
केरल में करारी हार के बाद CPI(M) का महामंथन, कार्यकर्ताओं से मांगे सुझाव
केरल में LDF की हार के बाद CPI(M) ने बड़ा आत्ममंथन शुरू किया है। पार्टी अब कार्यकर्ताओं, समर्थकों और बुद्धिजीवियों की राय सुनेगी।
केरल विधानसभा चुनाव में लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट) को मिली करारी हार के बाद आत्ममंथन चल रहा है। 6 मई को हुई लगभग 12 घंटे लंबी सीपीआई(एम) राज्य सचिवालय की बैठक ने पार्टी के भीतर एक असाधारण आत्ममंथन को खुली और व्यापक आत्म-आलोचना की प्रक्रिया बताया है, जो केवल संगठन के अंदर तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि वामपंथी विचारधारा से जुड़े समर्थकों, सहयात्रियों और बुद्धिजीवियों की आलोचनाओं और सुझावों को भी शामिल करेगी।
बैठक की असामान्य अवधि ने ही चुनावी हार के बाद पार्टी के भीतर गहरी चिंता को उजागर कर दिया। सुबह 10 बजे शुरू हुई यह बैठक देर रात तक चली, जिसे वरिष्ठ नेताओं ने हाल के वर्षों में दुर्लभ बताया। चर्चा के दौरान राज्य सचिव एम.वी. गोविंदन थोड़ी देर के लिए मीडिया से मुखातिब हुए, लेकिन सामान्य तौर पर पार्टी की बैठकों के बाद होने वाली आक्रामक प्रेस ब्रीफिंग के विपरीत उन्होंने विस्तार से कुछ नहीं कहा। उन्होंने केवल इतना संकेत दिया कि “अप्रत्याशित हार” की गहन समीक्षा की जाएगी।
गोविंदन ने कहा, “केरल में वामपंथ का इतिहास रहा है कि वह झटकों से सीख लेकर और जरूरी सुधार कर फिर से वापसी करता है। मई और जून में हम पार्टी संगठन के सभी स्तरों की बैठकें करेंगे और हर उस व्यक्ति की बात सुनेंगे जिसके पास कहने के लिए कुछ है। उन आकलनों को गंभीरता से लिया जाएगा और समीक्षा प्रक्रिया ईमानदार होगी।”
जमीनी स्तर से फीडबैक लेने की तैयारी
बैठक के बाद जो तस्वीर सामने आई, उससे स्पष्ट हुआ कि सीपीआई(एम) अब संगठनात्मक आत्मनिरीक्षण की एक दुर्लभ प्रक्रिया शुरू करने जा रही है। यह प्रक्रिया पार्टी की पारंपरिक लेनिनवादी पद्धति पर आधारित होगी, जिसमें नीचे से ऊपर तक रिपोर्ट और आलोचनाएं पहुंचती हैं। पार्टी नेतृत्व अब केवल वरिष्ठ नेताओं ही नहीं, बल्कि जमीनी कार्यकर्ताओं, स्थानीय समिति और शाखा सदस्यों, तथा पार्टी के औपचारिक ढांचे से बाहर लेकिन वामपंथी राजनीति से जुड़े लोगों की राय भी सुनेगा।
महासचिव एम.ए. बेबी ने बैठक के बाद पत्रकारों से बात करते हुए पार्टी की रणनीति स्पष्ट की। उन्होंने कहा, “हम सबसे निचले स्तर से पार्टी कार्यकर्ताओं की बात सुनेंगे। कार्यकर्ताओं को सुनना हमेशा से पार्टी की परंपरा रही है।” जब पत्रकारों ने पूछा कि नेतृत्व हार पर सीधे सवालों का जवाब देने से क्यों बच रहा है, तो बेबी ने कहा, “पहले हम जमीनी कार्यकर्ताओं की राय सुन लें, उसके बाद सवालों के जवाब देंगे।” उन्होंने यह भी कहा कि पार्टी इस बात को गंभीरता से सुनेगी कि साथी कार्यकर्ता इतनी बड़ी हार के पीछे क्या कारण मानते हैं।
आलोचनाओं से कट जाने की चिंता
वरिष्ठ नेताओं ने संकेत दिया कि समीक्षा प्रक्रिया केवल पार्टी मंचों तक सीमित नहीं रहेगी। पार्टी के भीतर अब यह एहसास बढ़ रहा है कि वर्षों के केंद्रीकृत कामकाज के कारण सीपीआई(एम) आलोचनाओं से कटती चली गई है, खासकर वामपंथी बुद्धिजीवियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, ट्रेड यूनियन समर्थकों और पुराने सहयात्रियों की आलोचनाओं से, जो कभी केरल में कम्युनिस्ट आंदोलन का व्यापक वैचारिक आधार हुआ करते थे।
शिक्षाविद् डॉ. टी.टी. श्रीकुमार के एक बहुभाषी नोट की वामपंथी हलकों में व्यापक चर्चा हो रही है। उन्होंने लिखा, “अगर एलडीएफ को अपनी व्यापक सामाजिक प्रासंगिकता बनाए रखनी है, तो उसे उदारवादी, धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक वर्गों के साथ-साथ उन हाशिए के सामाजिक समूहों को भी राजनीतिक रूप से साथ जोड़ने पर विचार करना होगा, जो कम्युनिस्ट पार्टियों की प्रत्यक्ष संगठनात्मक पहुंच से बाहर हैं। आज लोकतांत्रिक राजनीति का पुनर्निर्माण तभी संभव है जब समाज के विभिन्न स्तरों में राजनीतिक चेतना को और गहरा किया जाए।”
फीडबैक के रास्ते फिर खोलने की कोशिश
पार्टी के भीतर इस आत्ममंथन को राजनीतिक फीडबैक के बंद हो चुके रास्तों को दोबारा खोलने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। सूत्रों के अनुसार नेतृत्व विभिन्न स्तरों से खुलकर आलोचना को प्रोत्साहित करना चाहता है, बजाय इसके कि चुनावी हार का औपचारिक बचाव किया जाए।बताया जा रहा है कि सचिवालय की बैठक में नेतृत्व की कार्यशैली पर भी तीखी आलोचनाएं हुईं।
कई नेताओं का कहना था कि चुनाव प्रचार के दौरान पार्टी बड़े राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों पर प्रभावी हस्तक्षेप नहीं कर सकी। कई सीटों पर उम्मीदवार चयन को लेकर असंतोष था, स्थानीय संगठनों की राय को नजरअंदाज करने की शिकायतें थीं और खासकर कन्नूर में गुटबाजी की समस्याओं को समय रहते हल नहीं किए जाने पर चिंता जताई गई। कुछ नेताओं ने यह भी कहा कि जब तक पार्टी राजनीतिक अलगाव की वास्तविकता को ईमानदारी से स्वीकार नहीं करेगी, तब तक संगठनात्मक सुधार संभव नहीं होगा।
बंगाल के अनुभव का असर
सीपीआई(एम) की इस आत्म-आलोचना प्रक्रिया का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि यह कम्युनिस्ट पार्टियों की पुरानी संगठनात्मक संस्कृति को पुनर्जीवित करने का प्रयास माना जा रहा है। पारंपरिक लेनिनवादी पद्धति में शाखाओं और स्थानीय समितियों से रिपोर्ट और आलोचनाएं ऊपर पहुंचती थीं, जिसके आधार पर उच्च समितियां राजनीतिक निष्कर्ष निकालती थीं।
समय के साथ वामपंथ के भीतर ही आलोचकों का मानना था कि अत्यधिक केंद्रीकरण ने इस संस्कृति को कमजोर कर दिया और नेतृत्व धीरे-धीरे जमीनी राजनीतिक वास्तविकताओं से कटता गया।
पश्चिम बंगाल का अनुभव अब केरल की सीपीआई(एम) की सोच पर गहरा असर डालता दिखाई दे रहा है। 2011 में पश्चिम बंगाल में लेफ्ट फ्रंट की हार के बाद कई नेताओं ने स्वीकार किया था कि नेतृत्व संगठन के भीतर पनप रहे असंतोष को समय रहते पहचान नहीं सका। आंतरिक रिपोर्टें लगातार आत्मविश्वास दिखाती रहीं, जबकि पार्टी का सामाजिक आधार धीरे-धीरे कमजोर होता गया।
अब केरल की सीपीआई(एम) के कुछ वर्गों को डर है कि वैसा ही संवादहीनता यहां भी हुआ हो सकता है। व्यापक वामपंथी हलकों में नेतृत्व परिवर्तन की मांग भी उठने लगी है। कुछ कार्यकर्ता, समर्थक और सहयात्री यह कहने लगे हैं कि इतनी बड़ी चुनावी हार के बाद मुख्यमंत्री पिनराई विजयन और राज्य सचिव एम.वी. गोविंदन को पद छोड़ देना चाहिए ताकि संगठन में नई ऊर्जा लाई जा सके।
शीर्ष नेतृत्व के इस्तीफे की संभावना कम
हालांकि ऐसा होना फिलहाल बेहद असंभव माना जा रहा है, क्योंकि यह सीपीआई(एम) जैसी कम्युनिस्ट पार्टियों की संगठनात्मक शैली के विपरीत है। इतिहास बताता है कि बड़ी चुनावी हार के बाद भी पार्टी ने शायद ही कभी शीर्ष नेतृत्व से तुरंत इस्तीफा लिया हो। इसके बजाय पार्टी आमतौर पर आंतरिक समीक्षा, वैचारिक पुनर्संतुलन और संगठनात्मक सुधार की प्रक्रिया पर जोर देती रही है।इस अर्थ में नेतृत्व की जवाबदेही सार्वजनिक दबाव या तात्कालिक मांगों से नहीं, बल्कि पार्टी की आंतरिक प्रक्रियाओं से तय होती है।
क्या छवि सुधार की जरूरत है?
सीपीआई(एम) के लिए यह अब केवल चुनावी समीक्षा का मामला नहीं रह गया है। पार्टी के भीतर अब यह बहस चल रही है कि क्या वामपंथ अपनी पुरानी छवि — एक ऐसे कैडर-आधारित आंदोलन की, जो लगातार जनता की भावनाओं और आलोचनाओं से जुड़ा रहता था — को फिर से स्थापित कर सकता है।
नेतृत्व को अब यह एहसास हो रहा है कि चुनाव में दिखी गिरावट को केवल सत्ता विरोधी लहर या विपक्ष की एकजुटता के आधार पर नहीं समझाया जा सकता। पार्टी द्वारा दिखाई जा रही असामान्य खुलापन इस बात का संकेत है कि संकट राजनीतिक, संगठनात्मक और सांस्कृतिक — तीनों स्तरों पर मौजूद है।अब देखना यह होगा कि यह आत्ममंथन वास्तव में बदलाव और सुधार की दिशा में ले जाता है या फिर केवल एक आंतरिक औपचारिकता बनकर रह जाता है। यही तय करेगा कि सीपीआई(एम) अपने हालिया इतिहास के सबसे गंभीर राजनीतिक झटकों में से एक से कैसे उबरती है।

