फ्लोर टेस्ट से पहले समर्थन पत्र की मांग, राज्यपाल की भूमिका पर उठे सवाल
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फ्लोर टेस्ट से पहले समर्थन पत्र की मांग, राज्यपाल की भूमिका पर उठे सवाल

तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में टीवीके सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर उभरी है। लेकिन सरकार बनाने के लिए संख्या बल की कमी है, ऐसे में राज्यपाल के व्यवहार और नजरिए पर संवैधानिक और कानूनी बहस तेज हो गई है।


तमिलनाडु में त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति के बाद राजनीतिक गतिरोध अब बड़े संवैधानिक विवाद में बदलता नजर आ रहा है। सवाल यह उठ रहा है कि क्या राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ अर्लेकर तमिलगा वेत्री कड़गम (TVK) प्रमुख विजय को सरकार बनाने का न्योता देने से पहले बहुमत का लिखित प्रमाण मांग सकते हैं?

अभी तक कोई दूसरा गठबंधन औपचारिक रूप से सरकार बनाने का दावा पेश नहीं कर पाया है, इसलिए बहस इस बात पर केंद्रित हो गई है कि क्या राज्यपाल को सबसे बड़ी पार्टी होने के नाते विजय को पहले सरकार बनाने का मौका देना चाहिए और फिर विधानसभा में फ्लोर टेस्ट के जरिए बहुमत साबित करने देना चाहिए। इस संवैधानिक और राजनीतिक स्थिति पर द फेडरल ने लोकसभा के पूर्व महासचिव पीडीटी आचार्य और वरिष्ठ कानूनी पत्रकार वी वेंकटेशन से बातचीत की।

48 घंटे बाद भी विजय को नहीं मिला न्योता

तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में TVK 108 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है। लेकिन नतीजे आने के 48 घंटे बाद भी राज्यपाल ने विजय को सरकार बनाने का न्योता नहीं दिया है।रिपोर्ट के मुताबिक विजय दो बार राज्यपाल से मिल चुके हैं, लेकिन उनसे पहले 118 विधायकों के समर्थन का प्रमाण देने को कहा गया।

अब मुख्य संवैधानिक सवाल यही है कि क्या मुख्यमंत्री पद की शपथ से पहले बहुमत का सबूत देना जरूरी है, या फिर इसका फैसला केवल विधानसभा के फ्लोर टेस्ट में होना चाहिए।

क्या कहते हैं पीडीटी आचार्य?

लोकसभा के पूर्व महासचिव पीडीटी आचार्य का कहना है कि राज्यपाल का संवैधानिक दायित्व राज्य में स्थिर सरकार बनाने की प्रक्रिया को आगे बढ़ाना है।उन्होंने कहा कि सरकार गठन को लेकर सरकारिया आयोग की सिफारिशें और सुप्रीम कोर्ट के फैसले स्पष्ट दिशा देते हैं। इनके मुताबिक राज्यपाल को पहले बहुमत वाले प्री-पोल गठबंधन को मौका देना चाहिए। अगर ऐसा गठबंधन नहीं हो, तो पोस्ट-पोल गठबंधन को बुलाना चाहिए। और अगर वह भी न हो, तो सबसे बड़ी पार्टी को अवसर मिलना चाहिए।

आचार्य ने कहा कि TVK को कांग्रेस का समर्थन मिल चुका है और वह छोटे दलों से भी बातचीत कर रही है। ऐसे में राज्यपाल को यह देखना चाहिए कि क्या यह गठबंधन स्थिर सरकार दे सकता है।उन्होंने कहा कि चूंकि TVK सबसे बड़ी पार्टी है और कोई दूसरा गठबंधन सामने नहीं आया है, इसलिए राज्यपाल के पास विजय को बुलाने के अलावा कोई संवैधानिक विकल्प नहीं बचता।

वाजपेयी सरकार का उदाहरण

आचार्य ने 1996 का उदाहरण देते हुए कहा कि तत्कालीन राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा ने बहुमत न होने के बावजूद अटल बिहारी वाजपेयी को सरकार बनाने का न्योता दिया था।उस समय वाजपेयी को लोकसभा में बहुमत साबित करने के लिए कहा गया था, हालांकि उनकी सरकार केवल 13 दिन चली थी। उन्होंने 1998 का भी जिक्र किया, जब राष्ट्रपति केआर नारायणन ने एनडीए सहयोगियों के समर्थन पत्र मांगने के बाद वाजपेयी को बुलाया था। आचार्य के अनुसार यह भविष्य के राज्यपालों और राष्ट्रपतियों के लिए एक संवैधानिक मिसाल बन गया। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि राज्यपाल अर्लेकर चाहें तो विजय को तुरंत शपथ दिलाकर बाद में विधानसभा में बहुमत साबित करने का मौका दे सकते हैं।

“बहुमत का फैसला सिर्फ विधानसभा में हो सकता है”

वरिष्ठ कानूनी पत्रकार वी वेंकटेशन ने राज्यपाल के मौजूदा रुख पर ज्यादा कड़ा सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि कोई सरकार स्थिर होगी या नहीं, इसका फैसला राज्यपाल नहीं बल्कि विधानसभा करती है। वेंकटेशन ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट कई बार स्पष्ट कर चुका है कि बहुमत का परीक्षण केवल सदन के पटल पर हो सकता है, राजभवन में नहीं। उनके मुताबिक, जब TVK सबसे बड़ी पार्टी है और कोई दूसरा गठबंधन सामने नहीं आया है, तो राज्यपाल को विजय को सरकार बनाने का मौका देना चाहिए और उचित समय में फ्लोर टेस्ट कराने को कहना चाहिए।

“अल्पमत सरकार असंवैधानिक नहीं”

वेंकटेशन ने यह भी कहा कि अल्पमत सरकार बनना असंवैधानिक नहीं है।उन्होंने पीवी नरसिंह राव सरकार का उदाहरण देते हुए कहा कि कई सरकारें बिना पूर्ण बहुमत के भी चली हैं।उन्होंने कहा, “अगर सरकार बहुमत साबित नहीं कर पाती तो गिर जाएगी। इसमें गलत क्या है?” उनके अनुसार संवैधानिक व्यवस्था पहले से ही अल्पमत सरकारों को मान्यता देती है।

क्या मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच सकता है?

इस बहस के दौरान यह सवाल भी उठा कि क्या राज्यपाल के फैसले की न्यायिक समीक्षा हो सकती है।वेंकटेशन ने कहा कि यह स्थिति असाधारण है, क्योंकि अब तक के ज्यादातर मामलों में विवाद गलत दावेदार को बुलाने को लेकर रहा है। लेकिन यहां मामला सबसे बड़ी पार्टी को ही नहीं बुलाने का है। उन्होंने कहा कि 118 विधायकों के लिखित समर्थन की शर्त संवैधानिक रूप से कमजोर नजर आती है। उनके मुताबिक, अगर राज्यपाल फैसला टालते हैं तो विजय सीधे सुप्रीम कोर्ट का रुख कर सकते हैं।

राष्ट्रपति शासन की संभावना भी चर्चा में

बातचीत के दौरान राष्ट्रपति शासन की संभावना पर भी चर्चा हुई।आचार्य ने कहा कि अगर कोई स्थिर सरकार नहीं बनती है, तो राज्यपाल राष्ट्रपति शासन की सिफारिश कर सकते हैं और विधानसभा को सस्पेंडेड एनीमेशन में रखा जा सकता है। हालांकि दोनों विशेषज्ञों ने माना कि ऐसा कदम तभी उठाया जाना चाहिए, जब सरकार गठन के सभी विकल्प पूरी तरह खत्म हो जाएं।

बहस का केंद्र बना राज्यपाल का फैसला

फिलहाल तमिलनाडु की राजनीति में सबसे बड़ा संवैधानिक सवाल यही बना हुआ है कि क्या राज्यपाल द्वारा विजय से पहले लिखित बहुमत का प्रमाण मांगना विवेकपूर्ण संवैधानिक कदम है या फिर यह स्थापित संसदीय परंपराओं से अलग हटने जैसा फैसला है।

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