
क्या ले डूबा दीदी का ओवर कॉन्फिडेंस? आखिर बंगाल ने क्यों कहा ममता को अलविदा, जानिए हार के कारण
एक तरफ ममता बनर्जी की राजनीति थी, तो दूसरी तरफ पीएम मोदी का करिश्मा और बीजेपी की 'सोनार बांग्ला' वाली रणनीति। डिजिटल युग का युवा अब सिर्फ कुछ रुपयों से बहलने वाला नहीं है, उसे भविष्य चाहिए, जो उसे कमल के फूल में दिखा
4 मई और दीदी गई...15 साल का राज, अहंकार का पहाड़ और 'माँ-माटी-मानुष' के नाम पर सिर्फ और सिर्फ सियासत...सब धराशायी हो गया। 1950 से जिस 'सोनार बांग्ला' का सपना जनसंघ और बीजेपी देख रही थी, आज वो हकीकत है। बंगाल में कमल खिल चुका है। यानी दीदी का जादू अब सिर चढ़कर नहीं बोल रहा, बल्कि सिर पकड़कर रो रहा है। दक्षिण बंगाल, जिसे ममता का अभेद्य किला कहा जाता था, आज वहां सन्नाटा है। कोर वोटर्स ने 'दीदी' का हाथ नहीं, बल्कि साथ छोड़ दिया है। लेकिन सवाल ये है कि ये नौबत आई क्यों? क्यों दीदी का 'ओवर कॉन्फिडेंस' उन्हें ले डूबा? आइए, इस हार का पोस्टमार्टम करते हैं...
1. एंटी-इनकम्बेंसी: बदलाव की तड़प
डेढ़ दशक! 15 साल! ये कोई छोटा वक्त नहीं होता। जब जनता विकास की कछुआ चाल से थक जाए, रोजगार के नाम पर उसे लाठियां मिले और सरकारी योजनाओं की मलाई सिर्फ कुछ खास लोग खाएं, तो जनता वोट की चोट मारती ही है। इस बार बंगाल के युवाओं ने 'लक्ष्मी भंडार' की खैरात नहीं, बल्कि सम्मान और नौकरी मांगी थी... जो दीदी दे न सकीं।
2. भ्रष्टाचार की दीमक
राशन घोटाला, शिक्षक भर्ती घोटाला... बंगाल में तो जैसे घोटालों की सेल लगी थी। टीएमसी ने अपनी छवि सुधारने के लिए 74 मौजूदा विधायकों के टिकट काट दिए। अरे! अगर विधायक सही थे तो टिकट क्यों कटा? और अगर गलत थे तो 15 साल उन्हें पाला क्यों? बीजेपी ने यही सवाल पूछा और टीएमसी के पास जवाब में सिर्फ चुप्पी थी। जनता समझ गई चेहरा बदलने से फितरत नहीं बदलती।
3. आरजी कर और संदेशखाली: रूह कांपने वाला आक्रोश
संदेशखाली की महिलाओं की चीखें और आरजी कर अस्पताल की उस बेटी की रूह कांपने वाली दास्तां... क्या दीदी को लगा था कि लोग इसे भूल जाएंगे? जब रक्षक ही भक्षक बन जाएं और सत्ता अपराधियों को संरक्षण देने लगे, तो चंडी का रूप धारण करने वाली बंगाल की महिलाएं खामोश नहीं रहतीं। बीजेपी ने रेखा पात्रा और पीड़ित की मां को आगे कर जो दांव खेला, उसने टीएमसी की रही-सही साख भी खत्म कर दी।
4. संगठन में दरार और गुटबाजी
टीएमसी के भीतर अब एकता नहीं, सिर्फ 'कमीशन' का बंटवारा बचा था। टिकट कटे तो कार्यकर्ता बागी हो गए। गुटबाजी ऐसी कि नेता आपस में ही लड़ रहे थे। जिस संगठन के दम पर ममता शेरनी की तरह दहाड़ती थीं, आज उस संगठन को भ्रष्टाचार की दीमक चाट गई।
5. मोदी का चेहरा और 'डबल इंजन' का सपना
एक तरफ ममता बनर्जी की राजनीति थी, तो दूसरी तरफ पीएम मोदी का करिश्मा और बीजेपी की 'सोनार बांग्ला' वाली रणनीति। मतुआ समुदाय को CAA का हक देने का वादा और युवाओं को इंडस्ट्रियलाइजेशन का सपना... बीजेपी ने वहां चोट की जहाँ दीदी सबसे कमजोर थीं। डिजिटल युग का युवा अब सिर्फ कुछ रुपयों से बहलने वाला नहीं है, उसे भविष्य चाहिए, जो उसे कमल के फूल में दिखा।
इसमें कोई शक नहीं है कि ममता बनर्जी एक बड़ी नेता हैं। लेकिन राजनीति में सत्ता का मद सबसे बड़ा दुश्मन होता है। बंगाल की धीमी विकास दर और पिछड़ते हुए गांव चीख-चीख कर बदलाव मांग रहे थे। आज बीजेपी ने इतिहास लिख दिया है। जो सपना श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने देखा था, उसे आज बंगाल की जनता ने मुहर लगाकर पूरा किया है। अब देखना ये है कि क्या बीजेपी बंगाल को वाकई 'सोनार बांग्ला' बना पाएगी या विपक्ष की बेंच पर बैठी दीदी अभी और 'खेला' करेंगी?

