क्या ममता सरकार का चुनावी नेटवर्क बन चुके हैं दुर्गा पूजा क्लब?
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ज्यादातर रजिस्टर्ड दुर्गा पूजा कमेटियों को पश्चिम बंगाल सरकार से अनुदान मिलता है

क्या ममता सरकार का चुनावी नेटवर्क बन चुके हैं दुर्गा पूजा क्लब?

कहा जा रहा है कि 2011 में ममता बनर्जी के सत्ता में आने के बाद से दुर्गा पूजा क्लबों की भूमिका तेजी से बदली है। पहले ये सामाजिक संस्थाएं थीं, लेकिन अब इनका राजनीतिक इस्तेमाल बढ़ गया है। क्लबों के पदों पर स्थानीय नेताओं की पकड़ मजबूत हुई है


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पश्चिम बंगाल का चुनावी इतिहास बताता है कि यहां सरकारें लंबा टिककर गई हैं। चाहे आज़ादी के बाद के शुरुआती तीन दशक देख लें या उसके बाद लेफ्ट का करीब तीन दशक का राज़ देख लें या अब ममता बनर्जी का 15 साल का शासन। क्रिकेटीय भाषा में कहें तो पश्चिम बंगाल में सरकारें टिककर खेलती रही हैं और इसमें सबसे मददगार रही है सत्ताधारी दल की नेटवर्किंग।

वह नेटवर्किंग कई रूपों में दिखती है लेकिन सबसे ज्यादा लोकप्रिय नेटवर्क है दुर्गा पूजा क्लब, जिसे स्थानीय स्तर पर पाड़ा क्लब भी कहते हैं। पाड़ा क्लब माने मोहल्ले का क्लब। ये दुर्गा पूजा क्लब कई बार चुनावी नेटवर्किंग में बड़े काम आ जाते हैं।

बंगाल में दुर्गा पूजा क्लब का नेटवर्क

रिपोर्ट्स बता रही हैं कि राज्य में करीब एक लाख पाड़ा क्लब यानी मोहल्ला क्लब यानी दुर्गा पूजा क्लब सक्रिय हैं। ज्यादातर रजिस्टर्ड दुर्गा पूजा कमेटियों को पश्चिम बंगाल सरकार से अनुदान मिलता है। रिपोर्ट्स बता रही हैं कि राज्य सरकार ने 2025 में रजिस्टर्ड क्लबों को करीब 495 करोड़ रुपये की सहायता दी।

2018 में यह राशि मात्र 10 हजार रुपये प्रति क्लब थी, जो अब बढ़कर 1.1 लाख रुपये तक पहुंच चुकी है। कुल मिलाकर अब तक 3,500 से 5,000 करोड़ रुपये क्लबों पर खर्च किए जा चुके हैं। इसके अलावा, क्लबों को हर साल 2 लाख रुपये तक की सहायता, बिजली बिल में 80% छूट, फायर लाइसेंस और अन्य सरकारी फीस में राहत भी दी जाती है।

चूंकि इन दुर्गा पूजा क्लबों में बहुत चीजें शामिल हैं, लिहाजा इसके जरिये कई लोग अपनी राजनीति भी चमकाते हैं। जानकार बताते हैं कि इन दुर्गा पूजा कमेटियों में टीएमसी के लोग खासे सक्रिय हैं। कई क्लबों के अहम पदों पर टीएमसी के स्थानीय नेता काबिज हैं। विरोधी तो ये आरोप लगाते रहे हैं कि कई दुर्गा पूजा क्लब ममता सरकार का चुनावी नेटवर्क बन चुके हैं।

लेकिन 'द फेडरल' के नॉर्थ ईस्ट एडिटर समीर पुरकायस्थ कहते हैं, "दुर्गा पूजा कमेंटियों को सरकार से फंड ज़रूर मिलता है लेकिन ये कमेटियां टीएमसी की वोटिंग मशीनरी बन चुकी हैं, यह कहना ग़लत होगा। पश्चिम बंगाल में सभी रजिस्टर्ड पूजा कमेटियों को सरकारी अनुदान मिलता है, चाहे उसमें किसी भी राजनीतिक दल या विचारधारा से जुड़े लोग हों। बहुत सी पूजा कमेटियां ऐसी भी हैं जिनको कि बीजेपी से जुड़े या बीजेपी समर्थक लोग लीड करते हैं। इसलिए यह कहना ग़लत होगा कि इन क्लबों के जरिये टीएमसी चुनाव में फायदा उठा रही है।"

दुर्गा पूजा क्लब और राजनीति

असल में पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा सबसे बड़ा लोकोत्सव है और अभी से नहीं, इन आयोजनों को शुरू से ही सरकारी मदद मिलती रही है। चाहे किसी भी विचारधारा या किसी भी दल की सरकार रही हो। और दुर्गा पूजा कमेटियां भी कोई आज की नहीं बनी हैं। कई तो दशकों पुरानी हैं।

पश्चिम बंगाल में जब करीब 3 दशक तक लेफ्ट पार्टियों का राज रहा, तब भी दुर्गा पूजा होती थी, भले ही तब सरकार के लोग उसमें शामिल नहीं होते थे। लेकिन कांग्रेस के बड़े नेता दुर्गा पूजा आयोजनों में शरीक होते थे।

समीर पुरकायस्थ कहते हैं,"बाद में तो दुर्गा पूजा भी नेताओं के नाम से पहचानी जाने लगी। जैसे कांग्रेस के प्रणब मुखर्जी के घर में होती थी। सौमिन मित्रा और सुब्रतो मुखर्जी करते थे। ममता बनर्जी का राज आया तो उनकी पार्टी और सरकार ने भी दुर्गा पूजा की उस विरासत को वैसे ही बनाए रखा। बल्कि दुर्गा पूजा में तो हिंदू ही नहीं, मुस्लिम भी किसी न किसी रूप में शामिल होते हैं। पश्चिम बंगाल सरकार के शहरी विकास मंत्री बॉबी हकीम, जोकि मुस्लिम हैं, एक पूजा का आयोजन उनके नाम से पहचाना जाता है।"

टीएमसी नेता अरुण विश्वास की दुर्गा पूजा की भी अपनी पहचान है। कुछ दुर्गा पूजा आयोजन बीजेपी नेताओं की पहचान से जुड़ गए हैं जैसे सजल घोष कराते हैं। पिछली बार तो उन्होंने दुर्गा पूजा में ऑपरेशन सिंदूर को दर्शाया था।

समीर पुरकायस्थ कहते हैं, "कालीघाट में जो पूजा कमेटी है, उसमें ममता बनर्जी के भाई काफी इनवॉल्व रहते हैं। दो साल पहले उस कमेटी का अध्यक्ष बीजेपी का कोई स्थानीय नेता बन गया था। तो इसलिए ये कहना कि दुर्गा पूजा कमेटियां टीएमसी के लिए काम कर रही हैं और हर क्लब को टीएमसी के लोग ही चला रहे हैं, यह कहना गलत होगा। अगर ऐसा होता तो फिर टीएमसी के खिलाफ कोई पार्टी उभर ही नहीं पाती।"

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