DMK, BJP और विजय से AIADMK को तगड़ी चुनौती, कोंगु का किला डगमगाया
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DMK, BJP और विजय से AIADMK को तगड़ी चुनौती, कोंगु का किला डगमगाया

तमिलनाडु विधानसभा चुनाव से पहले कोंगु इलाके में DMK की आक्रामक रणनीति, BJP का उभार और विजय की लोकप्रियता बढ़ी है। ये तीनों फैक्टर AIADMK के पारंपरिक दबदबे को कड़ी चुनौती दे रहे हैं।


कोंगु क्षेत्र, जिसे परंपरागत रूप से तमिलनाडु का औद्योगिक केंद्र माना जाता है, 2026 के तमिलनाडु विधानसभा चुनावों के नज़दीक आते ही राजनीतिक समीकरणों में बड़े बदलाव का साक्षी बन रहा है। आर्थिक समृद्धि और एआईएडीएमके (AIADMK) के मजबूत प्रभाव के लिए जाना जाने वाला यह इलाका अब नए खिलाड़ियों के उभार का अनुभव कर रहा है।

डीएमके (DMK) आक्रामक नकद और उपहार आधारित राजनीति के जरिए अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रही है, वहीं अभिनेता विजय की बढ़ती लोकप्रियता भी समीकरण बदल रही है। दूसरी ओर, बीजेपी के उभार और आंतरिक चुनौतियों के कारण एआईएडीएमके की स्थिति पहले जैसी मजबूत नहीं रही। ऐसे में सवाल उठता है—क्या डीएमके की रणनीति और विजय का करिश्मा कोंगु क्षेत्र में एआईएडीएमके के प्रभुत्व को तोड़ पाएगा? आइए, इस क्षेत्र के बदलते राजनीतिक परिदृश्य को विस्तार से समझते हैं।

कोंगु बेल्ट क्या है?

कोंगु बेल्ट, जिसे कोंगु नाडु भी कहा जाता है, तमिलनाडु के पश्चिमी जिलों—कोयंबटूर, तिरुप्पुर, इरोड, नामक्कल और सलेम—से मिलकर बना है। यह क्षेत्र लंबे समय से वस्त्र उद्योग, इंजीनियरिंग और लघु उद्योगों के लिए जाना जाता है और राज्य की औद्योगिक ताकत का प्रमुख केंद्र रहा है। यहां कोंगु वेल्लालर गौंडर समुदाय का वर्चस्व है, जो कुल आबादी का लगभग 30-40 प्रतिशत है और ऐतिहासिक रूप से एआईएडीएमके का समर्थन करता रहा है। इस क्षेत्र में जाति आधारित राजनीति भी अहम रही है, जिसे एआईएडीएमके ने कुशलता से साधकर अपनी पकड़ बनाए रखी।

डीएमके का बढ़ता प्रभाव

कई दशकों तक कोंगु क्षेत्र एआईएडीएमके का गढ़ रहा, लेकिन अब स्थिति बदलती दिख रही है। डीएमके ने यहां आक्रामक तरीके से नकद और उपहार आधारित राजनीति को अपनाया है—जैसे महिलाओं को पायल बांटना—और स्थानीय निकाय चुनावों में भी अपनी पकड़ मजबूत की है। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार अब चुनावों में जाति से ज्यादा पैसा और ठेकेदारों की भूमिका बढ़ गई है। इस रणनीति का असर साफ दिखाई दे रहा है, और डीएमके ने हाल के वर्षों में उल्लेखनीय बढ़त हासिल की है। एआईएडीएमके की आंतरिक समस्याएं और बीजेपी का बढ़ता प्रभाव भी डीएमके को अवसर दे रहे हैं।

बीजेपी का उभार और एआईएडीएमके पर असर

कोंगु क्षेत्र में बीजेपी का उभार एआईएडीएमके के लिए एक और चुनौती बन गया है। खासकर युवा वर्ग में बीजेपी नेता अन्नामलाई की लोकप्रियता ने एआईएडीएमके के पारंपरिक वोट बैंक में सेंध लगाई है। कई विश्लेषकों का मानना है कि एआईएडीएमके के 10-15 प्रतिशत वोट बीजेपी की ओर खिसक चुके हैं। कोयंबटूर बम धमाकों के बाद यहां की राजनीति में बड़ा बदलाव आया, और बीजेपी को महिलाओं तथा युवाओं का समर्थन मिला। अब एआईएडीएमके बीजेपी पर अधिक निर्भर हो गई है, जिससे उसकी स्वतंत्र पकड़ कमजोर पड़ी है।

विजय का बढ़ता प्रभाव

तमिल सिनेमा के लोकप्रिय अभिनेता विजय, जिन्हें “थलापति” कहा जाता है, तेजी से एक महत्वपूर्ण राजनीतिक चेहरा बनते जा रहे हैं। उनकी लोकप्रियता जाति और धर्म की सीमाओं से परे है, और इसका असर आगामी चुनावों में दिख सकता है। विश्लेषकों का अनुमान है कि विजय कोंगु क्षेत्र में लगभग 25 प्रतिशत वोट हासिल कर सकते हैं, जिससे एआईएडीएमके और डीएमके दोनों को नुकसान हो सकता है। माना जा रहा है कि जिस कोंगु क्षेत्र ने कभी एमजीआर और जयललिता को बड़ी जीत दिलाई थी, वही अब विजय के पक्ष में जा सकता है।

डीएमके की नकद और उपहार रणनीति

कोंगु क्षेत्र में जीत हासिल करने के लिए डीएमके ने नकद और उपहार आधारित राजनीति को अपनी रणनीति का अहम हिस्सा बनाया है। पार्टी मुफ्त बस यात्रा, सस्ती नाश्ता योजनाएं और महिलाओं के लिए आर्थिक सहायता जैसी योजनाओं के जरिए मतदाताओं को आकर्षित कर रही है। हालांकि विरोधी दल इसकी आलोचना करते हैं, लेकिन यह रणनीति खासकर उन क्षेत्रों में असरदार साबित हो रही है जहां जाति आधारित राजनीति का प्रभाव कम हो रहा है। जयललिता के समय में मजबूत जातीय संगठनों को उभरने से रोका गया था, जिससे कोंगु वेल्लालर गौंडर समुदाय एआईएडीएमके का चेहरा बन गया। अब डीएमके की कल्याणकारी योजनाएं इस समीकरण को बदल रही हैं।

कोंगु का भविष्य

अब कोंगु क्षेत्र पहले जैसा एआईएडीएमके का मजबूत गढ़ नहीं रहा। डीएमके की आक्रामक रणनीति, बीजेपी का हिंदुत्व आधारित उभार और विजय की लोकप्रियता—इन सभी ने राजनीतिक समीकरणों को पूरी तरह बदल दिया है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या डीएमके पूरी तरह इस क्षेत्र में अपनी पकड़ बना पाएगी या एआईएडीएमके, बीजेपी के साथ मिलकर खोई जमीन वापस हासिल करेगी।

2026 के चुनावों के करीब आते-आते कोंगु क्षेत्र के मतदाता निर्णायक भूमिका निभाने वाले हैं, और सभी राजनीतिक दल उन्हें अपने पक्ष में करने के लिए हर संभव प्रयास कर रहे हैं। कोंगु की राजनीति का भविष्य अनिश्चित जरूर है, लेकिन इतना तय है कि बदलाव की लहर तेज हो चुकी है।

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