विजय सरकार का दांव: सहयोगियों के दोहरे रुख के बीच संतुलन की राह
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विजय सरकार का दांव: सहयोगियों के दोहरे रुख के बीच संतुलन की राह

DMK गठबंधन की चार पार्टियाँ विजय की सरकार को समर्थन दे रही हैं; हालाँकि यह व्यवस्था कानूनी है, लेकिन राजनीतिक रूप से यह बेहद विस्फोटक है और भारत में बिल्कुल नई है।


Legal Lens : जब सी. जोसेफ विजय ने चेन्नई के नेहरू इंडोर स्टेडियम में तमिलनाडु के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली, तो इसके साथ ही राज्य में एक सप्ताह से जारी राजनीतिक अनिश्चितता और गणितीय उठापटक का दौर समाप्त हो गया। हालांकि, इस भव्य शपथ ग्रहण समारोह ने उस बुनियादी सवाल को हल नहीं किया है कि तमिलनाडु में अब किस तरह की सरकार का स्वरूप देखने को मिलेगा। तमिलगा वेत्री कड़गम (TVK) जिस ढांचे के सहारे सत्ता में आई है, वह भारतीय राजनीति के इतिहास में अपनी तरह का इकलौता उदाहरण है। न तो केंद्र सरकार के स्तर पर और न ही किसी अन्य राज्य में आज तक ऐसी सत्ता संरचना देखी गई है जहाँ समर्थन देने वाले दल विपक्षी खेमे में भी मजबूती से खड़े हों।


गठबंधन की परिभाषा से परे एक नई व्यवस्था
आमतौर पर राजनीतिक विश्लेषक और पत्रकार इस नई सरकार को 'गठबंधन सरकार' का नाम दे रहे हैं, लेकिन बारीकी से देखने पर यह शब्द यहाँ पूरी तरह फिट नहीं बैठता। विजय का समर्थन करने वाले दलों में केवल कांग्रेस ही ऐसी पार्टी है जिसने औपचारिक रूप से डीएमके के नेतृत्व वाले सेक्युलर प्रोग्रेसिव अलायंस (SPA) से नाता तोड़ा है। इसके विपरीत, सीपीआई, सीपीआई (एम) और विदुथलाई चिरुथैगल काची (VCK) ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वे SPA का हिस्सा बने रहेंगे। वे राष्ट्रीय और बड़े राजनीतिक मुद्दों पर डीएमके के साथ खड़े रहेंगे, जबकि राज्य में विजय की सरकार को बाहर से समर्थन देंगे। इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग ने भी इसी राह पर चलने का फैसला किया है। यह एक ऐसा ढांचा है जिसकी भारत में कोई मिसाल नहीं मिलती।

भारतीय राजनीति में अल्पसंख्यक सरकारों को बाहर से समर्थन मिलने के मामले तो बहुत हैं, लेकिन यह पहली बार है कि समर्थन देने वाली पार्टियां उसी समय मुख्य विपक्षी दल के मूल गठबंधन की सदस्य भी बनी हुई हैं। यह विरोधाभास इस सरकार के स्थायित्व पर हमेशा एक सवालिया निशान बनाए रखेगा। यह स्थिति न केवल राजनीतिक रूप से जटिल है, बल्कि यह मतदाताओं के लिए भी एक पहेली की तरह है, जो यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि उनके प्रतिनिधि सत्ता के साथ हैं या विपक्ष के साथ।

पुराने ढर्रे का टूटना और नई चुनौतियां
यदि हम केंद्र या अन्य राज्यों के पुराने उदाहरणों को देखें, तो वहां समर्थन देने वाले दल आमतौर पर तटस्थ या निर्दलीय की भूमिका में होते थे। वे किसी विरोधी मोर्चे का हिस्सा नहीं होते थे और न ही उनके समर्थन में कोई बुनियादी वैचारिक अंतर्विरोध होता था। लेकिन तमिलनाडु का मामला इस स्थापित पैटर्न को पूरी तरह से पलट देता है। सीपीआई, माकपा और वीसीके सदन के पटल पर विजय के पक्ष में मतदान करेंगे, जबकि वे उसी गठबंधन के घटक बने रहेंगे जिसका नेतृत्व मुख्य विपक्षी दल कर रहा है। तमिलनाडु के अपने राजनीतिक इतिहास में भी ऐसी कोई मिसाल नहीं मिलती जहाँ सत्ता और विपक्ष के बीच की रेखा इतनी धुंधली हो गई हो।

संविधान की दसवीं अनुसूची (दलबदल विरोधी कानून) के जानकारों का कहना है कि तकनीकी तौर पर इसमें कोई कानूनी बाधा नहीं है। कानून के अनुसार, कोई विधायक केवल तभी अयोग्य होता है जब वह अपनी मूल राजनीतिक पार्टी के व्हिप का उल्लंघन करे। सीपीआई विधायक के लिए उनकी पार्टी सीपीआई है, न कि कोई चुनाव पूर्व बना गठबंधन। चुनाव पूर्व गठबंधन को संविधान राजनीतिक दल के रूप में मान्यता नहीं देता, इसलिए SPA का कोई भी निर्देश कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं है। यह कानूनी लूपहोल विजय सरकार के लिए एक सुरक्षा कवच की तरह काम कर रहा है, लेकिन नैतिकता के धरातल पर यह बहस का विषय बना रहेगा।

राजनीतिक अंतर्विरोध और डीएमके का रुख
कानूनी तौर पर रास्ता साफ होने के बावजूद, राजनीतिक अंतर्विरोध बेहद तीव्र है। समर्थन देने वाले दलों ने अपना एक पैर मूल गठबंधन में रखा है और दूसरा उस सरकार में जिसे वे समर्थन दे रहे हैं। यह स्थिति केवल तब तक बनी रह सकती है जब तक डीएमके इस अनोखी व्यवस्था को सहन करती है। जैसे-जैसे सदन की कार्यवाही आगे बढ़ेगी और डीएमके एक आक्रामक विपक्ष की भूमिका निभाएगी, इस व्यवस्था का टिकाऊपन खतरे में पड़ सकता है। राजनीतिक वैज्ञानिक ई. श्रीधरन ने भारतीय गठबंधनों को चार श्रेणियों में बांटा है, लेकिन विजय की सरकार इन चारों श्रेणियों से अलग एक नई पेचीदगी पैदा करती है। यहाँ बाहरी समर्थक स्वतंत्र नहीं हैं, उनका एक अपना 'घर' है और वह घर विरोधी खेमे में है।

विजय की सरकार की लंबी उम्र इस बात पर निर्भर करेगी कि वे केंद्र में एनडीए के प्रयोग से कितनी सीख लेते हैं। यदि वे बहुमत के आंकड़े से काफी ऊपर कुछ अतिरिक्त 'बीमा' सहयोगियों को जुटाने में सफल रहते हैं, तभी वे अपनी शर्तों पर शासन कर पाएंगे। उन्हें यह समझना होगा कि राजनीति में 'बिना शर्त समर्थन' जैसी कोई चीज नहीं होती, और समय आने पर हर सहयोगी अपनी कीमत वसूलने की कोशिश करेगा।

वैश्विक संदर्भ और लिखित समझौतों की आवश्यकता
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अगर हम नजर डालें, तो स्वीडन और न्यूजीलैंड में 'कॉन्ट्रैक्ट पार्लियामेंट्रिज्म' के उदाहरण मिलते हैं। वहां अल्पसंख्यक सरकारें एक लिखित समझौते के आधार पर चलती हैं, जिसमें यह स्पष्ट होता है कि किन मुद्दों पर समर्थन मिलेगा और किन पर नहीं। तमिलनाडु में स्थिति इसके ठीक उलट है। यहाँ समर्थन तो है, लेकिन कोई लिखित अनुबंध या 'कॉमन मिनिमम प्रोग्राम' नहीं है। राज्यपाल को दिए गए पत्रों में केवल धर्मनिरपेक्षता की रक्षा और राष्ट्रपति शासन को रोकने जैसे सामान्य शब्दों का प्रयोग किया गया है।

बिना किसी लिखित नीतिगत रोडमैप के, सरकार चलाना एक चुनौतीपूर्ण कार्य होगा। बजट सत्र से लेकर महत्वपूर्ण विधेयकों को पारित कराने तक, हर कदम पर विजय को नए सिरे से सौदेबाजी करनी होगी। यदि किसी मुद्दे पर समर्थक दल असहमत होते हैं, तो सरकार के पास उसे सुलझाने का कोई पहले से तय तंत्र मौजूद नहीं है। यह 'तदर्थ' राजनीति (Ad-hoc politics) शासन में देरी और अनिश्चितता का कारण बन सकती है, जो एक विकसित राज्य के लिए बेहतर संकेत नहीं है।

प्रशासनिक तंत्र और कार्यपालिका की भूमिका
तमिलनाडु का प्रशासनिक ढांचा पिछले 59 वर्षों से एकदलीय शासन के अनुरूप ढला हुआ है। 1967 में अन्नादुरई के नेतृत्व में डीएमके की जीत के बाद से राज्य में लगातार एक ही पार्टी का बहुमत रहा है। सचिवालय की फाइलिंग प्रणाली, कैबिनेट समितियों का गठन और विधानसभा अध्यक्ष के कार्यालय की कार्यप्रणाली सब कुछ एक दलीय प्रभुत्व के हिसाब से विकसित हुई है। पहली बार कार्यपालिका को ऐसी सरकार के साथ काम करना होगा जहाँ मुख्यमंत्री की पार्टी के पास पूर्ण बहुमत नहीं है और उसे चार अन्य दलों के इशारों पर निर्भर रहना होगा।

पड़ोसी राज्यों जैसे केरल में मोर्चे वाली राजनीति का लंबा इतिहास है, जहाँ विवादों को सुलझाने के लिए औपचारिक मंच बने हुए हैं। महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल ने भी दशकों तक गठबंधन सरकारों का अनुभव लिया है। लेकिन तमिलनाडु के लिए यह बिल्कुल नया अनुभव है। विजय के शुरुआती हफ्ते इसी उधेड़बुन में बीतेंगे कि अन्य राज्यों द्वारा अपनाई गई परंपराओं को यहाँ कैसे लागू किया जाए। अधिकारियों के लिए भी यह चुनौतीपूर्ण होगा कि वे किसके आदेशों को प्राथमिकता दें। मुख्यमंत्री के या उन दलों के जिनके दम पर सरकार टिकी है।

स्पीकर की निष्पक्षता और सत्ता का भविष्य
इस पूरी व्यवस्था में विधानसभा अध्यक्ष (स्पीकर) का पद सबसे महत्वपूर्ण होने जा रहा है। चूंकि समर्थक दल कैबिनेट का हिस्सा नहीं हैं, इसलिए स्पीकर ही सत्ता पक्ष और बाहरी समर्थकों के बीच सेतु का काम करेंगे। स्पीकर की निष्पक्षता और उनकी कार्यशैली ही इस प्रशासन की दिशा तय करेगी। क्या एक टीवीके समर्थक स्पीकर अपनी पार्टी की संबद्धता से ऊपर उठकर काम कर पाएंगे? यह एक बड़ा सवाल है। स्पीकर को न केवल सदन का संचालन करना होगा, बल्कि दलबदल की संभावनाओं और विपक्ष के हमलों से भी सरकार को बचाना होगा।

सामाजिक और आर्थिक प्रभाव
इस राजनीतिक प्रयोग का असर तमिलनाडु की सामाजिक योजनाओं और आर्थिक नीतियों पर भी पड़ेगा। विजय ने अपनी पार्टी के माध्यम से कई लोकलुभावन वादे किए हैं, लेकिन उन्हें लागू करने के लिए वित्तीय संसाधनों और विधायी समर्थन की आवश्यकता होगी। समर्थक दल, जो अलग-अलग विचारधाराओं (वामपंथी और उदारवादी) से आते हैं, वे आर्थिक फैसलों पर अपना प्रभाव डालेंगे। उदाहरण के लिए, निजीकरण या श्रम कानूनों में बदलाव जैसे मुद्दों पर टीवीके और वामपंथी दलों के बीच टकराव की स्थिति बन सकती है।

भविष्य की राह
अंत में, इस प्रयोग की सफलता इस बात पर टिकी है कि कोई भी पक्ष फिलहाल राज्य में दोबारा चुनाव या राष्ट्रपति शासन नहीं चाहता। वामपंथी दल विशेष रूप से राष्ट्रपति शासन को बीजेपी के 'परोक्ष शासन' के रूप में देखते हैं, जो उन्हें विजय सरकार के साथ खड़े रहने के लिए मजबूर करता है। विजय के पास एक अभिनेता से राजनेता बनने का करिश्मा तो है, लेकिन एक प्रशासक के रूप में उनकी असली परीक्षा अब शुरू हुई है। उन्हें जटिल फाइलों, गठबंधन की राजनीति और जनता की उम्मीदों के बीच संतुलन बनाना होगा।

आने वाले पांच साल न केवल जोसेफ विजय की नेतृत्व क्षमता का परीक्षण करेंगे, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की लचीली प्रकृति का भी एक नया अध्याय लिखेंगे। क्या यह 'तमिलनाडु मॉडल' भविष्य में अन्य राज्यों के लिए एक उदाहरण बनेगा, या यह केवल एक अस्थायी राजनीतिक व्यवस्था बनकर रह जाएगा? इसका जवाब समय के पास है। फिलहाल, तमिलनाडु की जनता एक ऐसी सरकार की उम्मीद कर रही है जो राजनीतिक उठापटक से ऊपर उठकर जनहित के कार्यों पर ध्यान केंद्रित करे।


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