
विदेश तक फैले जमीन घोटाले में कैसे फंसे जयपुर के किसान? ED की जांच
सांगानेर भूमि घोटाले में प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने 3 जून को किसानों को बुलाया। शेल कंपनियों, फर्जी दस्तावेजों और विदेशों में माइनिंग से जुड़ा है वित्तीय जाल।
Sanganer Land Scam: राजस्थान के सबसे बड़े भूमि घोटालों में से एक 'सांगानेर जमीन घोटाले' की जांच को तेज करते हुए प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने जयपुर के सांगानेर इलाके के कई किसानों को आगामी 3 जून को पेश होने के लिए समन जारी किया है. चौंकाने वाली बात यह है कि जिन किसानों को मनी लॉन्ड्रिंग (धन शोधन) जांच के केंद्र में रखा गया है, उन्होंने वर्षों पहले अपनी पैतृक कृषि भूमि कानूनी रूप से बेची थी और बैंकिंग चैनलों के माध्यम से उसका पूरा भुगतान भी प्राप्त कर लिया था.
अब ED इन किसानों के बयान दर्ज करेगी और दो दशक पुराने बिक्री से जुड़े मूल दस्तावेज और बैंकिंग लेनदेन के रिकॉर्ड एकत्र करेगी. यह कदम इस व्यापक आपराधिक जांच का हिस्सा है, जिसके तहत जयपुर में 12 ठिकानों पर छापेमारी की जा चुकी है, बेहिसाब नकदी जब्त हुई है और विदेशी संपत्तियों से जुड़ा एक बड़ा वित्तीय जाल सामने आया है.
"हमें नहीं पता था कि हमारे पावर ऑफ अटॉर्नी का गलत इस्तेमाल हुआ" - पीड़ित किसान
समन पाने वाले किसानों में से एक, कैलाश चंद ने समाचार एजेंसी पीटीआई (PTI) को बताया कि उनके परिवार ने साल 2005 में 'पिंकसिटी इंफ्रास्ट्रक्चर प्राइवेट लिमिटेड' को लगभग 1.82 हेक्टेयर भूमि बेची थी और पूरी रकम बैंक के जरिए ली थी. कैलाश चंद के अनुसार, "हमने बिक्री कानूनी रूप से पूरी की थी और हमारा किसी और से कोई लेना-देना नहीं था. बाद में हमें पता चला कि हमारे पावर ऑफ अटॉर्नी (Power of Attorney) का दुरुपयोग किया गया और हमारी सहमति के बिना हमारी जमीन पर नियंत्रण कर लिया गया। हमें 3 जून को दस्तावेज जमा करने के लिए बुलाया गया है।" कैलाश चंद की तरह ही एक अन्य किसान मदन बलाई को भी ED ने समन भेजकर दो दशक पुराने रिकॉर्ड के साथ तलब किया है.
कैसे रचा गया 150 करोड़ का यह 'चक्रव्यूह'?
जांच में सामने आया है कि किसानों ने जमीन बेचकर सौदा खत्म कर दिया था, लेकिन उन मूल सौदों के दौरान हस्ताक्षरित पावर ऑफ अटॉर्नी दस्तावेजों को कभी रद्द नहीं किया गया था. रियल एस्टेट ऑपरेटरों के एक शातिर नेटवर्क ने इसी का फायदा उठाया और किसानों की जानकारी के बिना फर्जी नए सौदे करने के लिए उन दस्तावेजों का दुरुपयोग किया.
एक ही प्लॉट को बार-बार बेचा: जाली राजस्व रिकॉर्ड का उपयोग करके एक ही जमीन को बार-बार कई खरीदारों को बेचा गया. निवेशकों और कॉर्पोरेट संस्थाओं ने उस जमीन के लिए सैकड़ों करोड़ रुपये का भुगतान कर दिया, जिसका स्पष्ट मालिकाना हक (Clear Title) उन्हें कभी मिला ही नहीं.
विवादित जमीन पर बना दी कॉलोनी: इसी विवादित भूमि के एक हिस्से पर 'श्रीनाथ विहार' नामक आवासीय कॉलोनी चुपचाप विकसित कर दी गई. जयपुर विकास प्राधिकरण (JDA) से फर्जी दस्तावेज जमा करके इसकी मंजूरियां ली गईं और यह बात छिपाई गई कि जमीन का मालिकाना हक अदालतों में चुनौती के अधीन है. वहां घर खरीदने वाले आम लोगों को इस धोखे की भनक तक नहीं थी.
मास्टरमाइंड ज्ञानचंद अग्रवाल: जिसके खिलाफ दर्ज हैं 300 से अधिक FIR
इस पूरे महाघोटाले के केंद्र में जयपुर का एक रियल एस्टेट कारोबारी ज्ञानचंद अग्रवाल है, जिसे राजस्थान पुलिस ने 'हिस्ट्रीशीटर' घोषित कर रखा है. अग्रवाल के खिलाफ राज्य भर में ठगे गए निवेशकों, व्यक्तिगत खरीदारों और कॉर्पोरेट संस्थाओं द्वारा 300 से अधिक एफआईआर (FIR) दर्ज कराई गई हैं, जिन्होंने सामूहिक रूप से अनुमानित 150 करोड़ रुपये गंवाए हैं. जांच के मुताबिक, साल 2010 के दशक में अग्रवाल के नेटवर्क ने एक व्यवस्थित ब्लूप्रिंट तैयार किया था, जिसके तहत निवेशकों से प्रीमियम जमीन के वादे पर पैसे वसूले जाते थे, डिलीवर कुछ नहीं होता था और फिर नए फर्जी दस्तावेजों के साथ यही चक्र दोहराया जाता था.
देश में ठगी, विदेश में माइनिंग; शेल कंपनियों के जरिए ठिकाने लगी रकम
स्थानीय स्तर पर शुरू हुआ यह जमीन कब्जाने का खेल देखते ही देखते अंतरराष्ट्रीय आयामों वाले मनी लॉन्ड्रिंग ऑपरेशन में बदल गया. सितंबर 2025 में जब ED ने 12 ठिकानों पर छापेमारी की थी, तो जांचकर्ताओं को बेहिसाब नकदी के साथ-साथ ऐसे दस्तावेज मिले जिनसे पता चला कि धोखाधड़ी की कमाई को शेल कंपनियों के माध्यम से विदेशों में संपत्ति खरीदने और विदेशों में माइनिंग (खनन) के कारोबार को फंड करने के लिए रूट किया गया था. छापेमारी में जब्त डिजिटल उपकरणों (हार्ड डिस्क, मोबाइल फोन) से बड़े पैमाने पर दागी लेनदेन का खुलासा हुआ है.
नियामक संस्थाओं (RERA) की विफलता उजागर
इस मामले में दर्ज एक रेरा (RERA) शिकायत से साफ जाहिर होता है कि कैसे हर स्तर पर व्यवस्था को ठगा गया. 'श्रीनाथ विहार' परियोजना को राजस्थान रियल एस्टेट रेगुलेटर अथॉरिटी (RERA) में फर्जी दस्तावेजों के आधार पर पंजीकृत कराया गया था, जिसमें जमीन के मालिकाना हक पर चल रहे मुकदमों को जानबूझकर छिपाया गया. इस शिकायत में परियोजना के पंजीकरण को रद्द करने और फॉरेंसिक ऑडिट की मांग की गई है. इसके अलावा, सांगानेर क्षेत्र में बिना किसी वैध एनओसी (NOC) के कब्जाई गई या विवादित जमीनों पर 87 से अधिक अवैध कॉलोनियां काट दी गईं, जबकि नियामक निकाय या तो इससे अनजान बने रहे या फिर उनकी मौन सहमति रही.
वर्तमान स्थिति: तीन समानांतर ट्रैक पर चल रही जांच
यह मामला इस समय तीन अलग-अलग स्तरों पर खंगाला जा रहा है:
प्रवर्तन निदेशालय (ED): पीएमएलए (PMLA) के तहत मनी लॉन्ड्रिंग के एंगल की जांच कर रहा है.
राजस्थान पुलिस का एसओजी (SOG): स्पेशल ऑपरेशंस ग्रुप इस मामले की अलग से आपराधिक जांच कर रहा है.
राजस्थान रेरा (RERA): धोखाधड़ी से किए गए प्रोजेक्ट रजिस्ट्रेशन की जांच में जुटा है.
इस बीच, राजस्थान उच्च न्यायालय ने गैर-सरकारी संगठन 'पब्लिक अगेंस्ट करप्शन' द्वारा दायर एक जनहित याचिका (PIL) पर कार्रवाई करते हुए राज्य सरकार को अवैध अतिक्रमणों को हटाने का कड़ा आदेश दिया है, और उन्हें वैध या नियमित करने के किसी भी प्रयास पर स्पष्ट रूप से रोक लगा दी है. 3 जून को किसानों को बुलाया जाना इस जांच का अंतिम साक्ष्य चरण माना जा रहा है, जहां दो दशकों के छेड़छाड़ किए गए भूमि रिकॉर्ड, फर्जी सरेंडर डीड और हेरफेर किए गए पावर ऑफ अटॉर्नी की क्रमबद्ध जांच की जाएगी.
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