
टीएमसी से बीजेपी तक, सुवेंदु अधिकारी का दमदार राजनीतिक सफर
नंदीग्राम से उभरे सुवेंदु अधिकारी ने 2026 चुनाव में बीजेपी की जीत में अहम भूमिका निभाई, जमीनी राजनीति से राज्यव्यापी नेतृत्व तक खुद को स्थापित किया।
पश्चिम बंगाल के नंदीग्राम के बिनंदापुर गांव में, जहां केसरिया झंडे और हाथ से लिखे “जय श्री राम” के नारे हर ओर दिखाई दे रहे थे, वहां एक चुनावी सभा के दौरान नेता प्रतिपक्ष Suvendu Adhikari ने अपने भाषण के बीच रुककर भीड़ के पार इशारा किया। उन्होंने कहा, “बीजेपी मुस्लिम गांवों में प्रचार नहीं कर सकती, लेकिन तृणमूल कांग्रेस हिंदू गांवों में जा सकती है। बताइए, आप कब एकजुट होंगे?”
चुनाव प्रचार के अंतिम चरण में दिया गया यह बयान न केवल चुनाव के माहौल को दर्शाता है, बल्कि सुवेंदु अधिकारी के राजनीतिक बदलाव को भी उजागर करता है।
सिर्फ चुनाव नहीं, एक राजनीतिक परीक्षा
2026 का चुनाव सुवेंदु अधिकारी के लिए महज एक और चुनाव नहीं था। यह उनके लिए एक बड़ी परीक्षा थी—क्या वे स्थानीय आंदोलनों से निकले नेता से एक व्यापक वैचारिक राजनीति का चेहरा बन सकते हैं और उसे सत्ता तक ले जा सकते हैं?
विधायक के रूप में सुवेंदु का रिकॉर्ड
2006: पूर्वी मिदनापुर की कंटाई साउथ सीट से 8,580 वोटों से जीत
2016: नंदीग्राम सीट से 81,230 वोटों से जीत
2021: नंदीग्राम से 1,956 वोटों से जीत, Mamata Banerjee को हराया
ममता से मुकाबला, राजनीतिक सफर का नया मोड़
पश्चिम बंगाल में बीजेपी की जीत के साथ सुवेंदु अधिकारी अब पार्टी के प्रमुख रणनीतिकार के रूप में उभरकर सामने आए हैं। उनका राजनीतिक सफर काफी हद तक उनकी पूर्व नेता Mamata Banerjee से मेल खाता है।ममता बनर्जी ने 1984 में Somnath Chatterjee को हराकर राष्ट्रीय पहचान बनाई थी, वहीं सुवेंदु ने भी खुद को जमीनी संघर्षों से उभरे एक मजबूत नेता के रूप में स्थापित किया।
दोनों नेताओं ने समय-समय पर अपनी राजनीतिक विचारधारा को परिस्थितियों के अनुसार बदला। ममता बनर्जी कभी बीजेपी के साथ थीं और बाद में उसकी कट्टर विरोधी बन गईं, जबकि सुवेंदु ने उल्टा रास्ता अपनाया—वे टीएमसी छोड़कर बीजेपी में शामिल हो गए और हिंदुत्व की राजनीति के समर्थक बन गए।
टीएमसी से अलगाव और बीजेपी में एंट्री
2020 तक टीएमसी में शक्ति का केंद्रीकरण बढ़ता गया, खासकर ममता बनर्जी और उनके भतीजे Abhishek Banerjee के इर्द-गिर्द। ऐसे में सुवेंदु, जो कभी पार्टी के बेहद अहम नेता माने जाते थे, खुद को हाशिए पर महसूस करने लगे।उनका पार्टी छोड़ना अचानक जरूर था, लेकिन पूरी तरह अप्रत्याशित नहीं। बीजेपी में शामिल होने के बाद वे अपने साथ मजबूत संगठनात्मक नेटवर्क भी लाए, जिसे उन्होंने वर्षों की जमीनी राजनीति से तैयार किया था।2021 के चुनाव में उन्होंने नंदीग्राम में ममता बनर्जी को हराकर “जायंट किलर” की पहचान हासिल की।
नंदीग्राम: आंदोलन से वैचारिक राजनीति तक
नंदीग्राम सुवेंदु अधिकारी के राजनीतिक जीवन का केंद्र रहा है। 2007 के भूमि आंदोलन में वे प्रमुख चेहरा बनकर उभरे, जिसने आगे चलकर ममता बनर्जी को 2011 में सत्ता तक पहुंचाया।लेकिन समय के साथ नंदीग्राम की राजनीतिक जमीन बदल गई। जो क्षेत्र कभी किसानों के आंदोलन का केंद्र था, वह अब एक मजबूत वैचारिक और पहचान आधारित राजनीति का प्रयोगशाला बन गया है।
बदला हुआ चुनावी अंदाज और प्रतीक
टीएमसी के दिनों में सुवेंदु इफ्तार जैसे कार्यक्रमों में हिस्सा लेते थे और बंगाल की मिश्रित संस्कृति का प्रतिनिधित्व करते थे। लेकिन अब उनकी राजनीति में स्पष्ट बदलाव दिखता है।मंदिरों में दर्शन, धार्मिक नारों का प्रयोग और हिंदू पहचान का खुला प्रदर्शन उनकी चुनावी रणनीति का हिस्सा बन गया है। यह बदलाव बीजेपी की व्यापक रणनीति के अनुरूप है और उनके नए राजनीतिक रूप को भी दर्शाता है।
अपने ही अतीत से मुकाबला
इस चुनाव में सुवेंदु सिर्फ विपक्ष से नहीं, बल्कि अपने अतीत से भी लड़ रहे थे। नंदीग्राम में उनके सामने उनके ही पूर्व सहयोगी खड़े थे, जिससे यह मुकाबला व्यक्तिगत और राजनीतिक दोनों बन गया।यह स्थिति काफी हद तक ममता बनर्जी के साथ उनके रिश्ते जैसी ही प्रतीत होती है—जहां एक समय सहयोगी रहे लोग अब प्रतिद्वंद्वी बन चुके हैं।
संगठन और आक्रामक राजनीति का मिश्रण
चुनाव के दौरान सुवेंदु अधिकारी ने बूथ स्तर तक की तैयारियों पर नजर रखी, कार्यकर्ताओं को संगठित किया और पूरी रणनीति पर मजबूत पकड़ बनाए रखी।उनके समर्थक उन्हें अनुशासित और सूक्ष्म स्तर पर काम करने वाला नेता बताते हैं, जो गांव, लोगों और उनकी समस्याओं को बारीकी से याद रखते हैं।साथ ही, उनका आक्रामक राजनीतिक अंदाज भी कायम रहा—चाहे पुलिस के खिलाफ प्रदर्शन हो या मंच से सरकार पर तीखे हमले।
ममता और सुवेंदु: समानताएं और अंतर
ममता बनर्जी की तरह सुवेंदु भी टकराव की राजनीति में विश्वास रखते हैं और प्रतीकों का प्रभावी इस्तेमाल करते हैं। दोनों नेताओं ने आंदोलनों से राजनीति की शुरुआत की और समय के साथ अपनी रणनीति बदली।हालांकि, सुवेंदु एक स्थापित राजनीतिक परिवार से आते हैं। उनके पिता Sisir Adhikari कांग्रेस और बाद में टीएमसी के वरिष्ठ नेता रहे हैं। उनके परिवार की राजनीतिक विरासत स्वतंत्रता सेनानी Bipin Bihari Adhikari तक जाती है।
स्थानीय से राज्यव्यापी नेता बनने की चुनौती
पूर्वी मिदनापुर में सुवेंदु का प्रभाव मजबूत रहा है, लेकिन उनकी सबसे बड़ी चुनौती हमेशा यह रही कि क्या वे इस प्रभाव को पूरे राज्य में फैला सकते हैं।2026 के चुनाव परिणाम संकेत देते हैं कि उन्होंने इस चुनौती को काफी हद तक पार कर लिया है। बीजेपी की जीत यह दिखाती है कि उन्होंने अपने स्थानीय नेटवर्क को व्यापक जनसमर्थन में बदलने में सफलता पाई है।
आगे की राह
अब उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती सत्ता को संभालने की है। आंदोलन और चुनावी राजनीति से आगे बढ़कर प्रशासन चलाना उनके करियर का सबसे कठिन चरण साबित हो सकता है।

