ली की इन गलियों में अपनी जिंदगी खपा रहे हैं। आलोक से जब हमने पूछा कि वे क्यों दिल्ली आए, तो उनकी आँखों में एक नमी सी तैर गई। वे बोले, "साहब, कौन अपना घर-बार छोड़कर दूर परदेस में रहना चाहता है? अगर बंगाल में काम होता, तो हम क्यों यहाँ की धूल छानते?"

आलोक का कहना है कि बंगाल में खेती का बुरा हाल है। ममता सरकार की नीतियों की वजह से आलू और धान को राज्य से बाहर नहीं भेजने दिया जाता। इससे वहाँ के किसानों को सही दाम नहीं मिलता। जब पेट नहीं भरता, तो हाथ में हुनर होने के बाद भी कारीगर को परदेस भागना पड़ता है।

'कट मनी' और हर कदम पर रिश्वत की दीवार
करोल बाग के एक और कारीगर पुलक सबंत ने भ्रष्टाचार का जो कड़वा सच बताया, वह सुनकर आम आदमी दंग रह जाए। पुलक कहते हैं कि बंगाल में आज अपनी कमाई से पक्का घर बनाना भी एक सजा जैसा है। जैसे ही आप घर के लिए ईंट या सीमेंट गिरवाते हैं, पार्टी के लोग 'कट मनी' मांगने पहुँच जाते हैं।

पुलिस हो या स्थानीय नेता, हर छोटे काम के लिए उन्हें 'चाय-पानी' देना पड़ता है। बिना रिश्वत दिए वहाँ कोई गरीब अपनी मर्जी से चैन की सांस नहीं ले सकता। इसी 'सिंडिकेट राज' से तंग आकर हजारों कारीगरों ने इस बार ठान लिया है कि वे वोट से इसका जवाब देंगे।

बहू-बेटियों की सुरक्षा और रात का डर
बर्धमान के रहने वाले समीर घोष की चिंता सुरक्षा को लेकर सबसे ज्यादा है। समीर बताते हैं कि बंगाल में आज भी आए दिन होने वाले झगड़े और राजनीतिक हिंसा ने लोगों को डरा कर रखा है। उनका कहना है कि राज्य में महिलाओं के खिलाफ अपराध बढ़ रहे हैं। समीर ने बड़े सरल शब्दों में कहा, "हमें ऐसी सरकार चाहिए जो हमें शांति से सोने दे। हमें डराया न जाए।" समीर को लगता है कि भाजपा इस बार एक मजबूत विकल्प बनकर उभरी है और लोग अब गुमराह नहीं होना चाहते।

धमकी भरी राजनीति और रात के अंधेरे का सच
आलोक कुमार ने एक और गंभीर बात साझा की। उन्होंने बताया कि बंगाल में आज भी डराकर वोट लेने का पुराना खेल जारी है। रात के अंधेरे में घर-घर जाकर धमकियां दी जाती हैं कि अगर फलां पार्टी को वोट नहीं दिया, तो गाँव में रहना मुश्किल कर देंगे। हालांकि चुनाव आयोग ने फोर्स तैनात की है, पर गाँव के भीतर का जो डर लोगों के खून में घुला हुआ है, उसे निकालने के लिए इस बार बड़े बदलाव की जरूरत है।

पहली बार वोट डालने की नई उम्मीद
बांकुरा के रहने वाले युवा सुरजीत कर्मकार के लिए यह चुनाव बहुत खास है। वे पहली बार वोट डालने जा रहे हैं। वे राजधानी एक्सप्रेस से अपने गाँव रवाना हो चुके हैं। सुरजीत जैसे युवा अब बड़े-बड़े नारों या भाषणों के चक्कर में नहीं आना चाहते। उन्हें ठोस काम चाहिए। उन्हें अच्छी शिक्षा चाहिए। वे चाहते हैं कि आने वाली पीढ़ी को उनके जैसा कष्ट न झेलना पड़े। उनका कहना है कि वह विकास के नाम पर वोट करेंगे।

नौकरी और शिक्षा की बेहतर राह की तलाश
प्रवासी कारीगरों की एक ही पुकार है "हमें अपने घर वापस लौटना है।" वे चाहते हैं कि बंगाल में ऐसी कंपनियां और फैक्ट्रियां लगें जहाँ उन्हें सम्मान के साथ काम मिले। वे नहीं चाहते कि उनके बच्चे भी दिल्ली या मुंबई की गलियों में अपनी जवानी गुजारें। शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं का जो बुरा हाल है, उसे सुधारने के लिए ये प्रवासियों का जत्था इस बार कमर कसकर बंगाल पहुँचा है।

परिवर्तन की लहर या पुरानी सरकार का भरोसा?
दिल्ली में रहने वाले इन बंगालियों का मानना है कि इस बार मुकाबला बराबरी का है। टीएमसी जहाँ अपने पुराने किलों को बचाने की कोशिश में है, वहीं भाजपा ने 'सोनार बांग्ला' के सपने के साथ लोगों के दिलों में जगह बनाई है। प्रवासियों को लगता है कि बंगाल का विकास तभी मुमकिन है जब सत्ता में ऐसा बदलाव आए जो दिल्ली और दूसरे बड़े राज्यों जैसा काम करके दिखाए।

साहिब की मजबूरी: जो नहीं जा पाए
वर्कशॉप में काम करने वाले साहिब की व्यथा अलग है। उनके साथी तो गाँव चले गए, पर उन्हें दुकान की जिम्मेदारी के लिए दिल्ली रुकना पड़ा। साहिब का कहना है कि उन्हें अफसोस है कि वे इस बार अपनी उंगली पर स्याही नहीं लगवा पाए, लेकिन उनका दिल अपने उन्हीं साथियों के साथ धड़क रहा है जो आज बंगाल के भविष्य का फैसला कर रहे हैं।

आम नागरिक की जीत हो
करोल बाग के इन कारीगरों की बातें सुनकर एक बात साफ हो जाती है कि बंगाल का चुनाव सिर्फ पार्टियों की लड़ाई नहीं है। यह उन हजारों मजदूरों, किसानों और कारीगरों की लड़ाई है जो एक बेहतर कल की तलाश में हैं।
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