पुराने साथी ने ही डुबोई स्टालिन की नैया, कोलाथुर विधानसभा सीट पर वीएस बाबू की ऐतिहासिक जीत
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पुराने साथी ने ही डुबोई स्टालिन की नैया, कोलाथुर विधानसभा सीट पर वीएस बाबू की ऐतिहासिक जीत

तमिलनाडु विधानसभा चुनाव 2026 में सबसे बड़ा उलटफेर कोलाथुर सीट पर देखने को मिला, जहाँ मुख्यमंत्री एमके स्टालिन को उनके पूर्व सहयोगी और TVK उम्मीदवार वीएस बाबू ने 9,192 वोटों से हरा दिया। वीएस बाबू कभी स्टालिन के इलेक्शन एजेंट थे।


तमिलनाडु की राजनीति में आज एक ऐसा उलटफेर हुआ है जिसकी कल्पना शायद ही किसी ने की होगी। राज्य के मुख्यमंत्री और द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) के अध्यक्ष एमके स्टालिन अपने ही सबसे मजबूत गढ़ कोलाथुर विधानसभा क्षेत्र से चुनाव हार गए हैं। उन्हें अभिनेता से राजनेता बने 'थलापति' विजय की पार्टी तमिझागा वेत्री कड़गम (TVK) के उम्मीदवार वीएस बाबू ने करारी मात दी है। यह जीत न केवल TVK के लिए संजीवनी है, बल्कि तमिलनाडु की द्रविड़ राजनीति के भविष्य पर भी एक बड़ा सवालिया निशान लगाती है।

मतगणना के आंकड़ों ने चौंकाया

सोमवार को हुई मतगणना के 21 राउंड के बाद जो आंकड़े सामने आए, उन्होंने पूरे देश का ध्यान कोलाथुर की ओर खींच लिया। चुनाव आयोग के आंकड़ों के मुताबिक, TVK के वीएस बाबू को कुल 82,180 वोट मिले, जबकि मुख्यमंत्री एमके स्टालिन को 72,988 वोटों पर संतोष करना पड़ा। इस तरह स्टालिन को 9,192 वोटों के अंतर से हार का सामना करना पड़ा। वहीं, एआईएडीएमके (AIADMK) के उम्मीदवार 18,182 वोटों के साथ काफी पीछे तीसरे नंबर पर रहे और नाम तमिलर कात्ची (NTK) को महज 4,974 वोट मिले।

कल का 'सारथी', आज बना 'काल'

इस जीत के पीछे की कहानी किसी फिल्मी स्क्रिप्ट से कम नहीं है। वीएस बाबू, जिन्होंने आज स्टालिन को हराया है, वह कभी उनके सबसे खास करीबियों में शुमार थे। एक वक्त था जब बाबू, स्टालिन के इलेक्शन एजेंट हुआ करते थे और उन्हीं के कंधे से कंधा मिलाकर कोलाथुर में चुनाव लड़वाते थे। डीएमके में रहते हुए वह जिला सचिव के पद तक पहुंचे, लेकिन बाद में पार्टी के भीतर मतभेदों के चलते उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया गया।

डीएमके छोड़ने के बाद बाबू ने पहले एआईएडीएमके का दामन थामा और फिर विजय की पार्टी TVK में शामिल हो गए। आज उसी पुराने 'वफादार' ने अपने ही पूर्व आका को उनके ही घर में मात देकर 'राजनीतिक प्रतिशोध' की सबसे बड़ी कहानी लिख दी है।

30 साल पुराना इतिहास दोहराया गया

राजनीतिक विशेषज्ञ स्टालिन की इस हार की तुलना साल 1996 के ऐतिहासिक उलटफेर से कर रहे हैं। उस साल एआईएडीएमके की तत्कालीन सुप्रीमो जे. जयललिता बरगुर (Bargur) सीट से अपना चुनाव हार गई थीं। उन्हें डीएमके के एक साधारण कार्यकर्ता सुकवनम ने करीब 8,000 वोटों से हराया था। ठीक उसी तरह, आज स्टालिन की हार ने साबित कर दिया है कि लोकतंत्र में कोई भी किला 'अजेय' नहीं होता। जयललिता की उस हार ने एआईएडीएमके के पतन की शुरुआत की थी, और अब डर इस बात का है कि क्या स्टालिन की यह हार डीएमके के लिए वही संकेत दे रही है?

TVK के लिए 'बूस्टर डोज़' और DMK के लिए चेतावनी

विजय की पार्टी TVK के लिए यह महज एक सीट की जीत नहीं है। मुख्यमंत्री को हराने का मतलब है कि विजय की पार्टी अब तमिलनाडु में एक मजबूत 'तीसरे विकल्प' के रूप में स्थापित हो चुकी है। कोलाथुर का यह नतीजा बताता है कि तमिलनाडु का मतदाता अब पारंपरिक द्रविड़ दलों (DMK और AIADMK) से ऊब चुका है और नए चेहरों की तलाश में है।

स्टालिन के लिए यह हार किसी गहरे जख्म से कम नहीं है। कोलाथुर वह क्षेत्र है जिसे उन्होंने खुद संवारा था, जहां से वह लगातार तीन बार (2011, 2016 और 2021) विधायक रहे। अपने ही क्षेत्र में जनता का भरोसा खोना डीएमके के सांगठनिक ढांचे की कमजोरी और जनता के बीच बढ़ती नाराजगी को दर्शाता है।

तमिलनाडु की राजनीति अब एक नए मोड़ पर खड़ी है। वीएस बाबू की जीत ने यह साबित कर दिया है कि कल के वफादार आज के सबसे खतरनाक विरोधी बन सकते हैं। जहां विजय के समर्थकों में जश्न का माहौल है, वहीं डीएमके खेमे में सन्नाटा पसरा है। क्या यह द्रविड़ राजनीति के एक युग का अंत है और विजय राज की शुरुआत? इसका जवाब तो आने वाले वक्त में मिलेगा, लेकिन 4 मई 2026 की यह तारीख तमिलनाडु के राजनीतिक इतिहास में हमेशा एमके स्टालिन की सबसे बड़ी हार के रूप में दर्ज रहेगी।

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