
असम में बीजेपी की ताकत बने हिमंता बिस्वा सरमा, जीत के प्रमुख रणनीतिकार
हिमंत बिस्वा सरमा ने छात्र राजनीति से उठकर असम में बीजेपी को मजबूत करते हुए खुद को प्रभावशाली नेता के रूप में स्थापित किया, जिनकी राजनीति विकास और विवाद दोनों से जुड़ी है।
असम की राजनीतिक तस्वीर में कुछ ही नेता ऐसे रहे हैं जिन्होंने सत्ता की दिशा को उतनी तीव्रता से बदला हो, जितना Himanta Biswa Sarma ने किया है। दो दशकों के अपने राजनीतिक सफर में उन्होंने छात्र राजनीति से लेकर कांग्रेस के रणनीतिक गलियारों तक और फिर राज्य के सबसे प्रभावशाली चेहरे बनने तक का लंबा रास्ता तय किया है। वे जहां अपनी प्रशासनिक क्षमता और राजनीतिक कौशल के लिए सराहे जाते हैं, वहीं सामाजिक विभाजन को गहरा करने के आरोपों के कारण आलोचना का भी सामना करते हैं।
10 मई 2021 से असम के 15वें मुख्यमंत्री के रूप में कार्यरत सरमा का उदय साधारण नहीं रहा। पेशे से वकील, जलुकबाड़ी से पांच बार विधायक और पूर्वोत्तर में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के प्रमुख रणनीतिकारों में से एक, उन्होंने अपनी पहचान मजबूत संगठन क्षमता और परिणाम देने वाले नेता के रूप में बनाई है।
2026 के विधानसभा चुनावों की मतगणना के दौरान जब दोपहर तक बीजेपी 126 में से 79 सीटों पर बढ़त या जीत दर्ज करती दिखी, तो सरमा राज्य में पार्टी के सबसे बड़े चेहरों में शामिल हो गए।
छात्र राजनीति से शुरुआत
सरमा की राजनीति की शुरुआत असम के छात्र आंदोलनों के दौर में हुई। All Assam Students’ Union से जुड़ाव ने उन्हें 1979 से 1985 तक चले असम आंदोलन के दौरान राज्य के प्रमुख मुद्दों—पहचान, प्रवासन और असमिया अस्मिता—के करीब ला दिया।कॉटन कॉलेज में वे एक सक्रिय छात्र नेता के रूप में उभरे और बाद में गुवाहाटी उच्च न्यायालय में वकालत शुरू की।
कांग्रेस में उभार
2001 में उन्होंने जलुकबाड़ी सीट से कांग्रेस के टिकट पर चुनाव जीतकर विधानसभा में प्रवेश किया, जहां उन्होंने असम गण परिषद (AGP) के एक वरिष्ठ नेता को हराया। यह जीत उनके राजनीतिक करियर का टर्निंग पॉइंट साबित हुई। Tarun Gogoi के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार में उन्होंने तेजी से प्रभाव बढ़ाया। स्वास्थ्य, शिक्षा, वित्त और योजना जैसे महत्वपूर्ण विभाग संभालते हुए उन्होंने 2006 और 2011 में कांग्रेस की जीत में अहम भूमिका निभाई।कई लोगों के लिए वे गोगोई के उत्तराधिकारी के रूप में भी देखे जाने लगे थे।
बीजेपी में शामिल होकर बदली राजनीति
2015 में कांग्रेस नेतृत्व से मतभेदों के बाद सरमा ने पार्टी छोड़ दी। उन्होंने संगठन में खामियों और नेतृत्व की विफलता का आरोप लगाया।बीजेपी में शामिल होना सिर्फ पार्टी बदलना नहीं था, बल्कि इससे असम की राजनीति की दिशा बदल गई। Amit Shah के नेतृत्व में उन्होंने 2016 में बीजेपी की जीत में निर्णायक भूमिका निभाई और पार्टी को सत्ता तक पहुंचाया।Sarbananda Sonowal की सरकार में वे एक मजबूत स्तंभ बने रहे। 2021 में बीजेपी की वापसी के बाद उनका मुख्यमंत्री बनना लगभग तय माना जा रहा था।
प्रशासनिक शैली और विकास एजेंडा
मुख्यमंत्री बनने के बाद सरमा ने खुद को एक ऊर्जावान और सक्रिय प्रशासक के रूप में पेश किया। सड़क निर्माण, डिजिटल सेवाएं, भूमि सुधार, स्वास्थ्य विस्तार और निवेश को बढ़ावा देना उनके शासन का मुख्य आधार रहा।‘ओरुनोदोई’ योजना (महिलाओं को आर्थिक सहायता) और ‘मिशन बसुंधरा’ (भूमि सेवाओं को आसान बनाना) जैसी योजनाओं ने उनकी ‘प्रो-गवर्नेंस’ छवि को मजबूत किया।उनके समर्थक उनके कार्यकाल को तेज प्रशासन और बेहतर कानून-व्यवस्था के लिए याद करते हैं।
सुरक्षा और स्थिरता पर फोकस
सरमा के कार्यकाल में असम में कई शांति समझौते हुए, उग्रवादियों ने आत्मसमर्पण किया और हिंसा में कमी आई। इससे उनकी सरकार को स्थिरता और सुरक्षा पर केंद्रित माना गया।
विकास के साथ विवाद भी
सरमा की राजनीति केवल विकास तक सीमित नहीं है। अवैध प्रवास के खिलाफ सख्त रुख, अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई, मदरसा नीति में बदलाव और जनसांख्यिकीय मुद्दों पर जोर ने उन्हें एक विवादास्पद नेता भी बनाया है।समर्थकों के लिए ये कदम असम की पहचान और सुरक्षा के लिए जरूरी हैं, जबकि आलोचक इन्हें अल्पसंख्यकों, खासकर बंगाली भाषी मुसलमानों के खिलाफ मानते हैं।यही सरमा की राजनीति की विशेषता है—विकास और टकराव साथ-साथ चलते हैं।
आक्रामक राजनीतिक शैली
एक वक्ता के रूप में सरमा की शैली सीधी, आक्रामक और स्पष्ट है। वे एक पारंपरिक प्रशासक से ज्यादा एक सक्रिय चुनावी नेता की तरह नजर आते हैं, जो लगातार जनता के बीच मौजूद रहता है।
आगे की चुनौतियां
आने वाले समय में सरमा के सामने सबसे बड़ी चुनौती इस गति को बनाए रखने की होगी। रोजगार, आर्थिक विकास, सामाजिक संतुलन और क्षेत्रीय तनाव जैसे मुद्दे उनके नेतृत्व की असली परीक्षा होंगे।उनके समर्थकों के लिए वे निर्णायक नेतृत्व और तेज विकास का चेहरा हैं, जबकि विरोधियों के लिए वे ऐसी राजनीति का प्रतीक हैं जो सामाजिक विभाजन को बढ़ा सकती है।लेकिन एक बात स्पष्ट है—आधुनिक असम की राजनीति में हिमंत बिस्वा सरमा अब सिर्फ सत्ता के खिलाड़ी नहीं, बल्कि सत्ता की दिशा तय करने वाले प्रमुख नेता बन चुके हैं।

