
भवानीपुर में ‘दीदी’ बनाम 'दादा' : महामुकाबले में जाति-समुदाय का गणित निर्णायक
घटते जीत के अंतर से लेकर मतदाता सूची में नाम हटाने तक, भवानीपुर का नतीजा एक सीट से कहीं आगे जाकर बंगाल की राजनीति की दिशा तय कर सकता है।
भवानीपुर सीट इस विधानसभा चुनाव में पश्चिम बंगाल की सबसे हाई-प्रोफाइल सीट बनती जा रही है, जहां मुख्यमंत्री ममता बनर्जी 29 अप्रैल को सीधे मुकाबले में बीजेपी के नेता प्रतिपक्ष सुवेंदु अधिकारी का सामना करेंगी। बंगाल के राजनीतिक विश्लेषक इसे पहले ही “मदर ऑफ ऑल इलेक्टोरल कॉन्टेस्ट” कहने लगे हैं।
भवानीपुर की यह सीट दरअसल नंदीग्राम मुकाबले का रीमैच मानी जा रही है। 2021 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में, जो कभी ममता के करीबी सहयोगी थे, वही सुवेंदु अधिकारी बीजेपी में शामिल होकर नंदीग्राम में उन्हें 1,956 वोटों से हरा चुके थे।
पांच साल बाद, ममता बनाम सुवेंदु की यह लड़ाई अब मुख्यमंत्री के अपने गढ़ भवानीपुर में पहुंच गई है, जहां अधिकारी की उम्मीदवारी उनके घरेलू मैदान पर राजनीतिक चुनौती मानी जा रही है।
‘मिनी इंडिया’ और जातीय गणित
कोलकाता नगर निगम के आठ वार्डों में फैला भवानीपुर अक्सर “मिनी इंडिया” कहा जाता है। यहां बंगालियों के साथ गुजराती व्यापारी, पंजाबी और सिख परिवार, मारवाड़ी और जैन समुदाय, और बड़ी मुस्लिम आबादी साथ रहती है।
यहां लगभग 42% मतदाता बंगाली हिंदू, 34% गैर-बंगाली हिंदू और 24% मुस्लिम हैं।
कई महीनों से बीजेपी इस सीट पर बूथ स्तर तक रणनीति बना रही है—यह पहचानते हुए कि कायस्थ (26.2%), मुस्लिम (24.5%), पूर्वी भारत से आए प्रवासी (14.9%), मारवाड़ी (10.4%) और ब्राह्मण (7.6%) मतदाता कहां केंद्रित हैं। इस तरह भवानीपुर एक सामान्य शहरी सीट से ज्यादा जाति-समुदाय आधारित चुनावी समीकरण का मैदान बन गया है।
गहरी राजनीतिक जड़ें
भवानीपुर की राजनीतिक कहानी खुद बंगाल के बदलाव को दर्शाती है। यह सीट कभी कांग्रेस का गढ़ हुआ करती थी, जहां सिद्धार्थ शंकर रे जैसे बड़े नेता चुनाव जीतते रहे।
1972 में परिसीमन के बाद यह सीट खत्म हो गई थी और 2011 में फिर से अस्तित्व में आई—वही साल जब ममता बनर्जी ने वाम मोर्चे के 34 साल के शासन को खत्म किया।
उनके करीबी सहयोगी सुब्रत बख्शी ने पहले यहां से जीत हासिल की, फिर सीट खाली की और ममता बनर्जी उपचुनाव जीतकर विधानसभा में पहुंचीं।
2016 में उन्होंने इस सीट को बरकरार रखा, 2021 में नंदीग्राम से चुनाव लड़ा, लेकिन वहां सुवेंदु अधिकारी से 1,956 वोटों से हार गईं। इसके बाद उन्होंने भवानीपुर उपचुनाव में वापसी करते हुए बीजेपी की प्रियंका तिबरेवाल को 58,000 से ज्यादा वोटों से हराया।
टीएमसी को ‘दीदी’ की पहचान का सहारा
भवानीपुर क्षेत्र के भीतर ही कालीघाट स्थित है, जहां ममता बनर्जी का निवास है। विधानसभा क्षेत्र बनने से बहुत पहले ही यहां की गलियां और क्लब उनकी राजनीतिक यात्रा के केंद्र रहे हैं।
टीएमसी के लिए भवानीपुर सिर्फ एक सुरक्षित सीट नहीं, बल्कि मुख्यमंत्री की राजनीतिक “इंश्योरेंस” मानी जाती है। पार्टी का चुनाव अभियान “घরের मेये” (घर की बेटी) के भावनात्मक नारे पर टिका है, जिसमें ममता को मुख्यमंत्री नहीं, बल्कि इलाके की अपनी “दीदी” के रूप में पेश किया जा रहा है।
लक्ष्मी भंडार और कन्याश्री जैसी कल्याणकारी योजनाएं इस अपील को मजबूत करती हैं। कोलकाता के मेयर और वरिष्ठ टीएमसी नेता Firhad Hakim ने कहा, “यह सिर्फ एक सीट नहीं है। यहां के लोग बार-बार ममता बनर्जी की विकास और समावेशी राजनीति के साथ खड़े रहे हैं।”
बीजेपी को दिख रहा मौका
बीजेपी को हालिया चुनावी बदलाव से आत्मविश्वास मिला है। 2024 के लोकसभा चुनाव में भवानीपुर क्षेत्र में टीएमसी की बढ़त घटकर सिर्फ 8,297 वोट रह गई, जबकि 2021 के उपचुनाव में ममता की जीत का अंतर 58,832 वोट था। आठ में से पांच वार्डों में बीजेपी आगे रही थी।
मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) ने तस्वीर को और जटिल बना दिया है, जिसमें 51,000 से ज्यादा नाम हटाए गए—इनमें 23.3% मुस्लिम और 76.7% गैर-मुस्लिम मतदाता शामिल हैं।
बीजेपी का दावा है कि अगर हिंदू वोटों का ध्रुवीकरण होता है, तो यह बदलाव उसके पक्ष में जा सकता है, जबकि टीएमसी को अपने पारंपरिक वोट बैंक में सेंध का डर है।
बीजेपी नेता देबजीत सरकार ने कहा, “यह लड़ाई एक नारे से नहीं जीती जा सकती। इसे बूथ-बूथ और समुदाय-समुदाय के स्तर पर लड़ना होगा। राज्य अब ‘रामराज्य’ चाहता है और लोग तुष्टिकरण की राजनीति से थक चुके हैं।”
एक सीट से आगे का फैसला
राजनीतिक विश्लेषक बिश्वनाथ चक्रवर्ती के अनुसार, “भवानीपुर में सुवेंदु को उतारकर बीजेपी इस सीट को एक और नंदीग्राम बनाना चाहती है, लेकिन इस बार ममता के गढ़ में। टीएमसी के लिए यहां जीत हासिल करना अपनी राजनीतिक पकड़ बनाए रखने के लिए बेहद जरूरी है।”
बंगाल की इस हाई-स्टेक चुनावी लड़ाई में भवानीपुर वह मैदान बन गया है, जहां सत्ता की प्रतिष्ठा दांव पर है, महत्वाकांक्षाओं की परीक्षा होगी और 2026 का पहला बड़ा राजनीतिक संदेश यहीं से सामने आएगा।

