चुनाव से 7 दिन पहले बवाल, वोट नहीं दे पाएंगे बंगाल के कई हजार लोग?
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अधर में लटके मुर्शिदाबाद के 12,000 मतदाता। फोटो: अभिषेक शर्मा

चुनाव से 7 दिन पहले बवाल, वोट नहीं दे पाएंगे बंगाल के कई हजार लोग?

पश्चिम बंगाल के चुनावों में अब महज एक सप्ताह का समय बचा है। लेकिन हजारों मतदाताओं के वोट पर अनिश्चितता के बादल मंडरा रहे हैं। प्रक्रिया के पालन में हुई कमी...


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मुर्शिदाबाद (पश्चिम बंगाल): पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले में लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर एक बड़ा सवालिया निशान लग गया है। निर्वाचन आयोग (EC) द्वारा मतदाता सूची को 'फ्रीज' (अंतिम रूप से बंद) किए जाने के बाद भी हजारों मतदाताओं के नाम अब भी 'विचाराधीन' श्रेणी में रखे गए हैं। चुनाव में अब महज एक सप्ताह का समय बचा है लेकिन इन मतदाताओं के भविष्य पर अनिश्चितता के बादल मंडरा रहे हैं। उचित प्रक्रिया के पालन में हुई इस कमी ने हजारों नागरिकों के मतदान के अधिकार को गंभीर संकट में डाल दिया है।

अधूरी प्रक्रिया और मतदाताओं की बेबसी

मोहम्मद शरीफ अहमद मुर्शिदाबाद के दक्षिण महादेब नगर बूथ के उन 795 निवासियों में शामिल हैं, जिनका नाम निर्वाचन आयोग द्वारा मतदाता सूची फ्रीज किए जाने के बावजूद अब तक 'विचाराधीन' बना हुआ है। कई ऐसे मामलों का समाधान न होना नियत प्रक्रिया (Due Process) का गंभीर उल्लंघन माना जा रहा है। चुनाव आयोग के अपने दिशा-निर्देशों के अनुसार, नियम यह कहता है कि किसी भी चिन्हित या 'फ्लैग्ड' मतदाता का पक्ष सुना जाना चाहिए और पूरक सूची प्रकाशित होने तथा रोल फ्रीज होने से पहले उनके मामले का निपटारा अनिवार्य रूप से किया जाना चाहिए।

विशेषज्ञों का कहना है कि मामलों के विचाराधीन रहते हुए मतदाता सूची को फ्रीज कर देना इस आवश्यक क्रम की अनदेखी है। इस कमी ने इन "विचाराधीन" मतदाताओं को एक कानूनी और लोकतांत्रिक अधर में छोड़ दिया है।

अपील के अधिकार से भी वंचित हुए नागरिक

'एसोसिएशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ डेमोक्रेटिक राइट्स' (APDR) के उपाध्यक्ष रंजीत सुर ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। उन्होंने स्पष्ट किया, "नामों को 'विचाराधीन' श्रेणी में रखकर चुनाव आयोग ने अनिवार्य रूप से इन लोगों से ट्रिब्यूनल के सामने अपील करने का अधिकार भी छीन लिया है।" सुर ने तकनीकी पहलू समझाते हुए कहा कि अपीलीय उपाय का उपयोग केवल तभी किया जा सकता है जब कोई औपचारिक आदेश पारित किया गया हो। इस संदर्भ में, जब तक किसी मतदाता का नाम आधिकारिक तौर पर हटाया नहीं जाता, तब तक वह आदेश के अभाव में कानूनी उपचार की मांग भी नहीं कर सकता।



मोहम्मद शरीफ अहमद, जो मुर्शिदाबाद के दक्षिण महादेब नगर बूथ के उन 795 निवासियों में शामिल हैं जिनके नाम अभी भी विचाराधीन (अंडर एडजुडिकेशन) हैं, अपने जमीन के दस्तावेज दिखाते हुए।

दस्तावेजों की मौजूदगी के बावजूद अनिश्चितता

मूर्शिदाबाद के कई निवासियों के पास न केवल निर्वाचन आयोग द्वारा निर्धारित पात्रता के प्रमाण (जैसे पासपोर्ट और शैक्षणिक प्रमाण पत्र) मौजूद हैं, बल्कि उनके पास भारत की स्वतंत्रता से पहले के 'विरासत दस्तावेज' (Legacy Documents) भी हैं। स्थानीय निवासी मोहम्मद अब्दुर रब शमीम ने अपने दादा और पिता के नाम के भूमि दस्तावेज (Land Deeds) दिखाए हैं, जो दशकों पुराने हैं। इसके बावजूद, उनका नाम अभी भी निर्णय प्रक्रिया के अधीन रखा गया है।

"या तो वोट देने दो या चुनाव रद्द करो"

निर्वाचन आयोग की इस कार्यप्रणाली से आक्रोशित मुर्शिदाबाद की एक युवा मतदाता मोमिना खातून ने कहा, "चुनाव आयोग को शर्म आनी चाहिए। मैं आयोग से कह रही हूं या तो हमें हमारा वोट डालने का अधिकार दें या फिर इन चुनावों को ही रद्द कर दें।"

मोहम्मद शरीफ अहमद ने 'द फेडरल' को अपने दादा के नाम पर 1924 में पंजीकृत एक जमीन का दस्तावेज दिखाया। उन्होंने बताया, "मैंने सुनवाई के दौरान आयोग द्वारा नियुक्त पर्यवेक्षकों के सामने अपने दादा के नाम के 1924 के रिकॉर्ड और पिता के नाम के 1974 के रिकॉर्ड पेश किए थे। मैंने अपना पासपोर्ट भी जमा किया है, जो मुझे 1971 के एक डीड के आधार पर मिला था।" अहमद और महादेव नगर के अन्य मतदाताओं ने अपनी स्थिति को लेकर गहरी चिंता व्यक्त की है। क्योंकि उनके भविष्य पर फिलहाल कोई स्पष्टता नहीं है।

मुर्शिदाबाद के एक अन्य निवासी मोहम्मद अब्दुर रब शमीम ने अपनी व्यथा साझा करते हुए बताया, "मेरे पास अपने दादा और पिता के नाम के 1942 के समय के जमीन के दस्तावेज हैं, इसके बावजूद मेरा नाम अब तक 'विचाराधीन' (Under Adjudication) रखा गया है।" यह समस्या केवल किसी एक बूथ तक सीमित नहीं है। अल्पसंख्यक बहुल मुर्शिदाबाद जिले के कई बूथों पर मतदाता इसी तरह की अनिश्चितता और तनावपूर्ण स्थिति का सामना कर रहे हैं।

आंकड़ों की जुबानी: 12,000 मतदाता अधर में

रिपोर्ट के अनुसार, फक्का ब्लॉक की महादेव नगर पंचायत के पांच बूथों में लगभग 2,900 लोग अब भी 'विचाराधीन' श्रेणी में अटके हुए हैं। सूत्रों के हवाले से मिली जानकारी के मुताबिक, 14 अप्रैल तक पूरे जिले में कुल 12,000 से अधिक मतदाताओं के मामले विचाराधीन श्रेणी में बने हुए हैं। गौरतलब है कि जिले में कुल 11.1 लाख मतदाताओं के नाम जांच के दायरे में थे, जिनमें से लगभग 10.88 लाख मामलों का निपटारा किया जा चुका है, लेकिन शेष 12,000 मतदाताओं पर फैसला अब तक नहीं हो पाया है।

निर्वाचन आयोग (EC) ने अब तक यह स्पष्ट नहीं किया है कि इन मतदाताओं के मामलों का निपटारा करने में क्या बाधाएं आईं। साथ ही, इस बात पर भी कोई स्पष्टता नहीं है कि आखिर किन आधारों पर उनके नामों को 'विचाराधीन' श्रेणी में रखा गया था।

बूथ स्तर के अधिकारी का खुलासा

बूथ स्तर के अधिकारी (BLO) मोहम्मद असफाक हुसैन ने जमीनी हकीकत बताते हुए कहा, "ज्यादातर अन्य बूथों पर पूरक सूचियां (Supplementary Lists) प्रकाशित हो चुकी हैं। लेकिन मेरे बूथ संख्या 187 और हमारी महादेव नगर पंचायत के चार-पांच अन्य बूथों पर अब तक कोई पूरक सूची जारी नहीं की गई है।" उन्होंने बताया कि उनके बूथ के कुल 1,327 मतदाताओं में से केवल 522 को ही मुख्य मतदाता सूची में शामिल किया गया है, जबकि शेष 795 नाम अब भी विचाराधीन हैं।

हुसैन ने आगे कहा, "इन लंबित नामों में शिक्षक और डॉक्टर जैसे सम्मानित नागरिक भी शामिल हैं, जिनके पास दशकों पुराने पुख्ता दस्तावेज मौजूद हैं। इसके बावजूद कोई स्पष्ट निर्णय नहीं लिया गया है, उनके नामों को न तो मंजूरी मिली है और न ही हटाया गया है। इससे पूरा बूथ प्रभावी रूप से अनिश्चितता की स्थिति में है।"

कानूनी अड़चन और आयोग की मंशा पर सवाल

बीएलओ हुसैन ने यह भी स्पष्ट किया कि इस स्थिति ने जमीन पर कई जटिलताएं पैदा कर दी हैं। चूंकि मामले अभी लंबित हैं और कोई अंतिम आदेश जारी नहीं हुआ है, इसलिए ग्रामीण ट्रिब्यूनल का दरवाजा भी नहीं खटखटा पा रहे हैं। कानूनी रूप से अपील करने का अधिकार केवल तभी मिलता है जब आयोग द्वारा कोई अंतिम फैसला लिया जाए।

अदालत में एसआईआर (SIR) प्रक्रिया को चुनौती देने वाले वकीलों में से एक अरिंदम दास ने इस पूरी प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने अपनी राय व्यक्त करते हुए कहा, "सभी मामलों का निपटारा किए बिना मतदाता सूची को 'फ्रीज' (अंतिम रूप से बंद) कर देना यह दर्शाता है कि निर्वाचन आयोग ने इस पूरी कवायद को कितनी मनमानी से संभाला है। यह न्याय का उपहास और लोकतंत्र का मजाक है।" चुनाव आयोग की इन खामियों ने अब उसकी मंशा और कार्यप्रणाली की निष्पक्षता पर गहरे प्रश्न खड़े कर दिए हैं।

पश्चिम बंगाल में चुनावी सरगर्मी के बीच मुर्शिदाबाद में मतदाता सूची से हजारों नाम हटाए जाने या उन्हें 'विचाराधीन' (Under Adjudication) रखने के मामले ने अब एक बड़ा राजनीतिक रूप ले लिया है। विपक्षी दलों ने निर्वाचन आयोग (EC) की कार्यप्रणाली पर तीखे प्रहार किए हैं। कांग्रेस के प्रवक्ता चंदन घोष चौधरी ने आयोग की आलोचना करते हुए कहा, "चुनाव आयोग अब पूरी तरह से एक विफल संस्थान बन चुका है। इसकी विफलता का इससे बड़ा उदाहरण और क्या हो सकता है कि आयोग द्वारा पैदा की गई इस अव्यवस्था और गड़बड़ी को साफ करने के लिए अब अदालतों को हस्तक्षेप करना पड़ रहा है?"

चौधरी ने आगे अपनी बात जोड़ते हुए कहा कि वैध मतदाताओं को चुनावी प्रक्रिया से बाहर रखकर मतदान कराना सीधे तौर पर नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन है।



"या तो हमें वोट देने दो या चुनाव रद्द कर दो" मुर्शिदाबाद की निवासी मोमिना खातून ने मांग की।

राजनीतिक समीकरणों में बदलाव की आहट

मतदाता सूची में की गई इस कथित मनमानी कटौती के कारण कई निर्वाचन क्षेत्रों में राजनीतिक समीकरण पूरी तरह बदलते नजर आ रहे हैं। महादेव नगर ग्राम पंचायत के तृणमूल कांग्रेस (TMC) पंचायत समिति सदस्य कमाल हुसैन ने इस बदलाव को आंकड़ों के जरिए स्पष्ट किया।

हुसैन ने कहा, "फरक्का विधानसभा क्षेत्र का उदाहरण लीजिए। पिछले संसदीय चुनावों में इस क्षेत्र ने भाजपा उम्मीदवार के मुकाबले कांग्रेस को लगभग 35,000 वोटों की बढ़त दी थी, जबकि तृणमूल कांग्रेस लगभग समान वोट पाकर तीसरे स्थान पर रही थी।" उन्होंने आगे एक गंभीर दावा करते हुए कहा, "अब, एसआईआर (SIR) प्रक्रिया के तहत लगभग 40,000 नामों को या तो हटा दिया गया है या उन्हें विचाराधीन श्रेणी में डाल दिया गया है। इनमें से लगभग 80 प्रतिशत मतदाता मुस्लिम समुदाय से हैं। ये आंकड़े स्वयं उस व्यापक 'गेम प्लान' की ओर इशारा करते हैं, जो इस पूरी एसआईआर कवायद के पीछे छिपा है।"

अविश्वास और हताशा का माहौल

महादेव नगर की गलियों और कूचों में आज गहरी चिंता और बेचैनी पसरी हुई है। यहां शायद ही कोई ऐसा घर हो, जिसके एक या अधिक सदस्यों का नाम मतदाता सूची में शामिल होने से न रह गया हो। मुर्शिदाबाद के एक निवासी मोहम्मद अब्दुर रब शमीम ने अपनी व्यथा सुनाते हुए कहा, "मेरे पास अपने दादा और पिता के नाम के जमीन के दस्तावेज हैं जो 1942 के समय के हैं, इसके बावजूद मेरा नाम अब तक निर्णय के लिए लंबित रखा गया है।"

जब 'द फेडरल' की टीम ने इस सुदूर गांव का दौरा किया तो महिलाओं सहित ग्रामीणों के बड़े समूह अपनी आपबीती सुनाने के लिए जमा हो गए। वे बाहरी दुनिया को यह बताना चाहते थे कि उनके साथ कितनी बड़ी नाइंसाफी हुई है।

"चुनाव आयोग को शर्म आनी चाहिए। मैं आयोग से कह रही हूं या तो हमें वोट देने दें या फिर चुनाव ही रद्द कर दें," एक युवा महिला, मोमिना खातून ने मांग की। उनकी आवाज़ में गुस्सा साफ झलक रहा था क्योंकि बढ़ती चिंता अब हताशा में बदल चुकी है।

लेकिन निर्वाचन आयोग पूरी तरह बेपरवाह और उदासीन दिखाई दे रहा है, जबकि पश्चिम बंगाल में 23 अप्रैल को होने वाले पहले चरण के मतदान में अब एक सप्ताह से भी कम समय बचा है।

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