मछली से काली तक, क्या बीजेपी के इन 5 चक्रव्यूह में फंसी ममता बनर्जी?
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मछली से 'काली' तक, क्या बीजेपी के इन 5 चक्रव्यूह में फंसी ममता बनर्जी?

एग्जिट पोल के अनुसार बंगाल में बीजेपी को बढ़त मिल रही है। ऐसे में सवाल यह है कि क्या 'काली बनाम काबा' नैरेटिव, फिश पॉलिटिक्स, 91लाख वोटर्स के नाम कटने को टीएमसी मुद्दा नहीं बना सकी।


पश्चिम बंगाल में क्या मां, माटी और मानुष के नारा ममता बनर्जी के लिए इस दफा भी काम करेगा। क्या बीजेपी के आक्रामक चुनावी अभियान को कुंद करने में ममता कामयाब रही हैं या बीजेपी इस टीएमसी के किले ढहा देगी। इन सवालों का जवाब वैसे तो 4 मई को मिलेगा। लेकिन एग्जिट पोल के आंकड़े बंगाल की दिलचस्प कहानी पेश कर रहे हैं। एग्जिट पोल के मुताबिक बंगाल में टीएमसी और बीजेपी के बीच कड़ी टक्कर है हालांकि भारतीय जनता पार्टी को बढ़त है। इसका अर्थ यह हुआ कि अगर एग्जिट पोल ही औपचारिक नतीजों में बदले तो पश्चिम बंगाल में कमल खिलाने में कामयाब होगा। यहां पर एग्जिट पोल के आंकड़ों के आधार पर बताएंगे कि बीजेपी को बढ़त क्यों मिलती हुई नजर आ रही है। बंगाल के चुनाव में इस दफा मां, माटी और मानुष के नारे के साथ ही महिला सुरक्षा, घुसपैठिया, वोटर सत्यापन, जय बांग्ला बनाम जय श्रीराम का नारा गूंजता रहा।

‘काबा’ बनाम ‘मां काली’ नैरेटिव

पश्चिम बंगाल की राजनीति में चुनावी माहौल के बीच धार्मिक और सांस्कृतिक प्रतीकों को लेकर एक नया नैरेटिव उभरकर सामने आया। तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की सांसद सयानी घोष ने मुस्लिम बहुल इलाकों में रैलियों के दौरान ‘मेरे दिल में है काबा, और मेरी आंखों में मदीना’ गीत गाया, जिसका वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुआ।

इस मुद्दे को भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने तुरंत राजनीतिक रूप से भुनाने की कोशिश की। अमित शाह और योगी आदित्यनाथ जैसे वरिष्ठ नेताओं ने इसे ‘काली बनाम काबा’ की लड़ाई के रूप में पेश किया। उनका कहना था कि टीएमसी के दिल में काबा-मदीना हो सकता है, लेकिन बंगाल की आत्मा में मां काली और मां दुर्गा का वास है।बीजेपी ने अपनी रणनीति के तहत बंगाल में ‘जय श्री राम’ के साथ-साथ ‘जय मां काली’ के नारे को भी प्रमुखता से आगे बढ़ाया, ताकि वह खुद को स्थानीय सांस्कृतिक परंपराओं से जुड़ा हुआ दिखा सके।साथ ही बीजेपी ने यह भी आरोप लगाया कि ‘बंगाली अस्मिता’ की बात करने वाली ममता बनर्जी की पार्टी वास्तव में बाहरी यानी ‘अरबी पहचान’—काबा और मदीना—को बंगाल पर थोपने का प्रयास कर रही है। इस तरह चुनावी प्रचार में धार्मिक प्रतीकों और पहचान की राजनीति एक प्रमुख मुद्दा बन गई।

फिश पॉलिटिक्स पर सियासत

पश्चिम बंगाल की चुनावी जंग इस बार केवल रैलियों और नारों तक सीमित नहीं रही, बल्कि बंगाली पहचान के सबसे अहम हिस्से—'मछली और भात'—तक जा पहुंची है। 2026 के संग्राम में ममता बनर्जी और भाजपा के बीच 'फिश पॉलिटिक्स' (मछली की राजनीति) एक निर्णायक मोड़ बनकर उभरी है। इस सियासी विवाद की शुरुआत 29 मार्च को पुरुलिया में ममता बनर्जी की एक सभा से हुई। ममता ने सीधे तौर पर बंगालियों की जीवनशैली पर प्रहार करते हुए कहा था "अगर भाजपा सत्ता में आई, तो वे आपको मछली, मांस और अंडा नहीं खाने देंगे। बीजेपी एक 'शाकाहारी संस्कृति' वाली पार्टी है, जो माछे-भाते बंगाली की अस्मिता को खत्म करना चाहती है।" ममता का यह वार भाजपा की उस छवि पर था, जिसे अक्सर उत्तर भारतीय शाकाहारी हिंदुत्व से जोड़कर देखा जाता है।

'शाकाहारी' नहीं, 'शाक्त' हिंदुत्व

ममता के इस 'पहचान के कार्ड' को बेअसर करने के लिए भाजपा ने अपनी रणनीति में बड़ा बदलाव किया। खुद को उत्तर भारतीय सात्विकता से अलग दिखाते हुए, भाजपा ने बंगाल में 'शाक्त परंपरा' (शक्ति की पूजा) का दामन थामा। इस परंपरा में मछली और मांस को वर्जित नहीं, बल्कि कई जगहों पर 'महाप्रसाद' माना जाता है।अनुराग ठाकुर और मनोज तिवारी जैसे दिग्गज नेताओं ने सार्वजनिक रूप से मछली खाकर यह संदेश दिया कि वे बंगाली संस्कृति के विरोधी नहीं हैं। कई क्षेत्रों में भाजपा उम्मीदवारों ने अपने चुनाव प्रचार के दौरान हाथ में मछली लेकर जुलूस निकाला, जो बंगाल के इतिहास में एक दुर्लभ दृश्य था।

कैश, आरक्षण और सुरक्षा का सियासी दांव

पश्चिम बंगाल के चुनावी मैदान में इस बार महिला वोटर्स को साधने के लिए राजनीतिक दलों ने कई बड़े दांव चले हैं। तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) प्रमुख ममता बनर्जी ने महिलाओं के लिए पहले से चल रही ‘लक्ष्मीर भंडार’ योजना को और मजबूत किया। इस योजना के तहत महिलाओं को पहले 1000 रुपये मिलते थे, जिसे चुनाव से ठीक पहले फरवरी में बढ़ाकर 1500 रुपये कर दिया गया। इस फैसले से करीब 2.4 करोड़ महिलाओं को सीधा लाभ मिल रहा है।

वहीं, भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने इससे एक कदम आगे बढ़ते हुए सत्ता में आने पर महिलाओं को हर महीने 3000 रुपये देने का वादा किया है, जो मौजूदा योजना से दोगुना है। इसके अलावा बीजेपी ने सरकारी बसों में मुफ्त यात्रा और सरकारी नौकरियों में 33 प्रतिशत आरक्षण देने का भी वादा किया है।

महिला आरक्षण संशोधन बिल

चुनाव से पहले केंद्र सरकार ने संसद का विशेष सत्र बुलाकर महिला आरक्षण को जल्द लागू करने के लिए तीन विधेयक पेश किए। हालांकि, विपक्ष के विरोध के चलते ये बिल पास नहीं हो सके। बीजेपी ने अपने चुनाव प्रचार में इसे इस रूप में पेश किया कि वह महिलाओं को ‘सत्ता में 33% हिस्सेदारी’ देना चाहती है, जबकि कांग्रेस और टीएमसी समेत विपक्ष इसका विरोध कर रहा है।इस रणनीति ने ममता बनर्जी के उस आरोप को कुछ हद तक कमजोर किया, जिसमें बीजेपी को महिला विरोधी या पुरुष-प्रधान पार्टी बताया जाता रहा है।

‘आजादी बनाम पाबंदी’ का नैरेटिव

महिला सुरक्षा के मुद्दे को भी बीजेपी ने जोर-शोर से उठाया। 14 अप्रैल को पनिहाटी की रैली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि बीजेपी सरकार बनने पर बंगाल की महिलाओं को रात 2 बजे भी बाहर निकलने में डर नहीं लगेगा। यह बयान ममता बनर्जी के उस पुराने बयान पर सीधा हमला था, जिसमें उन्होंने महिलाओं को रात में बाहर न निकलने की सलाह दी थी।बीजेपी ने इसे ‘आजादी बनाम पाबंदी’ के रूप में पेश किया।

संदेशखाली और आरजी कर मेडिकल कॉलेज जैसी घटनाओं ने राज्य सरकार की महिला सुरक्षा की छवि को प्रभावित किया। बीजेपी ने इन मुद्दों पर सिर्फ विरोध प्रदर्शन ही नहीं किया, बल्कि आंदोलन से जुड़े चेहरों को चुनावी मैदान में उतारा। संदेशखाली आंदोलन की प्रमुख चेहरा रेखा पात्रा को हिंगलगंज सीट से और आरजी कर मामले में पीड़िता की मां रत्ना देबनाथ को पनिहाटी सीट से उम्मीदवार बनाया गया।

SIR का असर

पश्चिम बंगाल के चुनावी परिदृश्य में इस बार कई ऐसे फैक्टर सामने आए हैं, जो नतीजों को निर्णायक रूप से प्रभावित कर सकते हैं। इनमें सबसे बड़ा मुद्दा वोटर लिस्ट में हुए बदलाव का है। राज्य में कुल रजिस्टर्ड वोटर्स की संख्या पहले 7.66 करोड़ थी, लेकिन चुनाव से पहले हुए स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के बाद करीब 91 लाख नाम हटाए गए। इसके बाद कुल वोटर्स की संख्या घटकर 6.75 करोड़ रह गई, यानी लगभग 11.8% की कमी।

विशेषज्ञों का मानना है कि इस बदलाव से चुनावी समीकरण प्रभावित हो सकते हैं। 2021 के विधानसभा चुनाव में 140 से ज्यादा सीटों पर जीत का अंतर 1000 से 5000 वोटों के बीच था, जबकि इस बार कई सीटों पर इससे ज्यादा वोट लिस्ट से हट चुके हैं। खासतौर पर मुर्शिदाबाद, मालदा और उत्तर 24 परगना जैसे मुस्लिम बहुल जिलों में सबसे अधिक नाम हटाए गए हैं, जिन्हें तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) का मजबूत गढ़ माना जाता है।

भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने इस मुद्दे को जोर-शोर से उठाते हुए हटाए गए नामों को ‘अवैध घुसपैठियों’ और ‘ब्लैक वोट्स’ से जोड़ा है। पार्टी का तर्क है कि यह केवल प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि सीमा पार से आए लोगों को हटाने का एक तरह का ‘शुद्धिकरण अभियान’ है, जिन्हें टीएमसी ने अपने वोट बैंक के रूप में संरक्षण दिया।बीजेपी ने सीमावर्ती जिलों के आंकड़ों के आधार पर यह भी दावा किया है कि वहां हिंदुओं की संख्या घट रही है, क्योंकि राज्य सरकार अवैध प्रवासियों को जमीन और पहचान दे रही है। यह मुद्दा चुनावी बहस का अहम हिस्सा बन गया है।

अमित शाह का ‘3 AM’ रणनीति

बीजेपी ने इस बार बेहद सुनियोजित और बदली हुई रणनीति अपनाई, जिसकी कमान गृह मंत्री अमित शाह ने संभाली। शाह ने करीब 15 दिन तक बंगाल में कैंप कर लगातार रैलियां, रोड शो और मैराथन बैठकें कीं। चुनाव से ठीक पहले कोलकाता में उन्होंने रात 3 बजे तक बैठकों में हिस्सा लेकर 80,000 से ज्यादा पोलिंग स्टेशनों का डेटा एनालिसिस किया। बूथों को मजबूत, मध्यम और कमजोर श्रेणियों में बांटा गया, जिसमें खास फोकस उन मध्यम बूथों पर रहा, जहां पिछली बार जीत-हार का अंतर बेहद कम था।

बीजेपी ने उत्तर प्रदेश में सफल ‘पन्ना प्रमुख’ मॉडल को भी बंगाल में लागू किया। इसके तहत हर कार्यकर्ता को 30-60 वोटर्स की जिम्मेदारी दी गई, ताकि मतदान के दिन उन्हें बूथ तक लाया जा सके। इसे ‘मैन-टू-मैन मार्किंग’ नाम दिया गया। 2021 में लगे बाहरी पार्टी के आरोप से सबक लेते हुए बीजेपी ने इस बार स्थानीय नेताओं पर भरोसा जताया और ‘कोर ग्रुप’ में बंगाल के चेहरों को आगे रखा। साथ ही यह संदेश दिया गया कि मुख्यमंत्री बंगाल का ही होगा।

हमारे इंग्लिश सहयोगी वेबसाइट द फेडरल के समीर के पुरकायस्थ कहते हैं ''पश्चिम बंगाल का चुनाव दिलचस्प है। हालांकि एग्जिट पोल के आंकड़ों से इत्तेफाक नहीं रखते। वो 2021 का हवाल देते हुए कहा कि उस समय सभी आंकड़े बीजेपी के पक्ष में थे। लेकिन नतीजों ने अनुमानों को गलत कर दिया।''

समीर कहते हैं ''बंगाल के चुनाव में महिला, मुस्लिम और मतुआ समाज का मुद्दा अहम है। अगर आप महिला सुरक्षा और उनको दिए जाने वाले सुविधाओं का जिक्र करें तो दो तरह की बात सामने आई है। पहला तो यह कि बीजेपी ने भले ही 3000 हजार रुपए प्रति महीने देने का वादा किया हो उसको टीएमसी से चुनावी जुमला बताया है। टीएमसी ने महिलाओं को याद दिलाया कि क्या 15 लाख रुपए आपके खाते में आए। दिल्ली की बीजेपी सरकार से जो वादा किया था, क्या वो पूरा हुआ। बंगाल में कम से कम हम हर महीने 1500 रुपए दे रहे थे जिसे बढ़ाकर 1700 कर दिया है।'' यदि आप महिला सुरक्षा की बात करें तो एनसीआरबी के डेटा के मुताबिक बंगाल में महिलाओं के खिलाफ अपराध कम हैं। लेकिन आरजी कर अस्पताल कांड के बाद शहरी इलाकों में महिलाओं का मिजाज बदला है, अब यह कितना बीजेपी के पक्ष में गया है देखने वाली बात होगी।

वोटर लिस्ट सत्यापन पर समीर के पुरकायस्थ कहते हैं ''अगर गणित के हिसाब से देखें तो 91 लाख वोटर्स का नाम यह बीजेपी के लिए फायदेमंद हो सकता है। लेकिन इसका दूसरा पक्ष यह है कि चुनाव में मुस्लिम मतदाताओं ने एसआईआर के डर से बड़ी तादाद में वोट देने के लिए बाहर आए। इसके साथ ही मतुआ समाज की बात करें तो इससे जुड़े मतदाता आमतौर पर बीजेपी के समर्थक रहे हैं। इस दफा एसआईआर की वजह से इनके नाम भी कटे हैं। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि मतुआ मतदाताओं के मत कहीं शिफ्ट तो नहीं हुए हैं।''

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