
जनसंघ से बीजेपी तक का सफर पूरा, बंगाल में पहली बार खिला कमल
पश्चिम बंगाल चुनाव 2026 के रुझानों में बीजेपी बहुमत की ओर बढ़ती दिख रही है, जबकि टीएमसी पिछड़ती नजर आ रही है, जिससे सत्ता परिवर्तन के संकेत मिल रहे हैं।
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के मतगणना परिणाम 4 मई से सामने आने लगे हैं, और शुरुआती रुझान राज्य की राजनीति में बड़े बदलाव की ओर इशारा कर रहे हैं। 294 सदस्यीय विधानसभा के शुरुआती आंकड़ों के अनुसार, भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) स्पष्ट बहुमत की ओर बढ़ती दिखाई दे रही है, जबकि तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की लंबे समय से स्थापित सत्ता कमजोर पड़ती नजर आ रही है। यह रुझान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली सरकार के लिए एक संभावित राजनीतिक झटका माना जा रहा है।
शुरुआती रुझान और सत्ता संतुलन
शुरुआती रुझानों में बीजेपी लगभग 188 सीटों पर बढ़त बनाए हुए है, जबकि टीएमसी करीब 99 सीटों तक सीमित दिख रही है। यदि यह रुझान अंतिम परिणामों में तब्दील होता है, तो राज्य में पहली बार बीजेपी की सरकार बनने का मार्ग प्रशस्त हो सकता है।
चुनावी विमर्श में श्यामा प्रसाद मुखर्जी की भूमिका
इस चुनाव में बीजेपी की बढ़त को पार्टी के वैचारिक आधार और ऐतिहासिक विरासत से भी जोड़ा जा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह ने चुनाव प्रचार के दौरान जनसंघ के संस्थापक डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के सपनों को पूरा करने का संकल्प बार-बार दोहराया। मुखर्जी को बीजेपी का वैचारिक पितामह माना जाता है, जिनकी सोच पर आगे चलकर पार्टी की नींव पड़ी।
श्यामा प्रसाद मुखर्जी: जीवन और राजनीतिक यात्रा
1901 में कलकत्ता में जन्मे डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी एक प्रतिष्ठित शिक्षाविद्, वकील और राजनेता थे। वे मात्र 33 वर्ष की आयु में कलकत्ता विश्वविद्यालय के सबसे कम उम्र के कुलपति बने और चार वर्षों तक इस पद पर कार्यरत रहे। उनका राजनीतिक करियर 1929 में बंगाल कांग्रेस से शुरू हुआ, लेकिन विचारधारात्मक मतभेदों के चलते उन्होंने 1930 में कांग्रेस छोड़ दी।
इसके बाद वे 1939 में हिंदू महासभा से जुड़े और 1940 में इसके अध्यक्ष बने। 1951 में उन्होंने भारतीय जनसंघ की स्थापना की, जो आगे चलकर भारतीय जनता पार्टी के रूप में विकसित हुई।
बंगाल विभाजन और ऐतिहासिक संदर्भ
डॉ. मुखर्जी का नाम बंगाल के विभाजन से भी जुड़ा हुआ है। उस समय के राजनीतिक परिदृश्य में यह आशंका जताई जा रही थी कि यदि बंगाल का विभाजन नहीं हुआ, तो पूरा प्रदेश पाकिस्तान का हिस्सा बन सकता है। मुखर्जी ने हिंदू बहुल क्षेत्रों को भारत में बनाए रखने के लिए विभाजन का समर्थन किया।
20 जून 1947 को बंगाल विधानसभा में पश्चिम बंगाल के गठन का प्रस्ताव पारित किया गया। इससे पहले मुखर्जी ने ब्रिटिश वायसराय लॉर्ड माउंटबेटन के साथ बैठकों और पत्राचार के माध्यम से विभाजन की आवश्यकता को स्पष्ट किया था। यह निर्णय आगे चलकर भारत के राजनीतिक भूगोल को आकार देने में महत्वपूर्ण साबित हुआ।
चुनाव प्रचार और बीजेपी की रणनीति
2026 के चुनाव अभियान में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने व्यापक स्तर पर रैलियां और जनसभाएं कीं। अप्रैल 2026 तक पीएम मोदी ने राज्य के 19 जिलों में 24 स्थानों पर रैलियां और रोड शो किए। वहीं, अमित शाह ने संगठनात्मक स्तर पर काम करते हुए बूथ-स्तर तक पार्टी को मजबूत करने पर ध्यान केंद्रित किया।
बैरकपुर में एक सभा के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने विश्वास जताया था कि वे राज्य में बीजेपी सरकार के शपथ ग्रहण समारोह में शामिल होने के लिए दोबारा आएंगे। उन्होंने यह भी कहा कि उनकी सरकार डॉ. मुखर्जी के सपनों को साकार करने और राज्य के विकास को नई दिशा देने के लिए प्रतिबद्ध है।
अमित शाह ने भी अपने चुनावी भाषणों में राज्य में कथित भ्रष्टाचार और विकास में ठहराव का मुद्दा उठाया। उन्होंने दावा किया कि बीजेपी की सरकार बनने पर राज्य की सांस्कृतिक विरासत को पुनर्जीवित किया जाएगा और सीमाओं की सुरक्षा को सुदृढ़ किया जाएगा।
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के शुरुआती रुझान न केवल राजनीतिक सत्ता परिवर्तन की ओर संकेत कर रहे हैं, बल्कि यह भी दर्शाते हैं कि ऐतिहासिक और वैचारिक प्रतीकों का चुनावी राजनीति में कितना प्रभाव होता है। अंतिम परिणाम चाहे जो भी हों, यह चुनाव राज्य की राजनीति में एक महत्वपूर्ण मोड़ के रूप में देखा जा रहा है।

