एक साल नो गोल्ड: पीएम मोदी के अपील पर क्या बोले ज्वेलर्स?
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'एक साल नो गोल्ड': पीएम मोदी के अपील पर क्या बोले ज्वेलर्स?

गिरते फॉरेक्स रिज़र्व पर पीएम मोदी की अपील ने बढ़ाई ज्वेलर्स की टेंशन। करोड़ों कारीगरों के रोज़गार और शादियों के बजट पर उठे सवाल, क्या जनता का त्याग बचाएगा रुपया?


PM Modi's Appeal On Gold : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की "एक साल तक सोना न खरीदने" की अपील ने देश के आर्थिक और सामाजिक गलियारों में एक नई बहस को जन्म दे दिया है। यह अपील सिर्फ एक सुझाव नहीं, बल्कि उस गहरी आर्थिक चिंता का संकेत है जिसे सरकार अब सीधे जनता के सामने रख रही है। लेकिन इस 'आर्थिक देशभक्ति' की पुकार के बीच कई कड़वे सवाल भी खड़े हो रहे हैं, जो सीधे आम आदमी की जेब, करोड़ों कारीगरों की रोटी और सरकार की अपनी कार्यशैली से जुड़े हैं।

प्रधानमंत्री की इस अपील के बाद जहाँ इस पर राजनीती शुरू हो गयी है तो वहीँ सोने के व्यापार से जुड़े तमाम लोगों के बीच असमंजस की स्थिति भी बन गयी है कि ये अपील उनके रोज़गार पर कितना फर्क डालेगी। एक साल की अवधि कम नहीं होती, अगर लोगों ने सच में सोने की खरीदारी नहीं की तो न केवल ज्वेलर्स बल्कि उन पर आश्रित तमाम कामगारों के घरों के चूल्हे जलने बंद हो जायेंगे।
द फ़ेडरल देश ने कुछ ज्वेलर्स से इस विषय पर बात करते हुए उनके मन की बात को जानने का प्रयास किया है।


क्या मध्यम वर्ग का त्याग ही अर्थव्यवस्था की आखिरी उम्मीद है?
सरल भाषा में समझें तो भारत अपना अधिकांश सोना विदेशों से आयात करता है। जब एक आम भारतीय सोने की खरीदारी करता है, तो सरकार को अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में उसका भुगतान डॉलर में करना पड़ता है। प्रधानमंत्री चाहते हैं कि यह डॉलर देश से बाहर न जाए ताकि रुपया मज़बूत रहे।

लेकिन दिल्ली के सबसे पुराने श्रीराम हरीराम ज्वेलर्स के संचालक महेश गुप्ता एक बुनियादी सवाल उठाते हैं। वे कहते हैं, "देश हित में यह काम करना चाहिए, जैसे पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री जी के कार्यकाल के दौरान हुए युद्ध के दौरान की गयी अपील के बाद लोगों ने एक समय का खाना छोड़ दिया था। लेकिन सवाल यह है कि क्या सिर्फ अपील काफी है? महेश गुप्ता ये भी बताते हैं कि पूर्व प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई के समय 'गोल्ड कंट्रोल' जैसा कानून था। अगर सरकार वास्तव में गंभीर है, तो उसे 'रॉ गोल्ड' (बिस्कुट और ईंटें) की खरीद पर पूरी तरह बैन लगा देना चाहिए, क्योंकि असली डैमेज निवेश के लिए दबाकर रखे गए सोने से होता है, गहनों से नहीं।"
गहने हमारे देश में एक संस्कृति है, स्त्री का मान है। बेटी के शादी ब्याह में हर कोई अपनी हैसियत के अनुसार गहने खरीदता है।

करोड़ों कारीगरों की रोटी का सवाल
ज्वेलरी उद्योग से जुड़े विशेषज्ञों का डर व्यापार गिरने से कहीं ज़्यादा उन लाखों हाथों को लेकर है जो सोना गढ़ते हैं। डायमंड एसोसिएशन के अध्यक्ष वरुण राज सिंह इस मुद्दे पर सरकार को आड़े हाथों लेते हैं। उनका कहना है, "मैक्सिमम मैन्युफैक्चरिंग बंगाल के कारीगरों द्वारा की जाती है। अगर लोग सोना खरीदना बंद कर देंगे, तो इन कारीगरों के परिवारों का पेट कैसे भरेगा? एक छोटी सी दुकान में भी 4-5 लोग होते हैं। प्रधानमंत्री की इस स्टेटमेंट से इंटरनल इकोनॉमिक डैमेज का पता चलता है। ऐसा लगता है जैसे अंदर से कुछ खोखला हो गया है, जिसे भरने के लिए अब तेल और सोने को टारगेट किया जा रहा है।"

दोहरा मापदंड: त्याग की शुरुआत 'ऊपर' से क्यों नहीं?
बाज़ार के जानकारों और मध्यम वर्ग के लोगों का एक बहुत ही तीखा सवाल है कि त्याग की मिसाल सत्ता के गलियारों से क्यों शुरू नहीं होती? वरुण राज सिंह ये सवाल भी करते हैं कि "प्रधानमंत्री कहते हैं तेल कम इस्तेमाल करो, लेकिन उनके और उनकी पार्टी के मुख्यमंत्रियों के 50-50 गाड़ियों के काफिलों में कितना तेल जलता है? क्या नेता अपनी विदेश यात्राएं कम करेंगे? प्रधानमंत्री ने अपील की और तुरंत गुजरात में बड़ी रैली निकाल दी। अगर आप खुद उदाहरण पेश नहीं करेंगे, तो मध्यम वर्ग आपकी बात क्यों सुनेगा?"

बाज़ार की हकीकत और गिरता फॉरेक्स रिज़र्व
'आल बुलियन एंड ज्वेलर्स एसोसिएशन' के अध्यक्ष योगेश सिंघल इस संकट की जड़ की ओर इशारा करते हैं। वे कहते हैं, "मुख्य वजह फॉरेक्स रिज़र्व का गिरना है। जब एक्सपोर्ट कम और इम्पोर्ट बढ़ जाता है, तो ऐसी नौबत आती है। आरबीआई ने खुद 2024 में 75 टन सोना खरीदा ताकि डॉलर पर निर्भरता कम हो। लेकिन अब जब आम नागरिक की बारी आई है, तो उसे रोका जा रहा है।"

सिंघल एक आंकड़ा रखते हुए कहते हैं कि " देश में हर साल लगभग 800-900 टन सोना इम्पोर्ट होता है और एक्सपोर्ट सिर्फ 300 टन। मिडिल ईस्ट युद्ध की वजह से एक्सपोर्ट और रुक गया है। अप्रैल में तो इम्पोर्ट गिरकर 20 टन पर आ गया है। बाज़ार में पहले ही मंदी है, और अब इस अपील के बाद लोग अपने पुराने ऑर्डर भी कैंसिल कर रहे हैं।"

शादी-ब्याह और परंपरा का टकराव
भारत में शादियाँ बिना सोने के अधूरी मानी जाती हैं। महेश गुप्ता का कहना है कि जिसको शादी में जेवर देना है, वो तो लेगा ही, शादियाँ नहीं रुकेंगी। लेकिन योगेश सिंघल एक व्यावहारिक दिक्कत बताते हैं, "50,000 वाला सोना आज 1.50 लाख के पार है। लोगों की इनकम नहीं बढ़ी, पर सोने की कीमत तीन गुना हो गई। आज 2 ग्राम की एक अंगूठी भी 35 हज़ार की पड़ती है। लोग पहले ही गहनों को हल्का करवा रहे हैं, अब इस अपील के बाद बाज़ार में बेरोजगारी का एक नया संकट खड़ा हो जाएगा।"

ज्वेलर्स का कहना है कि सिर्फ अपील कर देना किसी समस्या का स्थाई समाधान नहीं है। सरकार को 'मेक इन इंडिया' पर ध्यान देना चाहिए। चाइना मैन्युफैक्चरिंग हब बन गया, हम क्यों नहीं? योगेश सिंघल का कहना है कि सरकार को इनकम टैक्स खत्म करने पर विचार करना चाहिए ताकि व्यापार बढ़े और डॉलर देश के अंदर आए।

इसके अलावा एक और बात जो तमाम ज्वेलर्स ने गंभीरतापूर्वक कही वो ये कि MCX बाज़ार पर टोक लगनी चाहिए, क्योंकि ये सीधे सीधे सट्टेबाजी है, जिसमें कुछ लोग इन्वेस्ट करते हुए बड़ी मात्रा में सोना होल्ड कर लेते हैं और इसी वजह से सोने की कीमतें बढ़ती हैं और होर्डिंग होती है।





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