सियासी जीत के बाद असली परीक्षा, क्या बंगाल को संभाल पाएगी भाजपा?
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सियासी जीत के बाद असली परीक्षा, क्या बंगाल को संभाल पाएगी भाजपा?

पश्चिम बंगाल में सत्ता परिवर्तन के पीछे आर्थिक मुद्दे अहम रहे, अब भाजपा के सामने रोजगार, पलायन और विकास सुधारने की बड़ी चुनौती है।


पश्चिम बंगाल में विपक्ष का किला ढह चुका है। जैसा अनुमान था, 4 मई को चुनाव परिणाम घोषित होने के दो दिन बाद भी हिंसा, आगजनी और तोड़फोड़ की छिटपुट घटनाओं की खबरें सामने आ रही हैं, साथ ही माहौल में बेचैनी बनी हुई है। जहां एक ओर ममता बनर्जी के “साम्राज्य” के पतन पर कुछ लोग जश्न मना रहे हैं, वहीं कई लोग इस बदलाव से हैरान हैं कि जिस राज्य को वे उदार और धर्मनिरपेक्ष मानते थे, वह अब भगवा रंग में रंगता नजर आ रहा है।

भाजपा की सांप्रदायिक छवि इस बदलाव का एक कारण जरूर है, लेकिन बंगाल के लोगों के इस निर्णय के पीछे एक बड़ा आर्थिक पहलू भी है। आधी सदी से विपक्षी दलों द्वारा शासित इस राज्य में बेरोजगारी, गुणवत्तापूर्ण रोजगार की कमी और बड़े पैमाने पर पलायन जैसी समस्याओं ने लोगों को आर्थिक बदलाव की उम्मीद में भाजपा की ओर मोड़ा है।

पलायन और बेरोजगारी

2011 की जनगणना के अनुसार, रोजगार के लिए पलायन करने वाले लोगों के मामले में पश्चिम बंगाल देश में चौथे स्थान पर था। 2001 से 2011 के बीच करीब 5.8 लाख लोग राज्य छोड़कर गए। वहीं लगभग 2.2 लाख लोग रोजगार के लिए बंगाल आए, जिनमें अधिकतर बिहार और झारखंड के अकुशल श्रमिक थे।

दिलचस्प बात यह है कि पश्चिम बंगाल में बेरोजगारी दर देश में पांचवीं सबसे कम है, जो गुजरात, कर्नाटक, झारखंड और मध्य प्रदेश के बाद आती है। हालांकि, 15 से 29 वर्ष के युवाओं में बेरोजगारी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है, जो 2025 में घटकर 9.9 प्रतिशत हो गई, जबकि पिछले साल यह 10.3 प्रतिशत थी।

विशेषज्ञों का मानना है कि आधिकारिक आंकड़े कम बेरोजगारी दिखाते हैं, लेकिन यह अधरोजगारी को छिपाते हैं। बड़ी संख्या में लोग कम आय वाले कृषि या सेवा क्षेत्रों में काम कर रहे हैं, जहां आगे बढ़ने की सीमित संभावनाएं हैं। राज्य की करीब 70 प्रतिशत कार्यबल सेवा और कृषि क्षेत्रों में है, जबकि विनिर्माण क्षेत्र की हिस्सेदारी लगभग 18.8 प्रतिशत है।

आर्थिक गिरावट का इतिहास

बंगाल की आर्थिक गिरावट का इतिहास स्वतंत्रता के बाद से ही शुरू हो जाता है। 1966 तक केंद्र और राज्य दोनों में कांग्रेस की सरकार थी, जिसकी नीतियों ने बंगाल को औद्योगिक केंद्र से श्रमिक आपूर्ति केंद्र में बदल दिया।एक अध्ययन के अनुसार, बंगाल की आयकर हिस्सेदारी 20 प्रतिशत से घटाकर 12 प्रतिशत कर दी गई, जबकि मुंबई और मद्रास जैसे क्षेत्रों की हिस्सेदारी बढ़ाई गई। शरणार्थियों के पुनर्वास के लिए भी बंगाल को अपेक्षाकृत कम संसाधन मिले, जबकि बोझ अधिक था।

1950 के दशक के मध्य तक, महाराष्ट्र को बंगाल की तुलना में अधिक औद्योगिक लाइसेंस मिलने लगे। इसके परिणामस्वरूप, 1947 में भारत के औद्योगिक उत्पादन में बंगाल की हिस्सेदारी 27 प्रतिशत थी, जो 1960-61 तक घटकर 17 प्रतिशत रह गई और आज यह मात्र 3-5 प्रतिशत रह गई है।

जमीन को लेकर संघर्ष

कांग्रेस के बाद भी बंगाल की समस्याएं खत्म नहीं हुईं। 1967 में पहले गैर-कांग्रेसी मुख्यमंत्री अजय मुखर्जी ने वाम दलों की उद्योग विरोधी नीतियों का हवाला देते हुए इस्तीफा दे दिया। 1960 और 70 के दशक में ट्रेड यूनियन की आक्रामकता ने निवेशकों को राज्य से बाहर जाने पर मजबूर किया। वाम शासन (1977–2011) के दौरान निवेश आकर्षित करने के प्रयास जमीन अधिग्रहण के मुद्दे पर विफल हो गए। राज्य की घनी आबादी के कारण जमीन अधिग्रहण हमेशा विवादित रहा। बुद्धदेव भट्टाचार्य द्वारा सिंगूर और नंदीग्राम में औद्योगीकरण की कोशिशें भी विरोध के चलते असफल रहीं।

ममता बनर्जी का राजनीतिक उदय भी इन्हीं आंदोलनों से हुआ और सत्ता में आने के बाद उनकी पार्टी ने उद्योग के लिए जमीन अधिग्रहण न करने का फैसला किया, जिससे औद्योगिक विकास और बाधित हुआ।

भाजपा के वादे

अब सवाल यह है कि क्या भाजपा इस स्थिति को बदल पाएगी? क्या “डबल इंजन सरकार” राज्य की किस्मत बदल सकती है?भाजपा ने अपने घोषणापत्र में सिंगूर में इंडस्ट्रियल पार्क बनाने और चार बड़े औद्योगिक क्षेत्र विकसित करने का वादा किया है। हल्दिया को राष्ट्रीय बंदरगाह हब बनाने, जूट और चाय उद्योग को पुनर्जीवित करने और ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ सुधारने के लिए सिंगल-विंडो सिस्टम लागू करने की बात कही गई है।

साथ ही, जमीन नीति में बदलाव कर उद्योगों के लिए जमीन उपलब्ध कराने का संकेत भी दिया गया है, हालांकि यह कदम जनता के बीच कितना स्वीकार्य होगा, यह देखना बाकी है।

मत्स्य क्षेत्र पर फोकस

भाजपा ने मत्स्य पालन को बढ़ावा देने के लिए सभी मछुआरों को प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना के तहत पंजीकृत करने का वादा किया है। पश्चिम बंगाल देश के कुल मछली उत्पादन का लगभग 10 प्रतिशत हिस्सा देता है और मछली बीज उत्पादन में अग्रणी है।2024-25 में राज्य ने लगभग 23.75 लाख मीट्रिक टन मछली का उत्पादन किया और 1.78 लाख टन मछली का निर्यात किया। इस क्षेत्र से करीब 32 लाख लोगों की आजीविका जुड़ी है।

रोजगार और योजनाएं

भाजपा ने पांच वर्षों में 1 करोड़ रोजगार और स्वरोजगार के अवसर पैदा करने का वादा किया है। बेरोजगार युवाओं को हर महीने 3000 रुपये और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए एकमुश्त 15,000 रुपये देने की घोषणा भी की गई है।इसके अलावा, सरकारी नौकरियों में 33 प्रतिशत आरक्षण महिलाओं को देने और सभी रिक्त पदों को पारदर्शी तरीके से भरने का वादा किया गया है।

क्या भाजपा सफल होगी?

2011 में जब ममता बनर्जी सत्ता में आईं, तो लोगों को बदलाव की उम्मीद थी, लेकिन पिछले 15 वर्षों में जमीनी स्तर पर बड़ा परिवर्तन नहीं दिखा। भाजपा ने रेत माफिया और सिंडिकेट राज पर कार्रवाई का वादा किया है, लेकिन असली सवाल यह है कि क्या वह अपने वादों को पूरा कर पाएगी।सबसे बड़ी चुनौती यह है कि रोजगार और पलायन की समस्या को दूर करते हुए किसानों की जमीन भी सुरक्षित रखी जाए। यह काम आसान नहीं है।अगर सरकार केवल नकद सहायता योजनाओं तक सीमित रही, तो लंबे समय में लोग ठोस बदलाव की उम्मीद करेंगे। और यदि राजनीति फिर से सांप्रदायिक ध्रुवीकरण और पुराने ढर्रे पर चलती रही, तो बंगाल के लोग एक बार फिर बदलाव की तलाश में निकल सकते हैं।

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