
क्या भारत में चलेंगे प्लास्टिक के नोट? RBI फिर करने जा रहा बड़ा ट्रायल
करेंसी छपाई के बढ़ते खर्च और फटे-पुराने नोटों से निपटने के लिए रिजर्व बैंक जल्द शुरू कर सकता है पॉलीमर नोटों का पायलट प्रोजेक्ट। शुरुआती दौर में ₹10 और ₹20 के नोट शामिल।
Polymer Currency Notes: देश में डिजिटल पेमेंट्स (UPI) का चलन तेजी से बढ़ने के बावजूद भौतिक कैश (Physical Cash) का इस्तेमाल रिकॉर्ड स्तर पर बना हुआ है. इसी पृष्ठभूमि में भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) एक बार फिर देश में 'पॉलीमर' (प्लास्टिक) के बैंक नोट पेश करने की संभावनाओं पर गंभीरता से विचार कर रहा है. बिजनेस स्टैंडर्ड की एक रिपोर्ट के मुताबिक, पटना और मुंबई में हुई आरबीआई की पिछली दो बोर्ड बैठकों में इस प्रस्ताव पर विस्तार से चर्चा हुई है. दरअसल, नोटों की छपाई पर होने वाला भारी खर्च और बाजार में नोटों का जल्दी खराब होना केंद्रीय बैंक के लिए बड़ी चुनौती बना हुआ है. आंकड़ों के मुताबिक, 15 मई तक बाजार में चलन में मौजूद कुल नकदी ₹42.86 ट्रिलियन के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई, जो पिछले साल के मुकाबले 11.5% अधिक है.
शुरुआती पायलट प्रोजेक्ट में शामिल हो सकते हैं ₹10 और ₹20 के नोट
आरबीआई इस योजना को सीधे पूरे देश में लागू करने के बजाय आगामी कुछ महीनों में एक सीमित पायलट प्रोजेक्ट (Trial) के रूप में शुरू कर सकता है. इस शुरुआती ट्रायल में कम मूल्यवर्ग वाले नोटों, विशेषकर ₹10 और ₹20 के नोटों को शामिल किए जाने की उम्मीद है. इसके पीछे मुख्य वजह यह है कि ये छोटे नोट आम जनता के बीच सबसे ज्यादा हाथों-हाथ घूमते हैं और बड़े नोटों (जैसे ₹100 या ₹500) की तुलना में बहुत जल्दी फटते या मैले होते हैं. आरबीआई इस ट्रायल के जरिए नोटों के लाइफस्पैन, जनता की प्रतिक्रिया और एटीएम (ATM) मशीनों की तकनीकी व्यवहार्यता का आकलन करेगा.
क्या होते हैं पॉलीमर नोट और कागज के मुकाबले क्यों हैं बेहतर?
आमतौर पर "प्लास्टिक नोट" कहे जाने वाले पॉलीमर नोट क्रेडिट या डेबिट कार्ड की तरह कड़े (Rigid) नहीं होते, बल्कि ये कपास (कॉटन) आधारित कागज के बजाय एक पतली और लचीली प्लास्टिक शीट पर छापे जाते हैं। ये सामान्य नोटों की तरह ही हल्के और मोड़ने में आसान होते हैं।
लंबी उम्र और मजबूती: ये नोट धूल, मिट्टी, पानी और फटने के प्रति बेहद प्रतिरोधी होते हैं, जिससे ये भारतीय मौसम और रफ हैंडलिंग में भी लंबे समय तक सुरक्षित रहते हैं।
जालसाजी पर लगाम: पॉलीमर नोटों में पारदर्शी विंडो, माइक्रो-ऑप्टिक होलोग्राम और विशेष सुरक्षा स्याही जैसे हाई-टेक फीचर्स शामिल किए जा सकते हैं, जिनकी नकल करना नकली नोट के कारोबारियों के लिए नामुमकिन जैसा होता है।
लागत में कमी: हालांकि इनकी शुरुआती छपाई थोड़ी महंगी होती है, लेकिन इनकी लंबी उम्र के कारण बार-बार नोट छापने और बदलने का खर्च काफी कम हो जाता है।
पहले भी हुआ था ट्रायल, तब क्यों ठंडे बस्ते में गई थी योजना?
भारत के लिए पॉलीमर नोटों का विचार नया नहीं है। साल 2012 में केंद्र सरकार ने देश के पांच अलग-अलग भौगोलिक और जलवायु वाले शहरों—कोच्चि, मैसूर, जयपुर, भुवनेश्वर और शिमला में ₹10 के एक अरब पॉलीमर नोटों का फील्ड ट्रायल शुरू किया था। हालांकि, उस समय यह प्रोजेक्ट ट्रायल स्टेज से आगे नहीं बढ़ पाया। तब इसका मुख्य कारण तकनीकी सीमाएं थीं; आम लोगों को इन्हें संभालने में दिक्कत आ रही थी और देश की एटीएम (ATM) मशीनें इन प्लास्टिक नोटों को पहचानने और निकालने में पूरी तरह सक्षम नहीं थीं। लेकिन अब रिपोर्ट्स के मुताबिक, आधुनिक करेंसी-प्रोसेसिंग सिस्टम और नई एटीएम तकनीक इन बाधाओं को दूर कर चुकी हैं।
दुनिया के 60 से ज्यादा देशों में सफल है यह फॉर्मूला
वैश्विक स्तर पर पॉलीमर बैंक नोट अब कोई नया प्रयोग नहीं हैं। दुनिया के 60 से अधिक देश अपनी मुद्रा प्रणाली में इसे पूरी तरह या आंशिक रूप से अपना चुके हैं। ऑस्ट्रेलिया ने सबसे पहले 1988 में पॉलीमर नोट जारी किया था। इसके बाद ब्रिटेन, कनाडा, सिंगापुर, मलेशिया, थाईलैंड, न्यूजीलैंड और वियतनाम जैसे देशों ने इस तकनीक को अपनाया। यूरोप में रोमानिया पहला ऐसा देश बना जिसने 1998 में इसे लागू किया था। हालांकि, अमेरिकी डॉलर (USD) आज भी एक अपवाद है, जिसे पॉलीमर के बजाय एक विशेष कॉटन-लीनन मिक्स कागज पर ही छापा जाता है। भारत में भी यदि यह आगामी पायलट प्रोजेक्ट सफल रहता है, तो आने वाले समय में छोटे नोटों का स्वरूप पूरी तरह बदल सकता है.
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