बंगाल चुनाव पर SIR विवाद की छाया, मातुआ वोटर में दो फाड़
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बंगाल चुनाव पर SIR विवाद की छाया, मातुआ वोटर में दो फाड़

पश्चिम बंगाल में SIR के दौरान हजारों मातुआ मतदाताओं के नाम कटने से नाराजगी है। लेकिन नागरिकता की उम्मीद के चलते BJP पर भरोसा पूरी तरह नहीं टूटा है।


उमस भरी दोपहर में, पश्चिम बंगाल के चुनावी माहौल वाले उत्तर 24 परगना जिले के एक शांत मातुआ गांव गुटरी में अपने पारिवारिक मंदिर की देहरी पर बैठे आनंद बिस्वास पुराने कागज़ों का एक पुलिंदा सावधानी से खोलते हैं। 1964 का प्रवासन प्रमाण पत्र, ज़मीन का दस्तावेज़, और दशकों पुराना राशन कार्ड।

उनका कहना है कि हर दस्तावेज़ यह कहानी बताता है कि उनका परिवार आज के बांग्लादेश से भारत कैसे आया और यहां अपनी ज़िंदगी फिर से बसाई। लेकिन, इन दस्तावेज़ों के बावजूद, चुनाव आयोग ने विवादित विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के दौरान उन्हें योग्य मतदाता के रूप में मान्यता नहीं दी।

“हम किस पर भरोसा करें?”

आनंद बिस्वास कहते हैं, “मैं यहीं पैदा हुआ हूं। इसके बावजूद आज मेरा नाम वोटर लिस्ट से हटा दिया गया है। तो हम किस पर भरोसा करें, और यह मातुआ समाज आखिर कहां जाएगा? हमें कोई दिशा नहीं मिल रही है।” जिले के मातुआ-बहुल विधानसभा क्षेत्रों बोंगांव उत्तर, बोंगांव दक्षिण, गैघाटा, बगदाह, स्वरूपनगर, हाबरा, हरिणघाटा और बादुरिया में शरणार्थी मूल के हजारों लोगों ने इसी तरह के नाम हटाए जाने की शिकायत की है।

बड़ी संख्या में नाम हटे

यह बताने के लिए कोई समुदाय-वार आधिकारिक आंकड़ा नहीं है कि SIR प्रक्रिया में हटाए गए 90 लाख से अधिक नामों में कितने मातुआ हैं। लेकिन स्थानीय नेताओं के आकलन और मातुआ बहुल इलाकों के आंकड़े बताते हैं कि हजारों नाम हटाए गए हैं, जिससे समुदाय में नाराज़गी बढ़ी है।उत्तर 24 परगना, जहां मातुआ मतदाताओं की सबसे बड़ी संख्या है, वहां कथित तौर पर 12 लाख से अधिक नाम मतदाता सूची से हटाए गए हैं।

“मताधिकार छीनना पहचान छीनना है”

समुदाय के नेता रंजीत बैन का आरोप है,“इस इलाके में जिनके नाम हटाए गए हैं, वे सभी मातुआ नमशूद्र हैं। ये लोग दशकों से वोट दे रहे थे। वोट का अधिकार छीनना किसी को मारने से भी बदतर है… उनकी पहचान खत्म हो जाती है।” यह बयान बंगाल के मातुआ क्षेत्रों में बढ़ती नाराज़गी और प्रशासनिक बाधाओं को दर्शाता है।

“मातुआ घुसपैठिए नहीं हैं”

गुटरी के पास खड़े राजकुमार सरकार कहते हैं, “नाम हट गया तो क्या हुआ? वे CAA (नागरिकता संशोधन अधिनियम) के जरिए फिर से वोटर बन जाएंगे। कोई उन्हें यहां से नहीं भगाएगा। बीजेपी घुसपैठियों को नहीं रखेगी—न पश्चिम बंगाल में, न भारत में।” उनकी सोच उस धारणा को दर्शाती है जिसमें “शरणार्थी” और “घुसपैठिए” के बीच फर्क किया जाता है जो लंबे समय से बीजेपी की मातुआ समुदाय तक पहुंच की रणनीति का हिस्सा रहा है।

वे आगे कहते हैं, “मातुआ घुसपैठिए नहीं हैं। जो हिंदू बांग्लादेश से आए हैं, वे शरणार्थी हैं और उन्हें नागरिकता मिलेगी। लेकिन जो मुसलमान बांग्लादेश या पाकिस्तान से आए हैं, वे घुसपैठिए हैं और उनका भारत में कोई स्थान नहीं है।”

इतिहास की याद और वर्तमान की राजनीति

यह भावना समुदाय की उस सामूहिक स्मृति से जुड़ी है, जिसमें बांग्लादेश से धार्मिक उत्पीड़न के कारण पलायन की कहानियां शामिल हैं। यही अनुभव आज भी उनके राजनीतिक निर्णयों को प्रभावित करता है।दिलचस्प बात यह है कि जिन लोगों के नाम हटाए गए हैं, उनमें भी गुस्सा अक्सर इस ऐतिहासिक स्मृति के कारण संतुलित हो जाता है।

SIR को लेकर अलग-अलग धारणा

गैघाटा के निवासी और मेडिकल असिस्टेंट सुभ्रत बैद्य कहते हैं, “SIR का उद्देश्य अवैध प्रवासियों की पहचान करना था, और शायद यह आंशिक रूप से सफल भी रहा, क्योंकि इसकी शुरुआत के बाद कई लोग वापस चले गए।” वे पिछले साल नवंबर में सीमा सुरक्षा बल द्वारा पकड़े गए कुछ बांग्लादेशी नागरिकों का जिक्र करते हैं, जिनमें रोहिंग्या भी शामिल थे। इनमें से कई ने माना कि वे अवैध रूप से भारत में रह रहे थे और कोलकाता के आसपास काम करते थे।

“शिकायत असली है, लेकिन जटिल भी”

मातुआ विकास परिषद के महासचिव पार्थ बिस्वास कहते हैं, “शिकायत असली है, लेकिन इसके कई स्तर हैं। लोग यहां क्यों आए थे, यह याद आज भी प्रभाव रखती है।”सुभ्रत बैद्य बताते हैं कि उनके और उनकी मां के नाम दशकों पुराने रिकॉर्ड होने के बावजूद हटा दिए गए। “मेरे पिता ने 1983 और 1988 में वोट दिया था। मेरे पास पासपोर्ट, स्कूल सर्टिफिकेट—सब कुछ है,” उन्होंने कहा।

साजिश के आरोप

कुछ लोग आरोप लगाते हैं कि स्थानीय बूथ स्तर अधिकारी (BLO) ने पक्षपातपूर्ण तरीके से नाम हटाए।केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने भी इसके लिए राज्य की तृणमूल कांग्रेस सरकार को जिम्मेदार ठहराया है।हालांकि, संबंधित BLO नागेंद्रनाथ सरदार इन आरोपों को खारिज करते हुए कहते हैं,“बीजेपी लोगों को गुमराह कर रही है। हमने कोई नाम नहीं हटाया। TMC समर्थकों के नाम भी हटे हैं। सभी दस्तावेज़ देने के बावजूद नाम क्यों हटे, यह स्पष्ट नहीं है।”

क्या मातुआ फिर बीजेपी पर भरोसा करेंगे?

आनंद बिस्वास कहते हैं, “हम आहत हैं, लेकिन हम शरणार्थी समस्या का समाधान भी चाहते हैं। जो हमें समाधान देगा, हम उसका समर्थन करेंगे।”प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ठाकुरनगर में रैली के दौरान इस समस्या के समाधान का वादा किया। हालांकि, बीजेपी 2019 से ही यह वादा करती आ रही है।

चुनावी महत्व

मातुआ समुदाय चुनावी दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण है।2021 विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने 15 में से 14 मातुआ बहुल सीटें जीती थीं। इसके अलावा उत्तर और दक्षिण 24 परगना तथा नदिया की कम से कम 35 सीटों पर यह समुदाय निर्णायक भूमिका निभाता है।कई सीटों पर मामूली वोट बदलाव भी नतीजों को प्रभावित कर सकता है।

जमीनी स्थिति यह संकेत देती है कि भले ही बीजेपी के प्रति भरोसा कुछ हद तक कमजोर हुआ है, लेकिन पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। मातुआ समुदाय की नाराज़गी स्पष्ट है, लेकिन उनका अंतिम राजनीतिक रुख अभी भी अनिश्चित और परिस्थितियों पर निर्भर बना हुआ है।

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