लेकिन, क्या यह योजना वाकई उतनी ही सुनहरी है जितनी कागजों पर दिखती है?
इन सभी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए द फ़ेडरल देश ने CSE के रिसर्चर पार्थ कुमार से विस्तार से बात की और समझा कि आखिर ये कितना फायदे का सौदा है और इसमें क्या नुकसान हो सकता है?
क्या है कोल गैसीफिकेशन और चेतावनी?
सरल भाषा में समझें तो कोल गैसीफिकेशन वह प्रक्रिया है जिसमें कोयले को सीधे जलाया नहीं जाता, बल्कि उसे एक विशेष तापमान और दबाव पर गर्म करके गैस में बदला जाता है। इस प्रक्रिया से जो गैस निकलती है, उसे 'सिनगैस' कहा जाता है।
विशेषज्ञ पार्थ बताते हैं, "कोल गैसीफिकेशन तकनीक दुनिया भर में इस्तेमाल हो रही है और भारत में भी कुछ कंपनियां इस पर काम कर रही हैं। यह स्थानीय वायु प्रदूषण को कम करने में मदद करती है क्योंकि इसमें कोयला खुले में नहीं जलता। लेकिन, यहाँ एक बहुत बड़ा 'कैच' है।" पार्थ के अनुसार, इस पूरी प्रक्रिया में कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) का उत्सर्जन सामान्य कोयला दहन के मुकाबले बहुत ज्यादा होता है। यहीं से असली विवाद शुरू होता है।
प्रधानमंत्री के 'नेट-जीरो' लक्ष्य का क्या होगा?
भारत ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कसम खाई है कि वह 2070 तक 'नेट-जीरो' उत्सर्जन वाला देश बनेगा। सरकार का तर्क है कि सिनगैस सस्ती पड़ेगी और आत्मनिर्भरता लाएगी। लेकिन यहाँ ये सवाल बेहद वाजिब है "अगर यह प्रोसेस कार्बन डाइऑक्साइड ज्यादा रिलीज करता है, तो क्या हमारी 'जीरो कार्बन पॉलिसी' इससे प्रभावित नहीं होगी?"
पार्थ स्पष्ट करते हैं कि इस तकनीक की सफलता पूरी तरह से सीसीयूएस (Carbon Capture, Utilization and Storage) पर टिकी है। यानी, जो कार्बन निकलेगा, उसे कैद करना होगा। लेकिन हकीकत यह है कि फिलहाल भारत में व्यावसायिक स्तर पर कोई बड़ा CCUS प्रोजेक्ट सफल नहीं है। बिना इस सुरक्षा कवच के, 37,500 करोड़ रुपये का यह प्रोजेक्ट भारत को एक ऐसे 'कार्बन जाल' में फंसा सकता है, जिससे निकलना नामुमकिन होगा।
क्या सिनगैस वाकई रसोई गैस (LPG) का विकल्प है?
सरकार का दावा है कि सिनगैस LPG को रिप्लेस करेगी। लेकिन यहाँ एक बड़ा तकनीकी और सुरक्षा संबंधी सवाल उठता है कि सिनगैस में कार्बन मोनोऑक्साइड की मात्रा काफी अधिक होती है, जो कि एक अत्यंत जहरीली गैस है।
पार्थ कहते हैं, "इंडस्ट्रियल यूज में जब भी सिनगैस इस्तेमाल होती है, तो पूरी सुरक्षा के साथ की जाती है। लेकिन क्या इसे घरों में बिना डर के इस्तेमाल किया जा सकता है? हाउसहोल्ड यूज पर फिलहाल कोई स्पष्ट डेटा या सुरक्षा गारंटी नहीं है।" वर्तमान में, ओडिशा में JSPL जैसी कंपनियां इसका इस्तेमाल स्टील बनाने में कर रही हैं, लेकिन इसे आम आदमी की रसोई तक पहुंचाना फिलहाल एक दूर का सपना और एक बड़ा खतरा नजर आता है।
संसाधनों का भटकाव या रणनीतिक निवेश?
एक तरफ भारत सोलर एनर्जी, विंड एनर्जी और ग्रीन हाइड्रोजन में दुनिया का नेतृत्व करने की बात कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ 37,500 करोड़ रुपये फिर से कोयले से जुड़ी तकनीक में झोंक दिए गए हैं। पार्थ इस पर गंभीर चिंता जताते हुए कहते हैं कि हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि यह निवेश 'ग्रीन हाइड्रोजन' और 'रिन्यूएबल एनर्जी' जैसे क्लीन विकल्पों से हमारा ध्यान न भटका दे। क्या हम एक डूबती हुई तकनीक (जीवाश्म ईंधन) को बचाने की कोशिश कर रहे हैं, जबकि दुनिया भविष्य की ऊर्जा की ओर बढ़ रही है?
आर्थिक व्यवहार्यता और 'कार्बन लॉक-इन'
37,500 करोड़ रुपये कोई छोटी राशि नहीं है। विशेषज्ञ पार्थ का कहना है कि क्या कैप्चर की गई CO2 का व्यावसायिक उपयोग (जैसे यूरिया या कंक्रीट क्योरिंग में) इतना बड़ा होगा कि वह इस पूरे प्रोजेक्ट की लागत को जायज ठहरा सके? पार्थ के अनुसार, "कार्बन कैप्चर का कमर्शियल रूप से सफल होना ही इस पूरे मॉडल की जान है, वरना कोई इसमें निवेश नहीं करेगा।"
समाधान की तलाश या नई आपदा का आमंत्रण? विशेषज्ञ पार्थ का कहना है कि आत्मनिर्भर होना बेहद आवश्यक है लेकिन कोल गैसीफिकेशन प्रक्रिया का सफल होना तभी संभव है जब हमारे पास कार्बन कैप्चर (CCUS) का एक पुख्ता इंतजाम हो, जो कोई सस्ता मॉडल नहीं है। इसलिए सिर्फ कोल गैसीफिकेशन से काम नहीं चलेगा, CCUS को भी समांतर विकसित करना होगा, बिना इसके कोल गैसीफिकेशन पर इतना बड़ा दांव लगाना जुआ खेलने जैसा है।