
बंगाल से असम तक भाजपा का जलवा, विपक्ष की रणनीति फेल
बंगाल में भाजपा की बड़ी जीत के पीछे एंटी-इंकम्बेंसी, मतदाता सूची बदलाव और विपक्ष की कमजोरी अहम रही, जबकि असम में नेतृत्व और विकास निर्णायक बने।
15 साल के लंबे अंतराल के बाद West Bengal में सत्ता परिवर्तन देखने को मिला, जहां भारतीय जनता पार्टी ने 2026 विधानसभा चुनावों में शानदार जीत दर्ज की। इस अप्रत्याशित नतीजे के बाद विशेषज्ञों ने इसके पीछे के कारणों का विश्लेषण करना शुरू किया। कई अहम सीटों पर चौंकाने वाले उलटफेर देखने को मिले, जिसने राजनीतिक समीकरण बदल दिए।
द फेडरल के समीर के पुरकायस्थ के अनुसार, इस जीत के पीछे कई कारक जिम्मेदार रहे, जिनमें मतदाता सूची का पुनरीक्षण और टीएमसी सरकार के खिलाफ मजबूत एंटी-इंकम्बेंसी शामिल है।
बंगाल का जनादेश: बड़ा राजनीतिक बदलाव
भाजपा ने बंगाल में 190 से अधिक सीटों के साथ प्रचंड जीत की ओर कदम बढ़ाया, जो राज्य की राजनीति में बड़ा बदलाव माना जा रहा है। पुरकायस्थ ने बताया कि ‘स्पेशल इंटेंसिव रिविजन’ (SIR) के तहत मतदाता सूची में बदलाव इस परिणाम का अहम कारण रहा।उन्होंने कहा कि करीब 177 सीटों पर हटाए गए मतदाताओं की संख्या 2021 के जीत के अंतर से अधिक थी। इनमें से 120 सीटें पहले टीएमसी के पास थीं, जबकि 57 सीटें भाजपा के खाते में थीं। इस बार यह रुझान पूरी तरह भाजपा के पक्ष में पलट गया।
एंटी-इंकम्बेंसी और विवादों का असर
टीएमसी के खिलाफ नाराजगी भी इस चुनाव में निर्णायक साबित हुई। भ्रष्टाचार के आरोप, नौकरी के बदले रिश्वत जैसे मामले और आरजी कर रेप-मर्डर केस जैसी घटनाओं ने जनता में आक्रोश पैदा किया।हालांकि आधिकारिक आंकड़े राज्य को सुरक्षित बताते हैं, लेकिन इन घटनाओं का खासकर शहरी मतदाताओं पर गहरा मनोवैज्ञानिक प्रभाव पड़ा। शहरों में हुए विरोध प्रदर्शनों ने इस गुस्से को वोट में बदल दिया।
यह एंटी-इंकम्बेंसी लहर इतनी मजबूत थी कि टीएमसी के पारंपरिक गढ़ और अल्पसंख्यक बहुल क्षेत्रों में भी पार्टी का समर्थन घट गया। Malda और Murshidabad जैसे जिलों में अल्पसंख्यक वोटों के बंटवारे ने भी भाजपा को फायदा पहुंचाया।
भाजपा का दावा: “देश बचाने की लड़ाई”
बंगाल भाजपा नेता Charles Nandi ने इस जीत को ममता सरकार के खिलाफ जनादेश बताया। उन्होंने इसे भ्रष्टाचार, कानून व्यवस्था की खराब स्थिति और “तुष्टिकरण की राजनीति” के खिलाफ वोट करार दिया।नंदी ने इसे सिर्फ राजनीतिक जीत नहीं बल्कि “सभ्यता की लड़ाई” बताते हुए कहा कि यह जीत “भारत को बचाने” के लिए जरूरी थी। उन्होंने बांग्लादेश से घुसपैठ और अवैध प्रवासियों को पहचान पत्र दिए जाने का भी मुद्दा उठाया।हालांकि, इस पर सवाल भी उठे, क्योंकि सीमा सुरक्षा और आधार कार्ड जैसे मुद्दे केंद्र सरकार के अधीन आते हैं।
टीएमसी का पक्ष: 27 लाख मतदाता विवाद में
Saminur Rahaman ने माना कि एंटी-इंकम्बेंसी एक कारण था, लेकिन उन्होंने SIR को चुनाव परिणाम पर बड़ा असर डालने वाला बताया।उनके अनुसार, लगभग 27 लाख मतदाता अभी भी कानूनी जांच के दायरे में हैं और उनके मामले ट्रिब्यूनल में लंबित हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग निष्पक्ष तरीके से काम नहीं कर रहा था।
असम में भाजपा की लगातार तीसरी जीत
असम में भाजपा ने लगातार तीसरी बार सरकार बनाई। Apurba Kumar Bhattacharjee ने इसका श्रेय मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा के नेतृत्व, विकास कार्यों और कमजोर विपक्ष को दिया।उन्होंने कहा कि महिलाओं के बीच कल्याणकारी योजनाओं और विकास कार्यों ने एनडीए के पक्ष में माहौल बनाया। सरमा की नेतृत्व शैली को प्रभावी और जन-आकर्षक बताया गया।
विपक्ष की कमजोरी भी बड़ा कारण
पुरकायस्थ के अनुसार, असम में विपक्ष की कमजोरी भी भाजपा की जीत का बड़ा कारण रही। कांग्रेस एकजुट मोर्चा बनाने में असफल रही।चुनाव कार्यक्रम घोषित होने के बाद भी नेताओं का पार्टी छोड़ना, गठबंधन में देरी और सार्वजनिक विवादों ने विपक्ष की विश्वसनीयता को नुकसान पहुंचाया।
ध्रुवीकरण बनाम विकास की बहस
असम में ध्रुवीकरण के आरोप भी चर्चा में रहे। जहां आलोचकों ने इसे अहम कारण बताया, वहीं भाजपा नेताओं ने विकास को मुख्य मुद्दा बताया।पुरकायस्थ का मानना है कि चुनाव परिणाम को समझने के लिए शासन, रणनीति और ध्रुवीकरण—सभी कारकों को साथ में देखना जरूरी है।
राजनीतिक संकेत और भविष्य
विशेषज्ञों के अनुसार, बंगाल और असम दोनों के नतीजे कई कारकों का मिश्रण हैं—मतदाता सूची में बदलाव, एंटी-इंकम्बेंसी, नेतृत्व और विपक्ष की स्थिति।जहां भाजपा इसे बंगाल में टीएमसी के खिलाफ जनादेश और असम में अपने शासन मॉडल की पुष्टि मान रही है, वहीं विपक्ष चुनाव प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल उठा रहा है।
यह परिणाम भारत की चुनावी राजनीति के भविष्य को लेकर बड़े सवाल खड़े करता है—खासतौर पर शासन के प्रदर्शन और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं की विश्वसनीयता के बीच संतुलन को लेकर।

