
मालदा घेराव पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, सुरक्षा चूक पर प्रशासन को फटकार
पश्चिम बंगाल के मालदा में न्यायिक अधिकारियों के घेराव पर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। अदालत ने केंद्रीय बल तैनात करने का आदेश दिया है।
गुरुवार (2 अप्रैल) को Supreme Court of India ने पश्चिम बंगाल के मालदा जिले में विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के दौरान सात न्यायिक अधिकारियों के घेराव की घटना पर गंभीर चिंता जताई। प्रदर्शनकारियों ने मतदाता सूची से नाम हटाए जाने के विरोध में इन अधिकारियों को कई घंटों तक घेरकर रखा था।
हालांकि देर रात सभी अधिकारियों को सुरक्षित बाहर निकाल लिया गया, लेकिन अदालत ने उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए केंद्रीय बलों की तैनाती का आदेश दिया। बुधवार (1 अप्रैल) देर रात सुरक्षा बलों ने हल्का बल प्रयोग कर भीड़ को तितर-बितर किया और तीन महिला अधिकारियों समेत सभी को सुरक्षित बाहर निकाला।
प्रदर्शनकारियों ने SIR प्रक्रिया में बड़े पैमाने पर मतदाताओं के नाम हटाने का आरोप लगाते हुए राष्ट्रीय राजमार्ग-12 (कोलकाता-सिलीगुड़ी) को भी जाम कर दिया था।
प्रशासनिक विफलता पर कोर्ट की नाराजगी
मुख्य न्यायाधीश Surya Kant ने खुलासा किया कि अधिकारियों की सुरक्षा के लिए उन्हें देर रात तत्काल आदेश जारी करने पड़े। उन्होंने कहा कि वह रात 2 बजे तक हालात पर नजर रखे हुए थे और इस घटना को “बेहद दुर्भाग्यपूर्ण” बताया।उन्होंने पश्चिम बंगाल की राजनीतिक स्थिति पर टिप्पणी करते हुए कहा, “दुर्भाग्य से आपके राज्य में हर चीज राजनीतिक हो गई है, यह सबसे अधिक ध्रुवीकृत राज्य है।”
सुप्रीम कोर्ट ने इस घटना को न्यायिक अधिकारियों को डराने और न्यायिक प्रक्रिया को बाधित करने की “सुनियोजित और प्रेरित कोशिश” करार दिया। कोर्ट ने चेतावनी दी कि इस तरह की हरकतें आपराधिक अवमानना के दायरे में आ सकती हैं।अदालत ने राज्य प्रशासन की भूमिका को “गंभीर विफलता” बताते हुए मुख्य सचिव, पुलिस महानिदेशक, पुलिस अधीक्षक और जिला कलेक्टर की प्रतिक्रिया को “बेहद निराशाजनक” और “निंदनीय” कहा।
बेंच, जिसमें जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपिन पंचोली भी शामिल थे, ने इसे राज्य सरकार की “कर्तव्यहीनता” का उदाहरण बताया। अदालत ने सवाल उठाया कि सूचना मिलने के बावजूद अधिकारियों को सुरक्षित निकालने के लिए समय पर कार्रवाई क्यों नहीं की गई।
मुख्य न्यायाधीश ने नाराजगी जताते हुए कहा, “रात 11 बजे तक आपका कलेक्टर वहां नहीं था। मुझे रात में सख्त आदेश देने पड़े। पांच साल के बच्चे तक को खाना-पानी नहीं मिला!”
ममता बनर्जी का पलटवार
इस बीच पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री Mamata Banerjee ने इस घटना के लिए Election Commission of India को जिम्मेदार ठहराया।मुर्शिदाबाद में एक चुनावी रैली को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा, “मैं चुनाव आयोग की निंदा करती हूं, जो न्यायिक अधिकारियों की सुरक्षा करने में विफल रहा।”
उन्होंने आरोप लगाया कि चुनाव की घोषणा के बाद आयोग ने राज्य प्रशासन और पुलिस में अपने अधिकारियों की नियुक्ति की, लेकिन कानून-व्यवस्था बनाए रखने में पूरी तरह नाकाम रहा।ममता बनर्जी ने यह भी दावा किया कि भाजपा की योजना पश्चिम बंगाल में चुनाव रद्द कर राष्ट्रपति शासन लागू करवाने की है।
कैसे हुआ बचाव अभियान
अधिकारियों के अनुसार, न्यायिक अधिकारी कालीचक-2 ब्लॉक विकास कार्यालय में मौजूद थे, जब शाम करीब 4 बजे प्रदर्शनकारियों ने उन्हें घेर लिया।देर रात भारी सुरक्षा बलों की मौजूदगी में उन्हें बाहर निकाला गया। इस दौरान प्रदर्शनकारियों ने बांस के डंडों से रास्ता रोकने और वाहनों को नुकसान पहुंचाने की कोशिश की। पुलिस को हल्का बल प्रयोग करना पड़ा।कुछ प्रदर्शनकारियों के घायल होने की भी खबरें हैं, हालांकि इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।
क्यों हो रहा था विरोध
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर न्यायिक अधिकारी 28 फरवरी को जारी मतदाता सूची में “अंडर एडजुडिकेशन” श्रेणी में रखे गए नामों की जांच कर रहे हैं। इसी प्रक्रिया के विरोध में यह प्रदर्शन हुआ।
हाईवे जाम और समाधान
प्रदर्शनकारियों ने पहले अधिकारियों से मिलने की मांग की थी, लेकिन अनुमति न मिलने पर उन्होंने घेराव शुरू कर दिया। बचाव अभियान के बाद भी राष्ट्रीय राजमार्ग-12 पर जाम जारी रहा।स्थिति तब सामान्य हुई जब अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट ने मौके पर पहुंचकर आश्वासन दिया कि योग्य मतदाताओं के नाम चार दिनों के भीतर सूची में शामिल किए जाएंगे। इसके बाद प्रदर्शनकारियों ने जाम हटा लिया।
आगे की कार्रवाई
चुनाव आयोग ने इस घटना पर पुलिस महानिदेशक से रिपोर्ट तलब की है। पश्चिम बंगाल में 23 और 29 अप्रैल को दो चरणों में मतदान होगा, जबकि मतगणना 4 मई को होगी।यह घटना चुनावी माहौल के बीच प्रशासनिक क्षमता, राजनीतिक तनाव और न्यायिक प्रक्रिया की सुरक्षा को लेकर बड़े सवाल खड़े करती है।

