बंकिम चंद्र की विरासत और वंदे मातरम पर बंगाल चुनाव की सबसे बड़ी जंग
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बंकिम चंद्र की विरासत और 'वंदे मातरम' पर बंगाल चुनाव की सबसे बड़ी जंग

एक ओर जहाँ भगवा पार्टी ने साहित्य जगत की एक महान हस्ती के पाँचवीं पीढ़ी के वंशज को चुनावी मैदान में उतारा है, वहीं TMC अपने गढ़ को बचाने के लिए स्थानीय जन-कल्याण और विकास कार्यों के अपने रिकॉर्ड पर दाँव लगा रही है।


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Bankim Chandra Chatterjee : पश्चिम बंगाल के उत्तर 24 परगना जिले में हुगली नदी के शांत किनारों पर बसा शहर नैहाटी आज एक ऐसे राजनीतिक ज्वालामुखी के मुहाने पर खड़ा है, जिसकी तपिश कोलकाता के सत्ता गलियारों तक महसूस की जा रही है। यह वह भूमि है जहाँ लगभग दो शताब्दी पहले, 19वीं सदी के महान साहित्यकार बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय (1838-1894) का जन्म हुआ था। आज उनकी यही विरासत 2026 के विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के बीच छिड़े सबसे भीषण वैचारिक युद्ध का केंद्र बन गई है।


नैहाटी की संकरी गलियां, जहाँ की दीवारों पर 'वंदे मातरम' के रचयिता के नाम पर बने स्कूल, क्लब और पुस्तकालयों के बोर्ड लगे हैं, अब एक नए किस्म के राष्ट्रवाद की गवाह बन रही हैं। भाजपा यहाँ बंगाल की समृद्ध साहित्यिक विरासत को एक मारक चुनावी हथियार के रूप में इस्तेमाल कर रही है, जिसका उद्देश्य बंगाल की क्षेत्रीय पहचान को अपने 'हिंदू राष्ट्रवाद' के बड़े नैरेटिव में समाहित करना है।

सांस्कृतिक पहचान और भाजपा का 'वंशज' कार्ड
भाजपा की रणनीति इस बार केवल नारों तक सीमित नहीं है। पार्टी ने इस सीट से बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय की पाँचवीं पीढ़ी के वंशज सौमित्र चट्टोपाध्याय को मैदान में उतारकर एक बड़ा जुआ खेला है। सौमित्र को टिकट देना भाजपा की उस लंबी योजना का हिस्सा है, जिसके तहत वह खुद पर लगे 'बाहरी' होने के टैग को मिटाना चाहती है। पार्टी का मानना है कि बंकिम चंद्र के परिवार के किसी सदस्य को खड़ा करके वह बंगाली भद्रलोक और आम जनता के बीच यह संदेश देने में सफल होगी कि वह बंगाल की जड़ों से जुड़ी हुई है।

पिछले कई महीनों से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने 2025 में 'वंदे मातरम' की 150वीं वर्षगांठ के समारोहों को जिस भव्यता के साथ मनाया, उसने नैहाटी में भाजपा के लिए ज़मीन तैयार करने का काम किया। भाजपा नेताओं ने अपनी हर जनसभा में बंकिम चंद्र के गीत को राष्ट्रीय गौरव और अस्मिता का प्रतीक बताया है। नैहाटी के भाजपा मंडल अध्यक्ष गौतम बसुली का कहना है कि यह लड़ाई केवल एक विधानसभा सीट जीतने की नहीं है, बल्कि बंगाल की उस राष्ट्रवादी विरासत को 'आज़ाद' कराने की है, जिसे ममता बनर्जी के शासन में हाशिए पर धकेल दिया गया है।

नैहाटी का चुनावी भूगोल और समीकरण
नैहाटी विधानसभा क्षेत्र का इतिहास दिलचस्प रहा है। उत्तर 24 परगना जिले की 33 सीटों में शामिल यह क्षेत्र कभी वामपंथी दलों और कांग्रेस का मज़बूत किला हुआ करता था। लेकिन 2011 में जब ममता बनर्जी ने 'परिवर्तन' की लहर पैदा की, तो यह सीट टीएमसी के खाते में चली गई। टीएमसी के दिग्गज नेता पार्थ भौमिक ने यहाँ से लगातार तीन बार जीत दर्ज की। उनके सांसद बनने के बाद 2024 के उपचुनाव में सनत दे ने यहाँ भारी मतों से जीत हासिल की, जिससे यह स्पष्ट हो गया कि यहाँ टीएमसी का संगठन बेहद मज़बूत है।

भाजपा के लिए यहाँ चुनौती केवल विचारधारा की नहीं, बल्कि टीएमसी के उस संगठनात्मक ढांचे की भी है जो बूथ स्तर तक सक्रिय है। टीएमसी यहाँ की जनता को राज्य सरकार की 'लक्ष्मी भंडार' और 'स्वास्थ्य साथी' जैसी कल्याणकारी योजनाओं के आधार पर गोलबंद कर रही है। भाजपा की नज़र उन मतों पर है जो जूट मिलों के बंद होने और बेरोजगारी से परेशान हैं।

जूट मिलों का संकट और मज़दूर राजनीति
नैहाटी केवल साहित्य की धरती नहीं है, यह बंगाल के औद्योगिक इतिहास का भी हिस्सा रहा है। यहाँ की जूट मिलें कभी हज़ारों परिवारों का पेट पालती थीं। आज इनमें से कई मिलें या तो बंद हैं या दम तोड़ रही हैं। मज़दूरों का पलायन नैहाटी की एक कड़वी सच्चाई है। भाजपा इस आर्थिक असंतोष को बंकिम चंद्र की विरासत के साथ जोड़कर एक 'नई नैहाटी' का सपना बेच रही है। पार्टी का तर्क है कि जिस शहर ने भारत को राष्ट्रगीत दिया, उसे विकास के नक्शे से गायब कर दिया गया।

दूसरी ओर, टीएमसी का दावा है कि केंद्र सरकार की नीतियों के कारण जूट उद्योग बर्बाद हुआ है। सनत दे अपनी सभाओं में लगातार यह मुद्दा उठा रहे हैं कि भाजपा केवल प्रतीकों की राजनीति करती है, जबकि मज़दूरों के हक की लड़ाई में वह कहीं नज़र नहीं आती। यह टकराव राष्ट्रवाद बनाम रोज़गार की बहस को जन्म दे रहा है।

टीएमसी का पलटवार: 'विरासत का चुनावी इस्तेमाल'
टीएमसी उम्मीदवार सनत दे भाजपा के इस 'बंकिम कार्ड' को सिरे से खारिज करते हैं। उनका तर्क है कि नैहाटी की जनता भावनात्मक मुद्दों के बजाय विकास और जुड़ाव को प्राथमिकता देती है। सनत दे का कहना है कि सौमित्र चट्टोपाध्याय का बंकिम चंद्र के साथ जुड़ाव केवल कागज़ी है और उनका नैहाटी की रोज़मर्रा की समस्याओं से कोई लेना-देना नहीं है।

टीएमसी ने भाजपा उम्मीदवार पर व्यक्तिगत हमले भी तेज़ कर दिए हैं। सनत दे ने आरोप लगाया कि सौमित्र चट्टोपाध्याय के चुनावी हलफनामे में सीबीआई द्वारा जालसाजी के एक मामले में चार्जशीट का ज़िक्र है। टीएमसी का दावा है कि भाजपा ने उन्हें केवल एक ढाल के रूप में इस्तेमाल करने के लिए टिकट दिया है ताकि वे भ्रष्टाचार के आरोपों से बच सकें। ममता बनर्जी खुद अपनी रैलियों में यह कहती रही हैं कि भाजपा बंगाल के महापुरुषों का नाम केवल चुनाव के समय लेती है, जबकि साल भर वह बंगाल की संस्कृति का अपमान करती है।

वंदे मातरम: गौरव या ध्रुवीकरण का जरिया?
नैहाटी की इस जंग ने 'वंदे मातरम' को लेकर एक पुरानी बहस को फिर से ज़िंदा कर दिया है। जहाँ भाजपा इसे अखंड भारत और राष्ट्रीय एकता का प्रतीक बता रही है, वहीं विपक्ष और कुछ शिक्षाविदों का मानना है कि भाजपा इस गीत के बहाने धार्मिक ध्रुवीकरण की कोशिश कर रही है। बंकिम चंद्र के उपन्यास 'आनंदमठ' का संदर्भ यहाँ बार-बार आता है, जिसे भाजपा 'हिंदू पुनर्जागरण' का दस्तावेज़ मानती है, जबकि टीएमसी इसे एक समावेशी स्वतंत्रता संग्राम के गीत के रूप में पेश करती है।

नैहाटी स्थित बंकिम-भवन अनुसंधान केंद्र के निदेशक डॉ. रतन नंदी इस प्रवृत्ति पर चिंता जताते हैं। उनका कहना है कि बंकिम चंद्र एक महान साहित्यकार थे और उनके काम का मूल्यांकन उनके मानवीय संदेशों के आधार पर होना चाहिए, न कि उन्हें किसी एक धर्म या राजनीतिक दल के फ्रेम में कैद करके। डॉ. नंदी के अनुसार, जिस तरह से बंकिम चंद्र को आज 'पॉलिटिकल टूल' बनाया जा रहा है, वह मुस्लिम समुदाय के कुछ वर्गों के बीच असुरक्षा पैदा कर सकता है, जो बंगाल की साझा संस्कृति के लिए ठीक नहीं है।

भाजपा का 'ग्रेटर नेशनलिज्म' मॉडल
नैहाटी की लड़ाई भाजपा के उस बड़े मॉडल का हिस्सा है जिसे वह पूरे भारत में लागू कर रही है। भाजपा क्षेत्रीय नायकों को अपने राष्ट्रवादी ढांचे में ढाल रही है। जैसे महाराष्ट्र में वीर सावरकर और तमिलनाडु में सुब्रमण्यम भारती को पार्टी ने अपने वैचारिक अभियान का चेहरा बनाया है, ठीक उसी तरह बंगाल में बंकिम चंद्र को पेश किया जा रहा है। भाजपा का लक्ष्य यह दिखाना है कि राष्ट्रवाद के मूल स्रोत क्षेत्रीय यादों में ही छिपे हैं।

इससे पहले भाजपा ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस के प्रपौत्र चंद्र कुमार बोस को ममता बनर्जी के खिलाफ उतारकर ऐसा ही प्रयोग किया था। हालांकि वह प्रयोग सफल नहीं रहा और चंद्र कुमार बोस ने हाल ही में टीएमसी में शामिल होकर भाजपा की कूटनीति को 'ऐतिहासिक भूल' करार दिया। अब सवाल यह है कि क्या सौमित्र चट्टोपाध्याय नैहाटी में वह करिश्मा कर पाएंगे जो चंद्र कुमार बोस कोलकाता में नहीं कर सके?

साहित्य बनाम राजनीति: स्थानीय लोगों की राय
नैहाटी की सड़कों पर चर्चा का बाज़ार गर्म है। स्थानीय निवासी अरिंदम घोष कहते हैं, "हमें गर्व है कि हम बंकिम चंद्र की धरती पर रहते हैं, लेकिन हमें सड़कें, पानी और अस्पताल भी चाहिए। केवल वंदे मातरम बोलने से पेट नहीं भरता।" वहीं, कुछ युवा मतदाता भाजपा के इस कदम को बंगाल के स्वाभिमान की वापसी के रूप में देख रहे हैं। उनके लिए बंकिम चंद्र का नाम एक ऐसी पहचान है जो उन्हें बाकी राज्यों से जोड़ती है।

बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने जब 1870 के दशक में 'आनंदमठ' लिखा था, तब उन्होंने कल्पना नहीं की होगी कि उनकी रचना डेढ़ सौ साल बाद एक आधुनिक लोकतंत्र में चुनावी हार-जीत का आधार बनेगी। भाजपा ने जिस तरह से उनकी विरासत को संवारा है, उसने टीएमसी को बचाव की मुद्रा में ला खड़ा किया है। टीएमसी अब यह साबित करने में जुटी है कि उसने 2011 से बंकिम चंद्र के संग्रहालय और लाइब्रेरी के विकास के लिए भाजपा से कहीं अधिक काम किया है।

29 अप्रैल का मतदान
नैहाटी में मतदान 29 अप्रैल को दूसरे और अंतिम चरण में होना है। भाजपा के लिए यह चुनाव केवल एक विधायक चुनने का नहीं, बल्कि अपनी वैचारिक स्वीकार्यता को परखने का है। यदि भाजपा यहाँ जीतती है, तो यह माना जाएगा कि बंगाल में 'सांस्कृतिक राष्ट्रवाद' की उसकी पिच काम कर गई है। यदि टीएमसी अपना गढ़ बचाने में सफल रहती है, तो यह साबित होगा कि बंगाल में क्षेत्रीय अस्मिता और कल्याणकारी राजनीति का जादू आज भी बरक़रार है।

4 मई को जब नतीजे आएंगे, तो केवल नैहाटी के विधायक का नाम तय नहीं होगा, बल्कि यह भी तय होगा कि बंगाल के सांस्कृतिक नायकों पर किसका 'हक' ज़्यादा मज़बूत है। बंकिम चंद्र, जिन्होंने राष्ट्र को 'माँ' के रूप में कल्पित किया था, आज उसी राष्ट्र के लोकतांत्रिक उत्सव में एक सबसे बड़े 'इलेक्टोरल एसेट' बन चुके हैं।


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