
क्या भारतीय एयरलाइन कंपनियां उड़ानें बंद कर देंगी? तीन कंपनियों ने सरकार को भेजा मांग पत्र
एफआईए ने ईंधन की कीमतों, टैक्स और ड्यूटी में राहत के लिए सरकार से हस्तक्षेप की मांग की है, क्योंकि एविएशन टरबाइन फ्यूल की बढ़ती लागत एयरलाइंस के संचालन और मुनाफे को खतरे में डाल रही है।
पश्चिम एशिया संघर्ष के चलते दुनिया भर में ईंधन की आपूर्ति और कीमतों पर असर पड़ रहा है। इसी बीच, एयर इंडिया, इंडिगो और स्पाइसजेट जैसी प्रमुख भारतीय एयरलाइंस का प्रतिनिधित्व करने वाले फेडरेशन ऑफ इंडियन एयरलाइंस (FIA) ने केंद्र सरकार को पत्र लिखकर एविएशन टरबाइन फ्यूल (ATF) पर एक्साइज ड्यूटी में संशोधन की मांग की है।
एफआईए ने अपने पत्र में कहा है कि देश का एयरलाइन उद्योग इस समय भारी दबाव में है और “संचालन बंद होने” की कगार पर पहुंच गया है। ATF किसी भी एयरलाइन के संचालन खर्च का लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा होता है।
नागरिक उड्डयन मंत्रालय को लिखे पत्र में FIA ने यह भी कहा कि सरकार को घरेलू और अंतरराष्ट्रीय उड़ानों के लिए ईंधन की कीमत तय करने की समान व्यवस्था लागू करनी चाहिए, जैसा पहले “क्रैक बैंड” व्यवस्था के जरिए किया गया था।
कीमतों में असमानता
जेट फ्यूल की कीमतों में अभूतपूर्व बढ़ोतरी और कच्चे तेल व ATF के बीच भारी अंतर (क्रैक/डिफरेंशियल) के चलते एयरलाइंस का संचालन पूरी तरह प्रभावित हो रहा है।
एफआईए ने कहा, “घरेलू और अंतरराष्ट्रीय कीमतों में किसी भी तरह की असंगत या मनमानी बढ़ोतरी एयरलाइंस के लिए असहनीय नुकसान का कारण बनेगी और इससे विमानों को ग्राउंड करना पड़ेगा, जिसके चलते उड़ानों की रद्दीकरण की नौबत आ सकती है।”
26 अप्रैल को लिखे पत्र में कहा गया, “मौजूदा स्थिति से उबरने, संचालन जारी रखने और टिके रहने के लिए हम तत्काल और सार्थक वित्तीय सहायता के लिए आपके हस्तक्षेप का अनुरोध करते हैं।”
टैक्स और ड्यूटी में राहत की मांग
एयरलाइंस ने ATF पर लगने वाली 11 प्रतिशत एक्साइज ड्यूटी को अस्थायी रूप से टालने की भी मांग की है।
उन्होंने कहा, “संकट से पहले की तुलना में ATF की कीमतों में असामान्य वृद्धि हुई है। इसके साथ रुपये के अवमूल्यन ने कीमतों को और बढ़ा दिया है। ऐसे में 11 प्रतिशत एक्साइज ड्यूटी का बोझ कई गुना बढ़ गया है, जो एयरलाइंस पर भारी असर डाल रहा है।”
पिछले महीने सरकार ने घरेलू उड़ानों के लिए ATF की कीमत में बढ़ोतरी को 15 रुपये प्रति लीटर तक सीमित रखा था, लेकिन अंतरराष्ट्रीय उड़ानों के लिए यह कीमत 73 रुपये प्रति लीटर तक बढ़ गई।
अंतरराष्ट्रीय उड़ानों पर असर
एयरलाइंस का कहना है कि मौजूदा स्थिति ने घरेलू के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय उड़ानों को भी लगभग अव्यवहारिक बना दिया है और अप्रैल महीने में एविएशन सेक्टर को भारी नुकसान उठाना पड़ा है।
एफआईए ने ATF की मौजूदा अस्थायी (एड-हॉक) कीमत निर्धारण व्यवस्था पर तुरंत हस्तक्षेप की मांग करते हुए कहा कि इससे घरेलू और अंतरराष्ट्रीय संचालन के बीच गंभीर असंतुलन पैदा हो रहा है, जिससे एयरलाइंस का नेटवर्क अव्यवहारिक और अस्थिर बनता जा रहा है।
फेडरेशन ने कहा, “भारत का एयरलाइन उद्योग इस समय अत्यधिक दबाव में है और संचालन बंद होने की कगार पर है।”
एफआईए ने अक्टूबर 2022 में लागू “क्रैक बैंड” व्यवस्था (USD 12–22 प्रति बैरल) के तहत पारदर्शी मूल्य निर्धारण ढांचे की मांग की है, जिसमें ऑयल मार्केटिंग कंपनियों (OMCs) के लिए उचित और संतुलित मार्जिन सुनिश्चित हो।
टैक्स का बोझ—मुख्य शहरों में अलग-अलग दरें
एफआईए के अनुसार, देश का सबसे बड़ा एविएशन हब दिल्ली जेट फ्यूल पर 25% वैट के साथ दूसरे स्थान पर है, जबकि सबसे ज्यादा 29% वैट तमिलनाडु में लगाया जाता है।
मुंबई, बेंगलुरु, हैदराबाद और कोलकाता जैसे अन्य प्रमुख शहरों में यह दर 16% से 20% के बीच है। ये छह शहर भारत में एयरलाइंस के 50% से अधिक संचालन को कवर करते हैं।
वैश्विक अस्थिरता से योजना प्रभावित
पश्चिम एशिया संघर्ष का असर सिर्फ लागत बढ़ने तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे वैश्विक तेल बाजार में अस्थिरता और उड़ानों की योजना (रूट प्लानिंग) भी प्रभावित हो रही है।
कच्चे तेल की कीमतों में भू-राजनीतिक अनिश्चितता के चलते उतार-चढ़ाव हो रहा है, जिससे ATF महंगा और अनिश्चित हो गया है। इससे एयर इंडिया, इंडिगो और स्पाइसजेट जैसी कंपनियों के लिए किराया तय करना और राजस्व प्रबंधन करना मुश्किल हो गया है।
विश्लेषकों के मुताबिक, भारत की एयरलाइंस पर इसका असर ज्यादा पड़ता है क्योंकि ATF पर राज्यों के टैक्स अधिक हैं और हेजिंग (कीमतों से बचाव) के विकल्प सीमित हैं। इससे वे अंतरराष्ट्रीय एयरलाइंस की तुलना में वैश्विक ईंधन कीमतों के उतार-चढ़ाव के प्रति अधिक संवेदनशील हो जाती हैं।
एयरस्पेस प्रतिबंध से संचालन प्रभावित
संघर्ष का एक संरचनात्मक असर भी देखने को मिल रहा है। पश्चिम एशिया के कुछ हिस्सों में एयरस्पेस बंद होने या प्रतिबंध लगने से एयरलाइंस को अपनी उड़ानों के रूट बदलने पड़ रहे हैं, खासकर भारत से यूरोप और उत्तरी अमेरिका जाने वाली उड़ानों में।
इससे उड़ानों की अवधि बढ़ रही है, क्रू की लागत और ईंधन खपत बढ़ रही है, और विमान उपयोग (एयरक्राफ्ट यूटिलाइजेशन) पर दबाव पड़ रहा है—वह भी ऐसे समय में जब बेड़े (फ्लीट) पहले से ही व्यस्त हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे व्यवधान समय के साथ एयरलाइंस के पूरे नेटवर्क पर असर डाल सकते हैं, जिससे शेड्यूल, कनेक्टिविटी और मुनाफे पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है, भले ही यह संघर्ष भौगोलिक रूप से भारत से दूर क्यों न हो।

