
फाल्टा बना बंगाल की नई सियासी लड़ाई का केंद्र, विपक्ष की साख दांव पर
फाल्टा पुनर्मतदान बंगाल की राजनीति में बड़ा संकेत माना जा रहा है, जहां टीएमसी की पकड़, भाजपा की ताकत और विपक्ष की दिशा पर नजर है।
पश्चिम बंगाल की फाल्टा विधानसभा सीट पर पुनर्मतदान अब केवल एक विधानसभा क्षेत्र तक सीमित मामला नहीं रह गया है। यह चुनाव राज्य की राजनीति में उस बड़े बदलाव का संकेत बनता जा रहा है, जिसमें यह तय हो सकता है कि सत्तारूढ़ भाजपा के खिलाफ मुख्य विपक्षी ताकत कौन बनेगी। खासतौर पर इसलिए भी क्योंकि अप्रैल में हुए विधानसभा चुनावों में करारी हार झेलने के बाद तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) अपनी राजनीतिक प्रासंगिकता बचा पाएगी या नहीं, इस पर सबकी नजरें टिकी हैं।
चुनाव आयोग का बड़ा फैसला
चुनाव आयोग ने 29 अप्रैल को हुए मतदान को रद्द करते हुए फाल्टा में पूरी तरह से पुनर्मतदान कराने का आदेश दिया था। आयोग का कहना था कि मतदान के दौरान लोकतांत्रिक प्रक्रिया पूरी तरह विफल हो गई थी। अब सभी 285 मतदान केंद्रों पर दोबारा वोट डाले जाएंगे और मतगणना 24 मई को होगी।
कभी वामपंथ का गढ़, अब टीएमसी का मजबूत क्षेत्र
फाल्टा सीट कभी वाम दलों का मजबूत गढ़ मानी जाती थी, लेकिन 2011 से यह टीएमसी का प्रभावशाली क्षेत्र बन गई। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस सीट का परिणाम मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी की सरकार की स्थिरता पर असर नहीं डालेगा, लेकिन यह जरूर तय कर सकता है कि राज्य में विपक्ष की राजनीति किस दिशा में जाएगी।अगर टीएमसी इस सीट पर तीसरे या चौथे स्थान पर पहुंचती है, तो यह उसके लिए बड़ा राजनीतिक झटका माना जाएगा।
जहांगीर खान की वापसी ने बढ़ाया सियासी ड्रामा
फाल्टा का चुनाव उस समय और चर्चाओं में आ गया जब टीएमसी उम्मीदवार और इलाके के प्रभावशाली नेता जहांगीर खान ने अचानक चुनाव से हटने की घोषणा कर दी। हालांकि नामांकन वापस लेने की समय सीमा खत्म हो चुकी थी, इसलिए उनका नाम तकनीकी रूप से अब भी चुनाव में बना हुआ है।
जहांगीर खान लंबे समय से इलाके में टीएमसी के संगठनात्मक प्रभुत्व का चेहरा माने जाते रहे हैं। लेकिन हाल के दिनों में उन पर राजनीतिक दबाव बढ़ता गया। मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने सार्वजनिक तौर पर कहा था कि “जहांगीर अब मेरी जिम्मेदारी हैं”, जिसे राजनीतिक हलकों में सीधे दबाव के रूप में देखा गया।
‘सिंघम बनाम पुष्पा’ की सियासत
चुनावी अभियान के दौरान जहांगीर खान ने खुद की तुलना फिल्म ‘पुष्पा’ के किरदार से की थी और कहा था कि वह किसी दबाव के आगे नहीं झुकेंगे। यह बयान चुनाव आयोग द्वारा नियुक्त पुलिस पर्यवेक्षक अजय पाल शर्मा के साथ उनके टकराव के बीच आया था। अजय पाल शर्मा अपनी सख्त कार्यशैली के कारण मीडिया में ‘सिंघम’ की छवि के रूप में पेश किए गए थे।जहांगीर खान ने जवाब देते हुए कहा था, “अगर वह सिंघम हैं, तो मैं भी पुष्पा हूं।”
लेकिन बाद में उन्होंने अचानक यू-टर्न लेते हुए चुनाव छोड़ने का फैसला किया और कहा कि वह फाल्टा में “शांति और विकास” चाहते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि सुवेंदु अधिकारी ने क्षेत्र के लिए विशेष विकास पैकेज का वादा किया है।
टीएमसी ने बनाई दूरी
टीएमसी ने जहांगीर खान के फैसले को उनका व्यक्तिगत निर्णय बताया और आरोप लगाया कि भाजपा सरकार बनने के बाद से पार्टी कार्यकर्ताओं को डराया-धमकाया जा रहा है और गिरफ्तारियां की जा रही हैं।
क्या कमजोर हो रहा है टीएमसी का संगठन?
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि फाल्टा की घटनाएं इस बात का संकेत हैं कि 15 साल तक सत्ता में रहने के बाद विपक्ष में पहुंची टीएमसी का स्थानीय संगठन तेजी से कमजोर पड़ रहा है।
राजनीतिक विश्लेषक देबाशीष चक्रवर्ती कहते हैं कि टीएमसी की ताकत सिर्फ चुनावी जीत तक सीमित नहीं थी, बल्कि बूथ स्तर के संगठन और स्थानीय नेटवर्क पर उसकी मजबूत पकड़ भी उसकी शक्ति का आधार थी। फाल्टा में अब यह ढांचा पहले की तुलना में तेजी से टूटता नजर आ रहा है।
कांग्रेस और वाम दलों की नई उम्मीद
कांग्रेस और वाम दल इस चुनाव को अपने लिए बड़ा अवसर मान रहे हैं। पश्चिम बंगाल कांग्रेस अध्यक्ष शुभंकर सरकार ने टीएमसी समर्थकों से अपील की कि वे कांग्रेस उम्मीदवार अब्दुर रज्जाक मोल्ला को वोट दें।कांग्रेस का दावा है कि अब भाजपा के खिलाफ असली लोकतांत्रिक विपक्ष वही बन सकती है, न कि टीएमसी।
अभिषेक बनर्जी के क्षेत्र में बढ़ी राजनीतिक अहमियत
फाल्टा विधानसभा सीट डायमंड हार्बर लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत आती है, जिसका प्रतिनिधित्व अभिषेक बनर्जी करते हैं। अभिषेक को ममता बनर्जी के बाद टीएमसी का दूसरा सबसे शक्तिशाली नेता माना जाता है। इसी वजह से यह चुनाव सिर्फ एक सीट का मुकाबला नहीं, बल्कि टीएमसी की राजनीतिक पकड़ की परीक्षा बन गया है।
भाजपा का आक्रामक अभियान
भाजपा ने इस चुनाव को टीएमसी शासन के दौरान कथित राजनीतिक दबाव और हिंसा के खिलाफ जनमत संग्रह के रूप में पेश किया है। मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने यहां जोरदार प्रचार करते हुए मतदाताओं से भाजपा को भारी जीत दिलाने की अपील की।उन्होंने कहा कि यह पुनर्मतदान फाल्टा में “मतदाताओं के अधिकारों की वापसी” है।
टीएमसी की घटती सक्रियता?
चुनाव प्रचार में टीएमसी के बड़े नेताओं की अनुपस्थिति ने भी कई सवाल खड़े किए हैं। पार्टी के भीतर यह स्वीकार किया जा रहा है कि कई इलाकों में बूथ स्तर पर एजेंट खड़े करने में भी मुश्किल हो रही है। बंगाल की कैडर-आधारित राजनीति में इसे बड़ा नुकसान माना जा रहा है।
क्या बदल रही है बंगाल की राजनीति?
विश्लेषकों का मानना है कि फाल्टा का चुनाव यह तय कर सकता है कि बंगाल की राजनीति अब भाजपा बनाम कांग्रेस-वाम मोर्चा की ओर बढ़ रही है या टीएमसी अभी भी विपक्ष की केंद्रीय ताकत बनी रह पाएगी।हालांकि टीएमसी अब भी खुद को राज्य का प्रमुख विपक्षी दल बता रही है और भाजपा सरकार पर डर का माहौल बनाने का आरोप लगा रही है।

