
जब स्विस कंपनी ने उड़ाया मजाक, जेआरडी टाटा ने रच दिया इतिहास
स्विस घड़ी निर्माता की चुनौती के बाद JRD टाटा और ज़ेरक्सेस देसाई ने टाइटन की नींव रखी। संघर्ष, नवाचार और दृढ़ संकल्प ने भारतीय घड़ी उद्योग को नई पहचान दी।
जब टाटा समूह के भरोसेमंद सहयोगी ज़ेरक्सेस देसाई ने भारत में विश्वस्तरीय क्वार्ट्ज घड़ी बनाने का विचार जेआरडी टाटा के सामने रखा, तो इस प्रस्ताव ने महान उद्योगपति की रुचि जगा दी। लेकिन जब इस परियोजना के लिए साझेदारी की संभावना तलाशने के उद्देश्य से एक प्रसिद्ध स्विस घड़ी निर्माता से संपर्क किया गया, तो उसे भारतीयों की क्षमता पर बिल्कुल भरोसा नहीं था।
स्विस निर्माता ने तंज कसते हुए कहा कि भारतीय कभी अच्छी घड़ियां नहीं बना सकते, क्योंकि उनके पास न तो आवश्यक कौशल है और न ही प्रतिभा। यह टिप्पणी जेआरडी टाटा को गहराई तक चुभ गई। भारत लौटते ही उन्होंने ज़ेरक्सेस देसाई को एक चुनौती दी। उन्होंने अपनी कलाई से घड़ी उतारकर मेज पर रखी और कहा, “तुम्हारे पास पांच साल हैं, एक भारतीय घड़ी बनाने के लिए। जब तक हम अपनी घड़ी नहीं बना लेते, मैं घड़ी नहीं पहनूंगा।”
यही प्रेरक कहानी अब छह एपिसोड की वेब सीरीज ‘Made in India: A Titan Story’ में दिखाई गई है, जो इन दिनों Amazon Prime Video पर स्ट्रीम हो रही है।
निर्देशक रॉबी ग्रेवाल को नहीं थी टाइटन की कहानी की जानकारी
फिल्म निर्माता रॉबी ग्रेवाल, जिन्होंने इससे पहले समय और ज्वेल थीफ: द हीस्ट बिगिन्स जैसी परियोजनाओं पर काम किया है, बताते हैं कि जब उन्हें पत्रकार विनय कामथ की किताब पर आधारित टाइटन की कहानी को पर्दे पर उतारने का प्रस्ताव मिला, तब उन्हें इस प्रतिष्ठित ब्रांड की पृष्ठभूमि के बारे में लगभग कोई जानकारी नहीं थी।
ग्रेवाल कहते हैं, “मैंने भी बाकी लोगों की तरह टाइटन की घड़ी पहनी थी, लेकिन यह नहीं जानता था कि इसे बनाने के पीछे कितनी बड़ी संघर्षगाथा छिपी है। जब मुझे इस कहानी पर काम करने का मौका मिला, तो मैंने इसे एक प्रेरक भारतीय कहानी के रूप में देखा।”
जेआरडी टाटा को ‘महानायक’ नहीं, इंसान की तरह दिखाया
निर्देशक का कहना है कि उन्होंने जेआरडी टाटा को किसी सुपरहीरो की तरह पेश करने के बजाय एक ऐसे इंसान के रूप में दिखाया, जिससे आम लोग जुड़ाव महसूस कर सकें। एक महत्वपूर्ण दृश्य में जेआरडी अपनी घड़ी उतारकर यह शपथ लेते हैं कि भारतीय घड़ी बनने तक वे घड़ी नहीं पहनेंगे।
ग्रेवाल बताते हैं कि इस दृश्य को और अधिक नाटकीय बनाया जा सकता था, लेकिन उन्होंने जेआरडी टाटा के व्यक्तित्व की गरिमा बनाए रखने को प्राथमिकता दी। सीरीज में टाइटन की शुरुआती असफलताओं को भी ईमानदारी से दिखाया गया है। एक एपिसोड में नई बनी टाइटन घड़ी के काम न करने की घटना भी दिखाई गई है, जिससे स्पष्ट होता है कि सफलता का यह सफर आसान नहीं था।
1980 के दशक को पर्दे पर जीवंत करना था बड़ी चुनौती
यह सीरीज 1980 के दशक की पृष्ठभूमि पर आधारित है। उस दौर के माहौल, घरों, सड़कों, कारों और कार्यालयों को दोबारा तैयार करना निर्माताओं के लिए बड़ी चुनौती थी। सीमित बजट के बावजूद टीम ने उस दौर को जीवंत बनाने के लिए व्यापक रिसर्च और तैयारी की।
रॉबी ग्रेवाल ने बताया कि दर्शकों को 80 के दशक में ले जाने के लिए पुरानी मुंबई की झलकियां और लोकप्रिय हिंदी फिल्मी गीतों का इस्तेमाल किया गया। हालांकि उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि सीरीज में दिखाई गई कुछ तथाकथित ‘आर्काइव फुटेज’ वास्तव में उनकी टीम द्वारा विशेष रूप से तैयार की गई थीं।
नसीरुद्दीन शाह ने निभाया जेआरडी टाटा का किरदार
सीरीज में अनुभवी अभिनेता नसीरुद्दीन शाह ने जेआरडी टाटा की भूमिका निभाई है। ग्रेवाल के अनुसार, नसीरुद्दीन शाह ने अपने अभिनय से किरदार में जान डाल दी। वे सेट पर पूरी तैयारी के साथ आते थे और अपने चरित्र की गहरी समझ रखते थे।
वहीं, ज़ेरक्सेस देसाई की भूमिका निभाने वाले जिम सर्भ ने होसुर स्थित टाइटन फैक्ट्री के कर्मचारियों से बातचीत कर उनके व्यक्तित्व को समझने की कोशिश की। इंटरनेट पर सीमित जानकारी उपलब्ध होने के कारण उन्होंने वास्तविक अनुभवों के आधार पर अपने किरदार को आकार दिया।
‘असफल होने की आजादी’ थी टाटा की सबसे बड़ी ताकत
सीरीज का एक प्रमुख संदेश टाटा समूह की उस कार्य संस्कृति को भी दर्शाता है, जिसमें असफलता को सीखने की प्रक्रिया का हिस्सा माना जाता है। ज़ेरक्सेस देसाई को टाइटन बनाने के दौरान कई बार असफलताओं का सामना करना पड़ा और एक समय कंपनी को भारी नुकसान भी उठाना पड़ा।
ग्रेवाल के मुताबिक, टाटा समूह का दर्शन यह था कि यदि किसी ने ईमानदारी से प्रयास किया है, तो असफलता को भी सम्मान मिलना चाहिए। यही सोच अंततः टाइटन जैसी सफलता की नींव बनी।
भारतीय सपनों की जीत की कहानी
निर्देशक का मानना है कि टाइटन की कहानी बड़े पर्दे के बजाय ओटीटी प्लेटफॉर्म के लिए अधिक उपयुक्त थी, क्योंकि यहां पात्रों और घटनाओं को विस्तार से दिखाने का अवसर मिला।‘Made in India: A Titan Story’ सिर्फ एक घड़ी ब्रांड की कहानी नहीं है, बल्कि यह भारतीय प्रतिभा, आत्मविश्वास और दृढ़ संकल्प की कहानी है। यह उस सोच को चुनौती देती है, जिसमें कभी कहा गया था कि भारतीय विश्वस्तरीय घड़ियां नहीं बना सकते। आज टाइटन की सफलता इस बात का प्रमाण है कि दृढ़ इच्छाशक्ति और नवाचार के बल पर किसी भी चुनौती को अवसर में बदला जा सकता है।

