बेटी बचाओ का नारा बनाम जोधपुर की हकीकत, दो बहनों की मौत पर सुलगते सवाल
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बेटी बचाओ का नारा बनाम जोधपुर की हकीकत, दो बहनों की मौत पर सुलगते सवाल

जोधपुर में इंसाफ न मिलने पर दूसरी बहन ने भी की खुदकुशी। डबल इंजन सरकार में बेटियों की मौत पर सुलग रहे हैं कई बड़े सवाल। दो आरोपी हिरासत में लिए गए।


Jodhpur Two Sister's Exploitation & Suicide: क्या 'बेटी बचाओ' का नारा सिर्फ चुनावी रैलियों और विज्ञापनों तक ही सीमित है? यह सबसे तीखा और बड़ा सवाल आज राजस्थान की कानून व्यवस्था से लेकर सत्ता के शीर्ष पर बैठे हुक्मरानों तक से है। सूबे में कहने को तो डबल इंजन की सरकार है, जो हर मंच से महिला सुरक्षा के बड़े-बड़े दावे ठोकती है। लेकिन जोधपुर के ग्रामीण इलाके से आई यह दर्दनाक दास्तान इन खोखले दावों की पोल खोलने के लिए काफी है। यहाँ एक ही परिवार की दो बेटियों को न्याय के लिए अपनी जान दांव पर लगानी पड़ जाती है। जिस खाकी को समाज ने अपनी सुरक्षा का जिम्मा सौंपा था, आज वही खाकी इन दो मासूमों की मौत की सबसे बड़ी गुनहगार नजर आ रही है। जब रक्षक ही आंखें मूंद लें, तो बेटियां न्याय के लिए आखिर कहाँ जाएं?


चार साल तक आरोपियों की हैवानियत को क्यों अनदेखा करती रही खाकी?
आरोप है कि पीड़ित परिवार की बड़ी बेटी को इलाके के ही एक ई-मित्र संचालक महिपाल ने अपनी हवस का जरिया बना रखा था। आरोपी ने धोखे से युवती के कुछ अश्लील वीडियो बना लिए थे। इन वीडियो के दम पर महिपाल और उसके सात अन्य साथी पिछले चार साल से उस लड़की का शारीरिक और मानसिक शोषण कर रहे थे। लोक-लाज और इस अंतहीन प्रताड़ना से तंग आकर आखिरकार बड़ी बहन ने बीती 20 मार्च को अपनी जीवन लीला समाप्त कर ली। सवाल यह है कि इतने बड़े रैकेट और ब्लैकमेलिंग के गंदे खेल की भनक स्थानीय पुलिस को क्यों नहीं लगी? क्यों पुलिस ने तब तक कोई एक्शन नहीं लिया जब तक कि एक हंसती-खेलती बेटी मौत के मुंह में नहीं समा गई? क्या पुलिस ने पोस्टमोर्टर्म रिपोर्ट पर कोई संज्ञान नहीं लिया या फिर उसे औपचारिकता से ज्यादा कुछ समझा ही नहीं? अगर पोस्टमोर्टर्म किया गया और उसमें शव का परीक्षण सही तरह से किया गया था तो फिर ये तथ्य छुप नहीं सकता था कि मृतका के साथ दुराचार हुआ था, एक बार नहीं कई बार हुआ था।

एफआईआर दर्ज होने के बाद भी आरोपियों को खुला घूमने की आजादी किसने दी?
बड़ी बहन की मौत के बाद भी इन दरिंदों का कलेजा नहीं कांपा। पुलिस की सुस्ती देखकर आरोपियों ने अब छोटी बहन को अपना निशाना बनाना शुरू कर दिया। वे बड़ी बहन के वीडियो इंटरनेट पर डालने की धमकी देकर छोटी बहन के साथ भी गलत काम करने लगे। मृतका ने हिम्मत दिखाकर 11 अप्रैल को ही पुलिस में नामजद शिकायत दर्ज कराई थी। इस एफआईआर में महिपाल, शिवराज, गोपाल, विजराम, दिनेश, मनोज और पुखराज समेत आठ लोगों के नाम साफ तौर पर शामिल थे। इसके बावजूद पुलिस हाथ पर हाथ धरे बैठी रही और आरोपी सरेआम घूमकर पीड़िता को धमकियां देते रहे। यह पुलिसिया शह नहीं तो और क्या है?

अपनी ही सुरक्षा के लिए एक बेटी को पानी की टंकी पर क्यों चढ़ना पड़ा?
पीड़िता ने पुलिस को साफ शब्दों में चेतावनी दी थी कि अगर उसे न्याय नहीं मिला तो वह अपनी जान दे देगी। शिकायत दर्ज होने के एक महीने बाद भी जब पुलिस ने एक कदम आगे नहीं बढ़ाया, तो शुक्रवार को उस लाचार बेटी का सब्र का बांध टूट गया। वह बहरे हो चुके सिस्टम को जगाने के लिए पानी की टंकी पर चढ़ गई और चिल्ला-चिल्लाकर आरोपियों की गिरफ्तारी की भीख मांगती रही। जब नीचे खड़े सिस्टम के कान पर जूं तक नहीं रेंगी, तो उसने जहरीला पदार्थ खा लिया और अस्पताल ले जाते समय उसकी मौत हो गई। क्या इस प्रशासनिक हत्या की जिम्मेदारी कोई लेगा?

दो मौतों के बाद जागी पुलिस, क्या दबाव में की जा रही कार्रवाई से न्याय मिलेगा?
इस दोहरे सुसाइड कांड के बाद पूरे राजपूत समाज और स्थानीय जनता का गुस्सा सातवें आसमान पर है। एमडीएम अस्पताल की मोर्चरी के बाहर जमा हुई भारी भीड़ और चौतरफा दबाव के बाद अब जाकर जोधपुर ग्रामीण पुलिस की नींद टूटी है। जोधपुर ग्रामीण एसपी पीडी नित्या ने बताया कि मुख्य आरोपी महिपाल और एक अन्य साथी को हिरासत में लिया गया है। बाकी आरोपियों की तलाश में टीमें भेजी गई हैं और दोषी पुलिसकर्मियों पर विभागीय जांच का ढोंग शुरू हो चुका है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि जब दोनों बहनों की जान चली गई, तब जाकर यह कागजी कार्रवाई क्यों शुरू हुई? क्या यह कार्रवाई सिर्फ जनता के गुस्से को शांत करने के लिए है?


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