
'हम विपक्ष से नहीं, गद्दारों से लड़ रहे हैं', असम एग्जिट पोल में बड़ी जीत का अनुमान, पर भीतर मची खलबली
भले ही एग्जिट पोल असम में बीजेपी-एनडीए की बड़ी जीत की भविष्यवाणी कर रहे हैं, लेकिन सत्ताधारी गठबंधन के भीतर जबरदस्त असंतोष और बगावत देखने को मिल रही है। 4 मई के नतीजों से पहले असम में सस्पेंस और डर का माहौल है।
असम विधानसभा चुनाव 2026 के संपन्न होने के बाद आए तमाम एग्जिट पोल्स (Exit Polls) एक सुर में भारतीय जनता पार्टी (BJP) के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) की प्रचंड जीत की भविष्यवाणी कर रहे हैं। 'टुडेज चाणक्य' जैसे प्रमुख पोलस्टर्स ने तो एनडीए को 100 से अधिक सीटें मिलने का अनुमान जताया है। लेकिन, इन चमकते हुए आंकड़ों के पीछे की हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है। सत्ताधारी खेमे के भीतर सब कुछ सामान्य नहीं है। सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित आत्मविश्वास के पीछे भीतरघात, धोखे के आरोप, बागियों के अभियान और उम्मीदवारों के चयन को लेकर जमीनी कार्यकर्ताओं का गुस्सा उबल रहा है।
बीजेपी के भीतर 'गद्दार' युद्ध
असम बीजेपी में जारी यह असंतोष तब सार्वजनिक हो गया जब पार्टी के कद्दावर नेता और कैबिनेट मंत्री रंजीत कुमार दास ने अपनी ही पार्टी के सदस्यों पर गंभीर आरोप लगाए। भवानीपुर-सरभोग निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव लड़ रहे दास ने फेसबुक पर एक विस्फोटक पोस्ट साझा की। उन्होंने लिखा, "इस चुनाव में मैं सिर्फ सीपीआई (एम) से नहीं लड़ रहा हूं, बल्कि अपनी ही पार्टी के भीतर मौजूद 'गद्दारों' से भी लड़ रहा हूं। मैं 4 मई (नतीजों का दिन) से पहले उनका पर्दाफाश करूंगा और उन्हें उचित मंच के सामने रखूंगा।"
रंजीत दास का यह सार्वजनिक गुस्सा बीजेपी के उन पुराने और वफादार कार्यकर्ताओं की हताशा को दर्शाता है, जो मानते हैं कि पार्टी का संगठनात्मक ढांचा अब पहले जैसा एकजुट नहीं रहा। विवाद इतना बढ़ गया कि असम बीजेपी के अध्यक्ष दिलीप सैकिया को हस्तक्षेप करना पड़ा। उन्होंने सोशल मीडिया पर "गद्दार" जैसे शब्दों के इस्तेमाल पर सख्त चेतावनी दी और कहा कि ऐसी भाषा पार्टी के मूल्यों और विचारधारा के खिलाफ है। लेकिन, सैकिया की चेतावनी के बावजूद भीतर खाने गुस्सा शांत नहीं हुआ है। कई सीटों पर कार्यकर्ताओं ने बाहरी तौर पर तो प्रचार किया, लेकिन निजी रंजिश के कारण वोट ट्रांसफर करने से मना कर दिया।
गठबंधन धर्म और विश्वासघात के आरोप
बीजेपी के साथ-साथ उसके सहयोगी दल 'असोम गण परिषद' (AGP) के भीतर भी स्थिति चिंताजनक है। एजीपी नेताओं का आरोप है कि बीजेपी के कार्यकर्ताओं ने 'गठबंधन धर्म' का पालन नहीं किया। बोंगाईगांव निर्वाचन क्षेत्र में वरिष्ठ एजीपी नेता और सांसद फणी भूषण चौधरी ने खुलेआम बीजेपी कार्यकर्ताओं पर उनकी पार्टी की उम्मीदवार दीप्तिमयी चौधरी के खिलाफ निर्दलीय उम्मीदवार चक्रधर दास का समर्थन करने का आरोप लगाया। चौधरी ने इसे "स्लीपर सेल" की तरह काम करना बताया और इसे गठबंधन के साथ विश्वासघात करार दिया।
एजीपी के भीतर यह पुरानी टीस फिर से उभर आई है कि वे तो बीजेपी को अपना वोट पूरी निष्ठा से ट्रांसफर करते हैं, लेकिन बदले में उन्हें बीजेपी कार्यकर्ताओं का वैसा सहयोग नहीं मिलता। कमलपुर और रंगिया जैसी सीटों पर भी हालात बेहद खराब रहे। एक कथित ऑडियो क्लिप वायरल हुई, जिसमें बीजेपी विधायक दिगंत कलिता को विश्वासघात करने वालों को धमकी देते हुए सुना गया।
बगावत की लंबी फेहरिस्त: हाजो से गोलापाड़ा तक
असम के कई अन्य निर्वाचन क्षेत्रों से भी इसी तरह की खबरें सामने आई हैं। दिसपुर में बीजेपी के वरिष्ठ नेता जयंत कुमार दास ने पार्टी के आधिकारिक उम्मीदवार के खिलाफ निर्दलीय चुनाव लड़कर समीकरण बिगाड़ दिए हैं। हाजो में बीजेपी कार्यकर्ताओं का गुस्सा इस बात पर था कि वहां बीजेपी के बजाय एजीपी के उम्मीदवार को टिकट दिया गया। टिटाबार में एक महिला बीजेपी नेता ने खुलेआम निर्दलीय उम्मीदवार के लिए वोट मांगे, जबकि गोलापाड़ा पूर्व में एजीपी उम्मीदवार अब्दुल रहीम जिब्रान ने सार्वजनिक रूप से बीजेपी पदाधिकारियों पर पीठ में छुरा घोंपने का आरोप लगाया।
पुराने बनाम नए: विचारधारा की लड़ाई
इस पूरे उथल-पुथल के केंद्र में एक गहरी वैचारिक और संगठनात्मक लड़ाई है। यह लड़ाई बीजेपी के उन पुराने कार्यकर्ताओं (आरएसएस समर्थित कैडर) और उन नए नेताओं के बीच है जो हाल के वर्षों में कांग्रेस या अन्य दलों से बीजेपी में शामिल हुए हैं। पुराने कार्यकर्ताओं का मानना है कि उन्होंने दशकों तक खून-पसीना बहाकर जिस संगठन को खड़ा किया, अब उस पर नए लोगों का कब्जा हो गया है और उन्हें दरकिनार किया जा रहा है।
राजनीतिक विश्लेषक प्रसेनजीत बिस्वास का कहना है कि असम की राजनीति में इस स्तर का खुला असंतोष पहली बार देखा गया है। जब वरिष्ठ मंत्री विपक्ष से ज्यादा अपनी ही पार्टी के 'गद्दारों' की चर्चा करने लगें, तो समझ जाना चाहिए कि संगठन के भीतर दरारें बहुत गहरी हो चुकी हैं। बीजेपी अब तक इन दरारों को छिपाने में कामयाब रही थी, लेकिन 2026 के इस चुनाव ने उन्हें पूरी तरह उजागर कर दिया है।
हालांकि एग्जिट पोल बीजेपी की वापसी का संकेत दे रहे हैं, लेकिन अगर 4 मई को नतीजे उम्मीद के मुताबिक नहीं रहे, तो इन 'गद्दारों' और 'भीतरघातियों' पर बड़ी गाज गिर सकती है। असम की सत्ता पर काबिज होने के बावजूद, बीजेपी के लिए आने वाले दिन संगठनात्मक रूप से चुनौतीपूर्ण होने वाले हैं।

