टीएमसी को लेकर ये दावा किया गया कि प्रदेश की महिला वोटर दीदी के साथ है क्योंकि उन्हें हर महीने 1500 रूपये दिए गए हैं, जब अन्य प्रदेशों में ये स्कीम सत्ता पक्ष के समर्थन में काम करती है तो फिर बंगाल में क्यों नहीं? लेकिन परिणाम इसके उल्ट आये यानी महिलाओं ने पूर्ण रूप से दीदी को वोट नहीं किया।
वो मुद्दे जिनको ग्राउंड पर मौजूद टीएमसी के कार्यकर्त्ता और तमाम नेता भाप नहीं सके वो रहे सत्ता विरोधी लहर, महिला सुरक्षा, बांग्लादेश में शेख हसीना के तख्ता पलट के बाद हिन्दुओं का नरसंहार, डेमोग्राफी में बदलाव और किसानों की बदहाली। ये ऐसे मुद्दे थे जो ग्राउंड पर मौजूद सभी लोगों को दिख रहे थे लेकिन या तो किसी ने इन्हें गंभीरता से नहीं लिया या फिर इन्हें मुद्दा ही नहीं समझा। अब बारी बारी से इन सभी मुद्दों पर बात करते हैं।
SIR का मुद्दा और बदलता नैरेटिव
चुनाव की घोषणा से काफी पहले ही SIR का मुद्दा मीडिया और गलियों में छाया रहा। शुरुआत में टीएमसी ने यह आरोप लगाया कि भाजपा ने इसकी आड़ में उनके समर्थकों के नाम वोटर लिस्ट से कटवा दिए हैं। लेकिन जैसे-जैसे मतदान की तारीख करीब आई, यह नैरेटिव पूरी तरह बदल गया। जनता के बीच यह संदेश गया कि SIR को लेकर जो भ्रम फैलाया जा रहा है, वह वास्तव में सत्ता पक्ष की अपनी कमजोरी छिपाने की कोशिश है। लोगों में इस प्रक्रिया को लेकर नाराजगी बढ़ती गई और उन्होंने इसे अपनी पहचान से जोड़ लिया। मतदान के दिन यही नाराजगी भाजपा के लिए एक बड़े वोट बैंक में तब्दील हो गई।
महिला सुरक्षा और आरजी कर कांड का असर
ममता बनर्जी हमेशा से महिला मतदाताओं को अपनी सबसे बड़ी ताकत मानती रही हैं। 'लक्ष्मी भंडार' जैसी योजनाओं के जरिए महिलाओं को हर महीने 1500 रुपये दिए जा रहे थे। टीएमसी को भरोसा था कि यह पैसा उन्हें दोबारा सत्ता में लाएगा। लेकिन आरजी कर मेडिकल कॉलेज में हुई हैवानियत ने इस भरोसे की जड़ें हिला दीं। एक महिला प्रशिक्षु डॉक्टर के साथ हुई दरिंदगी ने बंगाल की हर महिला के मन में असुरक्षा का भाव पैदा कर दिया। महिलाओं को लगा कि अगर एक डॉक्टर सुरक्षित नहीं है, तो आम नागरिक का क्या होगा। 1500 रुपये की आर्थिक मदद पर सुरक्षा और सम्मान का मुद्दा भारी पड़ गया।
डेमोग्राफी में बदलाव और ध्रुवीकरण की राजनीति
बंगाल में इस बार डेमोग्राफी यानी जनसंख्या के बदलते स्वरूप पर जमकर राजनीति हुई। बीजेपी ने इसे अपना प्रमुख चुनावी हथियार बनाया और जनता को चेताया कि राज्य की पहचान खतरे में है। टीएमसी जहां मुस्लिम मतदाताओं को एकजुट करने में लगी थी, वहीं भाजपा ने बहुसंख्यक आबादी के बीच यह बात बैठाई कि राज्य का संतुलन बिगड़ रहा है। इस मुद्दे ने न केवल बंगाल के निवासियों को प्रभावित किया, बल्कि बाहर रहने वाले प्रवासी श्रमिकों को भी घर लौटकर वोट डालने पर मजबूर किया। यही कारण रहा कि राज्य में 92 प्रतिशत से अधिक रिकॉर्ड मतदान हुआ, जिसने सत्ता पक्ष के समीकरण बिगाड़ दिए।
बांग्लादेश का तख्तापलट और हिंदुओं में डर
पड़ोसी देश बांग्लादेश में शेख हसीना की सरकार गिरने के बाद जो हिंसा हुई, उसका सीधा असर बंगाल के चुनावों पर दिखा। हिंदुओं पर हुए अत्याचार की तस्वीरों और खबरों ने बंगाल के हिंदू वोटरों को एकजुट कर दिया। भाजपा ने इस मुद्दे को बहुत बारीकी से उठाया और यह संदेश दिया कि यदि आज नहीं संभले, तो भविष्य में यहाँ भी ऐसे ही हालात हो सकते हैं। इस डर ने लोगों को अपनी सुरक्षा के लिए भाजपा की ओर मोड़ दिया। ममता बनर्जी इस मुद्दे को सांप्रदायिक ध्रुवीकरण कहकर खारिज करती रहीं, लेकिन जमीन पर लोग इस खतरे को महसूस कर रहे थे।
किसानों की बदहाली और आर्थिक नाराजगी
अक्सर बड़े राजनीतिक मुद्दों के शोर में किसानों की आवाज दब जाती है। इस बार बंगाल का किसान आलू की बंपर पैदावार के बावजूद खून के आंसू रो रहा था। सरकार की गलत नीतियों के कारण उन्हें फसल का उचित मूल्य नहीं मिल सका। सबसे बड़ी नाराजगी इस बात को लेकर थी कि सरकार ने फसलों को दूसरे राज्यों में ले जाने पर रोक लगा दी थी। किसानों ने इसे अपनी आर्थिक आजादी पर हमला माना। जमीनी स्तर पर टीएमसी के नेता इस गुस्से को भांप नहीं पाए। किसानों का यह शांत विद्रोह चुनाव परिणामों में एक बड़े उलटफेर के रूप में सामने आया है।
सत्ता विरोधी लहर और चापलूसी का अंत
यह चुनावी नतीजा इस बात का भी प्रमाण है कि राज्य में सत्ता विरोधी लहर चरम पर थी। टीएमसी के शीर्ष नेतृत्व तक शायद जमीनी हकीकत पहुंच ही नहीं पाई। रामचरित मानस के सुंदर काण्ड में एक चौपाई है '' सचिव वैध गुरु तीनि जौं प्रिय बोलहिं भय आस। राज धर्म तन तीनि कर होइ बेगिहीं नास॥'' अर्थात ''जब ये तीनों (मंत्री, वैद्य, गुरु) निडर होकर सत्य बोलने के बजाय केवल प्रिय (चापलूसी) बोलने लगते हैं, तो राज्य (राजनीतिक शक्ति), धर्म (आध्यात्मिक शक्ति) और तन (शरीर की स्वास्थ्य शक्ति) का शीघ्र ही विनाश हो जाता है।
बंगाल में भी यही हुआ; चापलूसी के घेरे में घिरी सरकार जनता की बुनियादी समस्याओं को भूल गई। भ्रष्टाचार, सिंडिकेट राज और प्रशासनिक विफलता ने जनता को विकल्प तलाशने पर मजबूर कर दिया। आज जो परिणाम दिख रहे हैं, वे उसी संचित आक्रोश का नतीजा हैं।