
क्या विजय CM की कुर्सी तक पहुँच पाएँगे? क्या दूसरों के पास अब भी कोई मौका है?
तमिलनाडु में सरकार गठन को लेकर अनिश्चितता जारी रहने के बीच, अंततः संवैधानिक प्रक्रिया ही यह तय करेगी कि सरकार कौन बनाएगा—न कि राजनीतिक दावे।
Tamil Nadu TVK : तमिलनाडु में सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरने के बाद भी सरकार गठन को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है। ऐसे में संवैधानिक प्रक्रिया ही यह तय करेगी कि राज्य की कमान किसके हाथ में जाएगी। 'द फेडरल' के एडिटर-इन-चीफ एस श्रीनिवासन समझा रहे हैं कि त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति में राज्यपाल की भूमिका कहाँ से शुरू होती है और कहाँ खत्म।
यहाँ इस बातचीत के प्रमुख अंश दिए गए हैं:
ऐसी स्थिति में सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करने का कानून क्या कहता है?
राजनीतिक हालात बहुत तेजी से बदल रहे हैं, इसलिए हमें सावधानी बरतनी होगी। लेकिन हम स्थापित प्रक्रियाओं के आधार पर बात कर सकते हैं। 'सरकारिया आयोग' ने स्पष्ट रूप से बताया है कि त्रिशंकु विधानसभा में प्राथमिकता का क्रम क्या होना चाहिए।
इस मामले में, टीवीके (TVK) के पास 108 सीटें हैं। एक इस्तीफे के बाद यह संख्या 107 रह गई है, और कांग्रेस के समर्थन के साथ यह आंकड़ा 112 तक पहुँच जाता है। उन्होंने राज्यपाल को अपना दावा पेश कर दिया है। इस स्तर पर राज्यपाल यह फैसला नहीं कर सकते कि उनके पास पर्याप्त नंबर हैं या नहीं। कई अदालती फैसलों ने साफ किया है कि बहुमत का असली परीक्षण सदन के पटल (Floor Test) पर ही होना चाहिए।
ऐसे मामलों में प्राथमिकता का क्रम क्या होता है?
पहली पसंद: चुनाव पूर्व गठबंधन (Pre-poll alliance) जिसके पास स्पष्ट बहुमत हो। तमिलनाडु में दो ऐसे गठबंधन थे, DMK गठबंधन और AIADMK गठबंधन लेकिन किसी के पास बहुमत नहीं है।
दूसरा विकल्प: सबसे बड़ी अकेली पार्टी (Single largest party) जिसे दूसरों का समर्थन प्राप्त हो। टीवीके अभी इसी स्थिति में है, जिसे कांग्रेस का समर्थन हासिल है। भले ही कागजों पर उनके पास पूरे नंबर न दिखें, लेकिन असली परीक्षा सदन में ही होगी।
तीसरा विकल्प: चुनाव बाद का गठबंधन (Post-poll alliance)। अगर DMK और AIADMK जैसी पार्टियां मिलकर बहुमत का दावा करती हैं, तो राज्यपाल को उन पर भी विचार करना पड़ सकता है।
क्या DMK-AIADMK गठबंधन गणितीय रूप से संभव है?
कागजों पर, हाँ। DMK गठबंधन के पास करीब 68 सीटें हैं और AIADMK गठबंधन के पास लगभग 53। साथ मिलकर वे 121 का आंकड़ा पार कर लेते हैं, जो बहुमत के लिए काफी है। लेकिन राजनीतिक रूप से यह बहुत कठिन है। इन गठबंधनों की कुछ पार्टियां कभी एक साथ नहीं आ सकतीं। साथ ही, जनता का जनादेश 'बदलाव' के लिए लग रहा है, और यह बात बड़े फैसलों को प्रभावित करेगी।
यदि ऐसा कोई दावा किया जाता है, तो क्या होगा?
तब भी, उस दावे को विधानसभा के भीतर साबित करना होगा। यदि वे सदन में अपना बहुमत साबित कर देते हैं, तो वे सरकार बना सकते हैं। सब कुछ इस बात पर निर्भर करता है कि अगले कुछ दिनों में स्थिति कैसे विकसित होती है।
क्या सबसे बड़ी पार्टी को आमंत्रित करना ही सामान्य प्रक्रिया है?
जी हाँ, यही स्थापित नियम है। राज्यपाल सबसे बड़ी पार्टी के नेता को बुलाते हैं और उनसे सदन में अपना बहुमत साबित करने के लिए कहते हैं। ऐसी स्थितियां भी होती हैं जहाँ अन्य दल तुरंत चुनौती नहीं देते। यदि वे मतदान के दौरान सदन से बाहर चले जाते हैं या अनुपस्थित रहते हैं, तो सरकार मौजूद और मतदान करने वाले सदस्यों के आधार पर बच सकती है।
फ्लोर टेस्ट (बहुमत परीक्षण) कैसे काम करता है?
संविधान में 'विश्वास मत' जैसी कोई सीधी अवधारणा नहीं है; वहां केवल 'अविश्वास प्रस्ताव' का जिक्र है। फ्लोर टेस्ट के दौरान, यदि कुछ सदस्य वॉकआउट कर जाते हैं और बाकी बचे सदस्य सरकार का समर्थन करते हैं, तो सरकार बनी रह सकती है। हमने पहले भी ऐसा देखा है। उदाहरण के लिए, केंद्र में नरसिम्हा राव सरकार स्पष्ट बहुमत न होने के बावजूद बच गई थी क्योंकि कुछ विपक्षी दलों ने वॉकआउट कर दिया था।
क्या राज्यों में भी इसके उदाहरण मिलते हैं?
हाँ। 2018 में कर्नाटक में बीएस येदियुरप्पा को सबसे बड़ी पार्टी के नेता के रूप में आमंत्रित किया गया था, लेकिन चुनाव बाद बने गठबंधन के पास नंबर ज्यादा थे। अंततः, फ्लोर टेस्ट के दौरान उनकी सरकार गिर गई। वहीं गोवा में कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी थी लेकिन उसने दावा पेश करने में देरी की। भाजपा ने तेजी से गठबंधन बनाया और सदन में बहुमत साबित कर दिया। राज्यपाल को इन्हीं मिसालों के आधार पर काम करना होता है।
क्या राज्यपाल देरी कर सकते हैं?
यदि केवल एक ही पक्ष ने दावा पेश किया है, तो राज्यपाल को उन्हें समय देना होगा—आमतौर पर बहुमत साबित करने के लिए दो सप्ताह तक का समय दिया जाता है। हालांकि संविधान कहता है कि यह काम जल्द से जल्द होना चाहिए, इसलिए यह राज्यपाल की व्याख्या पर निर्भर करता है।
नई सरकार बनने तक शासन कौन चलाता है?
पुरानी विधानसभा भंग हो चुकी है, लेकिन नई विधानसभा की बैठक अभी नहीं बुलाई गई है। इस बीच, 'कार्यवाहक मुख्यमंत्री' प्रशासन का काम संभालते रहते हैं।
क्या राष्ट्रपति शासन की भी संभावना है?
यह सबसे अंतिम विकल्प है। यदि राज्यपाल सभी विकल्पों को आज़माने के बाद भी किसी समाधान पर नहीं पहुँचते हैं, तो वह राष्ट्रपति शासन की सिफारिश कर सकते हैं। यह अस्थिरता या विधायकों की खरीद-फरोख्त की आशंका पर आधारित हो सकता है। लेकिन अदालतों ने ऐसे फैसलों के लिए बहुत सख्त शर्तें तय की हैं। फिलहाल इस पर कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी। हमें देखना होगा कि अगले कुछ दिनों में ऊंट किस करवट बैठता है।
(ऊपर दिया गया कंटेंट एक फाइन-ट्यून्ड AI मॉडल का इस्तेमाल करके वीडियो से ट्रांसक्राइब किया गया है। एक्यूरेसी, क्वालिटी और एडिटोरियल इंटीग्रिटी पक्का करने के लिए, हम ह्यूमन-इन-द-लूप (HITL) प्रोसेस का इस्तेमाल करते हैं। AI शुरुआती ड्राफ्ट बनाने में मदद करता है, जबकि हमारी अनुभवी एडिटोरियल टीम पब्लिकेशन से पहले कंटेंट को ध्यान से रिव्यू, एडिट और बेहतर बनाती है। द फेडरल में, हम भरोसेमंद और इनसाइटफुल जर्नलिज़्म देने के लिए AI की एफिशिएंसी को ह्यूमन एडिटर्स की एक्सपर्टीज़ के साथ मिलाते हैं।)
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