
बंगाल में रिकॉर्ड मतदान के मायने क्या? सी के बोस बोले—TMC के पक्ष में रुझान
बंगाल में ज्यादा वोटिंग को बदलाव नहीं बल्कि SIR, महिला भागीदारी को बताया जा रहा है। नेताजी सुभाष चंद्र बोस के प्रपौत्र चंद्र कुमार बोस ने विपक्ष की नाकामी बताया है।
पश्चिम बंगाल में 23 अप्रैल को हुए पहले चरण के मतदान में रिकॉर्ड मतदान प्रतिशत ने राजनीतिक हलकों में चर्चा जरूर तेज कर दी है, लेकिन इसे सत्ता परिवर्तन का संकेत मानना जल्दबाजी होगी। यह मानना है तृणमूल कांग्रेस (TMC) के नेता और नेताजी सुभाष चंद्र बोस के प्रपौत्र चंद्र कुमार बोस का। उनके अनुसार, यह उच्च मतदान दर दरअसल संरचनात्मक कारणों और सत्तारूढ़ TMC के बढ़ते समर्थन को दर्शाती है, जबकि विपक्ष की रणनीति उलटी पड़ती दिख रही है।
चंद्र कुमार बोस पहले भारतीय जनता पार्टी (BJP) में थे और पश्चिम बंगाल में उसके उपाध्यक्ष रह चुके हैं। उन्होंने 2016 के विधानसभा चुनाव में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के खिलाफ चुनाव भी लड़ा था और 2019 के लोकसभा चुनाव में भी हिस्सा लिया था। हाल ही में उन्होंने TMC जॉइन की और बीजेपी में शामिल होने के अपने फैसले को “ऐतिहासिक भूल” बताया।
द फेडरल से बातचीत में बोस ने राज्य की बदलती राजनीतिक स्थिति, बीजेपी छोड़ने के अपने फैसले और इसके राष्ट्रीय प्रभावों पर विस्तार से बात की। यह बातचीत ऐसे समय में हुई है जब बंगाल में चुनावी माहौल बेहद गरम है और मतदाता सूची संशोधन, शासन और राजनीतिक पुनर्संरचना को लेकर आरोप-प्रत्यारोप जारी हैं।
पहले चरण में असामान्य रूप से अधिक मतदान को लेकर बोस कहते हैं कि बंगाल में ऐतिहासिक रूप से मतदान प्रतिशत हमेशा ऊंचा रहा है और इससे जरूरी नहीं कि सरकार बदल जाए। 2011, 2016 और 2021 के चुनावों में भी मतदान 80 प्रतिशत से अधिक रहा था। इस बार प्रतिशत और बढ़ा है, जिसके पीछे दो प्रमुख कारण हो सकते हैं।
पहला कारण विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया है, जिसके तहत करीब एक करोड़ मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटाए गए। ऐसे में यदि मतदान करने वालों की संख्या लगभग समान रही, तो कुल मतदाताओं की संख्या घटने के कारण प्रतिशत स्वाभाविक रूप से बढ़ जाएगा।
दूसरा कारण महिलाओं की बढ़ती भागीदारी है। इस बार बड़ी संख्या में महिलाएं मतदान के लिए बाहर आई हैं और वे ममता बनर्जी की योजनाओं से प्रभावित होकर TMC का समर्थन कर रही हैं। साथ ही SIR प्रक्रिया को लेकर भ्रम के कारण मतदाताओं में यह डर भी है कि उनका मतदान अधिकार छिन सकता है, इसलिए वे अपने अधिकार की रक्षा के लिए वोट देने निकले।
बोस का मानना है कि बीजेपी में शामिल होना उनकी “ऐतिहासिक भूल” थी, जिसे उन्होंने अब ममता बनर्जी के साथ जुड़कर सुधार लिया है। उनके अनुसार, पहले चरण का मतदान TMC और ममता बनर्जी के पक्ष में जाता दिख रहा है, भले ही सत्ता विरोधी लहर की कुछ बातें सामने आ रही हों।
चुनाव प्रक्रिया में बड़े पैमाने पर अधिकारियों के तबादलों पर भी उन्होंने चिंता जताई। उनके मुताबिक, चुनाव के दौरान निर्वाचन आयोग प्रशासन संभालता है, लेकिन इस स्तर पर तबादले पहले कभी नहीं देखे गए। इससे यह संदेश जाता है कि मौजूदा प्रशासन पर भरोसा नहीं है और इससे “हमारे” और “उनके” जैसे विभाजन पैदा होते हैं।
उन्होंने कहा कि सरकारी अधिकारियों का दायित्व संविधान के प्रति होता है, न कि किसी राजनीतिक दल के प्रति। इस तरह के कदमों से नौकरशाही और पुलिस बल का मनोबल कमजोर होता है।जहां तक TMC के समर्थन आधार की बात है, बोस का कहना है कि उत्तर बंगाल में पहले बीजेपी को कुछ समर्थन था, लेकिन इस बार वह कमजोर दिख रही है क्योंकि वहां उसका संगठन मजबूत नहीं है। धार्मिक ध्रुवीकरण की राजनीति बंगाल में पसंद नहीं की जाती। बंगाली समाज आध्यात्मिक जरूर है, लेकिन राजनीति में धर्म का हस्तक्षेप स्वीकार नहीं करता।
दक्षिण बंगाल में TMC अब भी मजबूत स्थिति में है। बीजेपी के पास वहां मजबूत संगठन या मुख्यमंत्री पद का स्पष्ट चेहरा नहीं है, जबकि ममता बनर्जी एक जननेता के रूप में लोगों से सीधा जुड़ाव रखती हैं।
मतदाता सूची संशोधन (SIR) को लेकर बोस का आरोप है कि यह TMC के वोट बैंक को प्रभावित करने की कोशिश थी, लेकिन यह उल्टा पड़ गया। कई हिंदू मतदाताओं के नाम भी हट गए, जिससे व्यापक असंतोष पैदा हुआ। रोहिंग्या मतदाताओं को लेकर किए गए दावों के समर्थन में कोई ठोस सबूत सामने नहीं आया।उन्होंने बताया कि सम्मानित परिवारों, स्वतंत्रता सेनानियों के वंशजों और पेशेवरों के नाम भी सूची से हटे, जिससे ग्रामीण इलाकों में लोगों को लंबी दूरी तय करनी पड़ी और उन्हें काफी परेशानी हुई। इस पूरी प्रक्रिया ने सभी वर्गों में नाराजगी पैदा की है, जिसका फायदा TMC को मिल सकता है।
बोस का मानना है कि मतदाताओं के नाम हटाने की प्रक्रिया किसी हद तक सोची-समझी रणनीति लगती है, लेकिन इसका लाभ बीजेपी को नहीं मिल पाएगा क्योंकि प्रभावित लोग उसके खिलाफ जा सकते हैं।सत्ता विरोधी लहर के सवाल पर उन्होंने कहा कि लंबे समय तक सरकार में रहने पर ऐसी स्थिति स्वाभाविक है, लेकिन बंगाल के बारे में गलत छवि पेश की जा रही है। केंद्र से पर्याप्त सहयोग न मिलने के बावजूद TMC ने 100 से अधिक योजनाएं लागू की हैं। कन्याश्री को वैश्विक पहचान मिली है, स्वास्थ्य साथी योजना सार्वभौमिक स्वास्थ्य सुरक्षा देती है और लक्ष्मी भंडार जैसी योजनाएं सीधे लोगों को लाभ पहुंचाती हैं।
उन्होंने यह भी कहा कि राज्य GDP योगदान में तीसरे स्थान पर है और यह कहना गलत है कि यहां उद्योग या व्यापार नहीं है।बीजेपी छोड़कर TMC में आने के अपने फैसले पर बोस ने कहा कि उन्होंने 2014 में नरेंद्र मोदी के विकास एजेंडे का समर्थन किया था, लेकिन कई वादे पूरे नहीं हुए। समय के साथ उन्हें राजनीति में बढ़ता विभाजन नजर आया, जो भारत की विविधता और समावेशी संविधान के खिलाफ है।
उन्होंने बताया कि उन्हें नेताजी सुभाष चंद्र बोस के विचारों को बढ़ावा देने के लिए मंच देने का वादा किया गया था, लेकिन सात साल में ऐसा नहीं हुआ। इससे उन्हें एहसास हुआ कि बीजेपी का दृष्टिकोण संविधान की समावेशी भावना के विपरीत है।ममता बनर्जी द्वारा राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी दलों को एकजुट करने की अपील को बोस ने देशहित में बताया। उनके अनुसार, यह सत्ता के लिए नहीं बल्कि देश की एकता और अखंडता को बचाने के लिए जरूरी है।उन्होंने चेतावनी दी कि यदि विभाजनकारी राजनीति जारी रही, तो देश को नुकसान हो सकता है। बंगाल ने इतिहास में हमेशा राह दिखाई है और वह फिर ऐसा कर सकता है।
अपने भविष्य की भूमिका को लेकर बोस ने कहा कि उन्हें व्यक्तिगत पद या लाभ की इच्छा नहीं है। उनका लक्ष्य देशभर में समावेशी सोच रखने वाले नेताओं और दलों को एकजुट करना है, ताकि भारत की एकता को मजबूत किया जा सके—वही एकता जिसके लिए नेताजी और सरत चंद्र बोस ने संघर्ष किया था।

