
तमिलनाडु में त्रिशंकु विधानसभा: राज्यपाल क्या कर सकते हैं और क्या नहीं
पाँच मिसालें और सुप्रीम कोर्ट का एक स्थापित रुख अगले पखवाड़े में राज्यपाल अर्लेकर के विकल्पों को सीमित करते हैं।
Tamil Nadu TVK : 6 मई 2026 की शाम तमिलनाडु के राजनैतिक इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में नहीं, बल्कि एक 'संवैधानिक सस्पेंस' के रूप में दर्ज हो गई है। राज्य के सिनेमाई पर्दे के निर्विवाद महानायक जोसेफ विजय, जिन्हें उनके करोड़ों प्रशंसक 'थलपति' (सेनापति) पुकारते हैं, अब वास्तविक जीवन में राज्य के 'कैप्टन' यानी मुख्यमंत्री बनने की दहलीज पर खड़े हैं। उनकी नवगठित पार्टी, तमिलगा वेत्री कज़गम (TVK), ने 234 सदस्यीय विधानसभा में 108 सीटें जीतकर उन सभी राजनीतिक पंडितों और विश्लेषकों को खामोश कर दिया है, जो द्रविड़ राजनीति के स्थापित स्तंभों DMK और AIADMK के पतन की कल्पना भी नहीं कर पा रहे थे।
विजय ने आज राज्यपाल राजेंद्र अर्लेकर से राजभवन में मुलाकात की और आधिकारिक तौर पर सरकार बनाने का दावा पेश किया है। विजय का यह कदम जितना साहसी है, उतना ही पेचीदा भी। तमिलनाडु की 234 सीटों वाली विधानसभा में बहुमत का जादुई आंकड़ा 118 है। विजय 108 सीटों के साथ इस आंकड़े से मात्र 10 सीटें दूर हैं। यह तमिलनाडु के चुनावी इतिहास की पहली ऐसी घटना है जहाँ स्पष्ट बहुमत न होने के कारण त्रिशंकु विधानसभा (Hung Assembly) की स्थिति पैदा हुई है। विजय ने राज्यपाल से अपनी संख्या साबित करने के लिए दो सप्ताह (14 दिन) का समय माँगा है, जो वर्तमान संवैधानिक परिस्थितियों में विवाद और चर्चा का मुख्य केंद्र बन गया है।
राज्यपाल की भूमिका और संवैधानिक 'रूलबुक' की व्याख्या
त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति में राज्यपाल की भूमिका महज औपचारिक नहीं रह जाती। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 163 और 164 राज्यपाल को मुख्यमंत्री नियुक्त करने की शक्ति प्रदान करते हैं, लेकिन यह शक्ति 'मनमानी' नहीं हो सकती। राज्यपाल राजेंद्र अर्लेकर को उन स्थापित मर्यादाओं का पालन करना होगा जो सकारिया आयोग (1988) और पुंछी आयोग (2010) ने अपनी सिफारिशों में स्पष्ट की हैं। इन आयोगों ने सरकार बनाने के दावेदारों के लिए एक 'वरीयता क्रम' (Order of Priority) निर्धारित किया है, जिसे सर्वोच्च न्यायालय ने समय-समय पर अनिवार्य 'रूलबुक' माना है:
प्राथमिकता 1: चुनाव पूर्व गठबंधन (Pre-poll Alliance) - यदि किसी समूह ने वोटिंग से पहले साथ मिलकर बहुमत हासिल किया हो। (यहाँ ऐसा कोई गठबंधन नहीं है)।
प्राथमिकता 2: सबसे बड़ी एकल पार्टी (Single Largest Party) - विजय की TVK (108 सीटें) इसी श्रेणी में आती है। संवैधानिक रूप से विजय का दावा इसी बिंदु पर सबसे मजबूत है।
प्राथमिकता 3: चुनाव बाद का गठबंधन (Post-poll Coalition) - जहाँ सभी सहयोगी दल सरकार का हिस्सा बनने को तैयार हों।
प्राथमिकता 4: बाहरी समर्थन वाला गठबंधन - जहाँ कुछ दल सरकार चलाएं और अन्य बाहर से समर्थन दें (जैसे कांग्रेस के 5 विधायक यहाँ निर्णायक भूमिका में हो सकते हैं)।
राज्यपाल को अब यह तय करना है कि क्या वे विजय को केवल 'सबसे बड़ी पार्टी' होने के नाते मौका देंगे या उनसे पहले 118 विधायकों का लिखित समर्थन पत्र मांगेंगे।
सुप्रीम कोर्ट के वो 5 ऐतिहासिक फैसले: जो राजभवन के लिए 'लक्ष्मण रेखा' हैं
राजभवन के पास अब अपनी मर्जी चलाने की गुंजाइश लगभग खत्म हो गई है। पिछले तीन दशकों में सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे कई ऐतिहासिक फैसले दिए हैं, जो इस वक्त तमिलनाडु के राज्यपाल के लिए दिशा-निर्देश का काम करेंगे।
I. एस. आर. बोम्मई बनाम भारत संघ (1994): 'फ्लोर टेस्ट' की सर्वोच्चता
यह भारतीय संवैधानिक इतिहास का सबसे बुनियादी और महत्वपूर्ण कानून है। इस फैसले ने यह पत्थर की लकीर खींच दी कि किसी नेता या दल के पास बहुमत है या नहीं, इसका फैसला राज्यपाल के बंद कमरों या राजभवन के ड्राइंग रूम में नहीं, बल्कि विधानसभा के पटल (Floor of the House) पर होना चाहिए।
विजय के लिए निहितार्थ: राज्यपाल विजय को यह कहकर सीधे मना नहीं कर सकते कि "मुझे नहीं लगता आपके पास नंबर हैं।" उन्हें विजय को सदन में अपनी संख्या साबित करने का अवसर देना ही होगा।
II. रामेश्वर प्रसाद बनाम भारत संघ (बिहार 2005): हॉर्स-ट्रेडिंग की आशंका बनाम लोकतंत्र
2005 में बिहार के तत्कालीन राज्यपाल बूटा सिंह ने यह दावा करते हुए विधानसभा भंग करने की सिफारिश कर दी थी कि बहुमत जुटाने के लिए विधायकों की खरीद-फरोख्त (Horse-trading) होने की आशंका है। सुप्रीम कोर्ट ने इस कदम को असंवैधानिक बताया और राज्यपाल को कड़ी फटकार लगाई थी।
विजय के लिए निहितार्थ: राज्यपाल अर्लेकर यह अनुमान लगाकर प्रक्रिया नहीं रोक सकते कि विजय 10 विधायक कहाँ से लाएंगे। उन्हें संवैधानिक प्रक्रिया को उसके तार्किक अंत तक पहुँचने देना होगा।
III. चंद्रकांत कावलेकर बनाम भारत संघ (गोवा 2017): समयबद्ध दावेदारी का महत्व
गोवा में कांग्रेस 17 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी थी, लेकिन वह दावा करने में सुस्त रही। वहीं भाजपा (13 सीटें) ने क्षेत्रीय दलों के साथ मिलकर पहले दावा ठोक दिया। कोर्ट ने कहा कि जो पहले बहुमत की संख्या का प्रमाण देगा, उसे मौका मिल सकता है।
विजय के लिए निहितार्थ: विजय ने परिणामों के तुरंत बाद राजभवन पहुँचकर रणनीतिक रूप से अपनी स्थिति मजबूत कर ली है। अब कोई दूसरा दल उन्हें "देरी" या "अकर्मण्यता" के आधार पर पीछे नहीं धकेल सकता।
IV. बी. एस. येदियुरप्पा मामला (कर्नाटक 2018): 14 दिन बनाम 36 घंटे
यह फैसला विजय की 14 दिन की मांग के लिए सबसे बड़ी चुनौती है। कर्नाटक के राज्यपाल ने येदियुरप्पा को बहुमत साबित करने के लिए 15 दिन का समय दिया था। कांग्रेस और जेडीएस ने आधी रात को सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए कहा कि 15 दिन का समय बहुत ज्यादा है, इससे अनैतिक सौदेबाजी को बढ़ावा मिलता है। कोर्ट ने इस समय को घटाकर मात्र 36 घंटे कर दिया।
विजय के लिए निहितार्थ: विजय द्वारा माँगे गए 14 दिन उन्हें मिलना संवैधानिक रूप से असंभव है। राज्यपाल यदि उन्हें बुलाते भी हैं, तो उन्हें 48 से 72 घंटे के भीतर शक्ति परीक्षण करने का आदेश मिल सकता है।
V. शिव सेना बनाम भारत संघ (महाराष्ट्र 2019): विफल दावेदारी के बाद का रास्ता
महाराष्ट्र मामले में कोर्ट ने आदेश दिया कि यदि पहला आमंत्रण (जैसे फडणवीस और अजित पवार) फेल हो जाता है, तो राज्यपाल सीधे विधानसभा भंग नहीं कर सकते। उन्हें सकारिया क्रम में अगले दावेदार (MVA गठबंधन) को मौका देना होगा।
विजय के लिए निहितार्थ: यदि विजय फ्लोर टेस्ट में फेल होते हैं, तो राज्यपाल को DMK (59) या AIADMK (47) को सरकार बनाने का न्योता देना होगा, बशर्ते वे बहुमत पेश कर सकें।
तमिलनाडु के लिए तीन सबसे बड़े संवैधानिक और राजनीतिक सवाल
समर्थन पत्र की अनिवार्यता (Support Letters): क्या राज्यपाल आमंत्रण देने से पहले विजय से 118 विधायकों के हस्ताक्षर वाला पत्र मांगेंगे? हालाँकि गोवा और कर्नाटक के मामलों में कोर्ट ने कहा था कि सबसे बड़ी पार्टी को शपथ दिलाई जा सकती है, लेकिन राज्यपाल अपनी सुरक्षा और निष्पक्षता दिखाने के लिए समर्थन पत्रों की मांग कर सकते हैं।
समय की अवधि (The Window of Time): विजय के लिए 14 दिन की मांग एक रणनीतिक चाल है ताकि वे कांग्रेस (5 विधायक) और अन्य छोटे दलों या निर्दलीयों को साथ ला सकें। लेकिन सुप्रीम कोर्ट का हालिया रुख बहुत सख्त है। कोर्ट अब 24 से 48 घंटों के फ्लोर टेस्ट को ही 'संवैधानिक डिफ़ॉल्ट' मानता है।
राष्ट्रपति शासन की संभावना: यदि TVK बहुमत साबित नहीं कर पाती और विपक्षी दल भी कोई गठबंधन नहीं बना पाते, तभी राज्यपाल राष्ट्रपति शासन की सिफारिश कर सकते हैं। लेकिन बिहार 2005 का फैसला राज्यपाल को याद दिलाता है कि विधानसभा को सुप्त अवस्था (Dormant) में रखना या भंग करना अंतिम विकल्प होना चाहिए।
थलपति विजय की राजनीतिक और नैतिक अग्निपरीक्षा
थलपति विजय इस समय "जनादेश में सबसे आगे, मगर गणित में पीछे" वाली स्थिति में हैं। उनके पास 108 सीटों का ठोस आधार और जनता का भारी समर्थन है, लेकिन लोकतंत्र के संख्यात्मक खेल में उन्हें 10 और विधायकों के समर्थन की अनिवार्य आवश्यकता है। राज्यपाल राजेंद्र अर्लेकर के पास भी विकल्प सीमित हैं—उन्हें सकारिया आयोग की मर्यादाओं का पालन करते हुए विजय को मौका देना होगा, लेकिन वे उन्हें "संख्या जुटाने" के लिए लंबा समय देकर अपनी निष्पक्षता पर सवाल नहीं उठने दे सकते।
विजय का यह राजभवन जाना केवल तमिलनाडु की सत्ता का प्रश्न नहीं है, बल्कि यह भारतीय संघीय ढांचे, राजभवन की शुचिता और सुप्रीम कोर्ट के 'बोम्मई सिद्धांतों' की सबसे बड़ी परीक्षा है। थलपति विजय के लिए ये अगले कुछ घंटे उनके जीवन की सबसे कठिन और महत्वपूर्ण 'पॉलिटिकल थ्रिलर' फिल्म से भी कहीं अधिक वास्तविक और चुनौतीपूर्ण होने वाले हैं।
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