
ममता बनर्जी की जीत की कुंजी, ये 6 जिले टीएमसी को बनाते हैं अजेय
बंगाल चुनाव में TMC अपने मजबूत वोटबैंक और खासकर मुस्लिम बहुल जिलों में पकड़ के दम पर अजेय होने का दावा कर रही है, जबकि विपक्ष बदलाव की बात कर रहा है।
पश्चिम बंगाल में दो चरणों में 23 अप्रैल और 29 अप्रैल को मतदान होना है। पहले चरण के लिए लाउडस्पीकर का शोर थम चुका हैं और प्रत्याशी घर घर जाकर अपने लिए वोटर्स से समर्थन मांग रहे हैं। इन सबके बीच टीएमसी, वाम दल, कांग्रेस और बीजेपी का दावा है कि इस दफा बदलाव होने वाला है। लेकिन टीएमसी नेताओं का कहना है कि दिन में सपने देखने में हर्ज ही क्या। ममता दीदी पर पहले की तरह भरोसा लोगों का भरोसा बरकरार है। ऐसे में टीएमसी खुद को अजेय क्यों मान रही है, उसके पीछे आधार क्या है।
आप अक्सर चिकेन नेक की बात सुनते हैं इसके जरिए भारत की मुख्य भूमि का पूर्वोत्तर से नाता है। लेकिन पश्चिम बंगाल के संदर्भ में देखें तो 8 जिले इस चिकेन नेक पर बसे हैं। इन जिलों से बने पश्चिम बंगाल के हिस्से को उत्तर बंगाल भी कहा जाता है। इस चुनाव में विपक्ष खासतौर से बीजेपी की तरफ से मांग की जा रही है इन्हें केंद्र शासित प्रदेश घोषित कर दिया जाय। हालांकि इसका ममता बनर्जी ने जब विरोध किया तो बीजेपी की प्रदेश ईकाई ने सफाई दी कि बंगाल को बांटना हमारा मकसद नहीं है।
अगर राजनीतिक तौर पर देखें तो उत्तर बंगाल के हथियाने से बीजेपी को खास फायदा नहीं है। यह इलाका पहले भी बीजेपी की तरफ झुकाव दिखाता रहा है। 2021 के विधानसभा चुनाव में इन 8 जिलों की 54 सीटों पर बीजेपी 30 सीट और टीएमसी 24 सीट जीतने में कामयाब रही है। 2016 में वाम दलों ने 25 सीटें जीती थीं। लेकिन 2021 में फायदा बीजेपी ने उठाया। इन जिलों की डेमोग्राफी की बात करें तो 73 से 74 फीसद आबादी हिंदुओं की है सिर्फ उत्तर दिनाजपुर और मालदा में मुस्लिम आबादी 50 फीसद के करीब है और यहां टीएमसी मजबूत है।
पश्चिम बंगाल के 23 जिलों में 6 जिले मुस्लिम बहुल हैं। मुर्शिदाबाद, मालदा, उत्तर दिनाजपुर, दक्षिण 24 परगना, उत्तर 24 परगना,बीरभूम शामिल हैं। इन जिलों में 118 सीटें हैं यानी कि 40 फीसद सीट। 2021 में टीएमसी ने 215 सीटें जीती थीं और इनमें से 48 फीसद सीट इन 6 जिलों से आई थी। इन जिलों में टीएमसी का जीत का प्रतिशत 86 फीसद रहा था। बीजेपी महज 14 सीट जीतने में कामयाब हुई। अब ये 6 जिले टीएमसी के गढ़ कैसे बने। वाम दलों के 34 साल के शासन में मुस्लिम उनके वोटबैंक हुआ करते थे।लेकिन 2004 की सच्चर कमेटी और 2007 में नंदीग्राम और सिंगुर के मुद्दे ने तस्वीर बदल दी। सच्चर कमेटी ने जब बताया कि वाम दलों के शासन में मुस्लिमों की हालत में सुधार नहीं हुआ वहीं से मुस्लिम समाज में वाम दलों के लिए निराशा पनपी और वो दूसरे ठिकाने की तलाश में जुट गए। 2007 में जब सिंगुर में जमीन अधिग्रहण हुआ तो उससे सबसे अधिक मुस्लिम समाज प्रभावित हुआ। ममता ने मौका देखा और उसे अपने पक्ष में मोड़ लिया।
ममता ने वाम दलों के खिलाफ मां, माटी और मानुष को हथियार बनाया और उसका असर यह हुआ कि मुस्लिम समाज के मन में ममता के लिए सॉफ्ट कॉर्नर बना।2011 में सत्ता में आने के बाद ममता ने कुछ कदम भी उठाए और चुनावी तकरीरों को जमीन पर उतार, योजनाओं को नीतियों में बदला और मुस्लिम समाज को लगने लगा कि ममता के रूप में उन्हें हितैषी मिल चुका है। ममता बनर्जी का इमामों, मोअज्जिनों के लिए मासिक भत्ता, ऐक्यश्री स्कॉलरशिप से अल्पसंख्यक छात्रों को मदद, मुस्लिम जातियों को ओबीसी में शामिल करना अहम कदम था। इसके साथ ही सांस्कृतिक नजदीकी बढ़ाई जैसे हिजाब पहनकर इफ्तार पार्टी में जाना, इस्लामी दुआएं पढ़ना। इसकी वजह से मुस्लिम मतदाता, ममता बनर्जी को अपना करीबी मानने लगे।
एनआरसी- सीएए के मुद्दे पर ममता बनर्जी ने केंद्र सरकार पर निशाना साधा और खुद को ढाल के तौर पर पेश किया। उनके इस रुख को मुस्लिम समाज ने पसंद किया। उन्हें ऐसा लगा कि ममता बनर्जी जब तक बंगाल में वो उनकी हिफाजत करेंगी। पश्चिम बंगाल के वोटिंग पैटर्न को अगर देखें तो 2016 विधानसभा चुनाव में 51 फीसद, 2019 लोकसभा चुनाव में 70 फीसद और 2021 विधानसभा चुनाव में 75 फीसद मुस्लिम मतदाताओं ने उनके पक्ष में मतदान किया। वहीं 2016 में 43, लोकसभा चुनाव 2019 में 32 और 2021 विधानसभा चुनाव में 39 फीसद हिंदू वोटर्स ने टीएमसी के पक्ष में मत दिया। इस विषय पर हमारे सहयोगी द फेडरल के समीर के पुरकायस्थ कहते हैं कि इन आंकड़ों से आप ममता की जीत को समझ सकते हैं।

