क्या एसी सर्विस में बरती गयी लापरवाही?
पुलिस और फॉरेंसिक टीम की शुरुआती जांच इस बात की पुष्टि कर रही है कि आग दूसरी मंजिल पर लगे एक एसी (एयर कंडीशनर) से शुरू हुई। लेकिन सवाल यह है कि एक मशीन में लगी आग पूरी बिल्डिंग को कैसे निगल गई? जांच का एक बड़ा हिस्सा 'एसी गैस' के इर्द-गिर्द घूम रहा है। अमूमन देखा जाता है कि लोग चंद पैसे बचाने के चक्कर में अधिकृत सर्विस सेंटर के बजाय बाहर के लोकल मैकेनिक से काम कराते हैं।
जानकारों का कहना है कि लोकल मैकेनिक अक्सर घटिया क्वालिटी की गैस भर देते हैं जो 'फायर प्रूफ' नहीं होती। अगर एसी में तकनीकी खराबी थी और गैस लोकल थी, तो उसने ईंधन का काम किया होगा। जांच टीम अब उस मैकेनिक और सर्विस हिस्ट्री का पता लगा रही है ताकि यह साफ हो सके कि क्या यह एक 'मैनुफैक्चरिंग डिफेक्ट' था या फिर सर्विसिंग में की गई लापरवाही।
एसी तकनीशियन दीपक मीणा का कहना है कि बाजार में उपलब्ध सस्ती या नकली गैसों में अक्सर हाइड्रोकार्बन या पेट्रोलियम पदार्थ होते हैं, जो अत्यधिक ज्वलनशील होते हैं। यदि यह गलत गैस लीक होती है और कंप्रेसर या वायरिंग के किसी छोटे से स्पार्क के संपर्क में आती है, तो यह आग या बड़े विस्फोट का कारण बन सकती है। गलत गैस डालने से कंप्रेसर पर अत्यधिक दबाव पड़ता है, जिससे कंप्रेसर गर्म होकर फट सकता है। घटिया गैस के कारण सिस्टम में नमी, एसिड फॉर्मेशन और पाइप में कचरा जमा हो सकता है, जिससे कंप्रेसर जल सकता है।
डिजिटल लॉक: तकनीक जो काल बन गई
इस हादसे में सबसे ज्यादा चौंकाने वाली बात 'इलेक्ट्रॉनिक सेंट्रल लॉक' की विफलता रही। आज के दौर में सुरक्षा के लिहाज से लोग स्मार्ट लॉक लगवाते हैं। लेकिन विवेक विहार कांड में यही तकनीक लोगों की मौत की वजह बनी। जैसे ही आग की वजह से बिल्डिंग की बिजली काटी गई या शॉर्ट सर्किट हुआ, इन दरवाजों के सिस्टम ने काम करना बंद कर दिया।
अंदर मौजूद लोग चीखते रहे, लेकिन दरवाजे लॉक हो चुके थे। मैनुअल चाबी या तो मिली नहीं या फिर हड़बड़ाहट में उसका इस्तेमाल नहीं हो पाया। पुलिस अब इस एंगल से भी जांच कर रही है कि क्या इन फ्लैटों में 'इमरजेंसी एग्जिट मैनुअल ओवरराइड' की सुविधा थी या नहीं? यह उन बिल्डरों के लिए भी एक बड़ा सवाल है जो बिना सुरक्षा ऑडिट के ऐसी महंगी तकनीक लगा देते हैं।
बिल्डिंग का डिजाइन या मौत का जाल?
800 गज के बड़े प्लॉट पर 8 फ्लैट बनाना कानूनी रूप से गलत नहीं लग रहा, जैसा कि पूर्व टाउन प्लानर ए.के. जैन ने बताया। लेकिन बिल्डिंग के अंदरूनी डिजाइन ने रेस्क्यू ऑपरेशन को नामुमकिन बना दिया। पूरी बिल्डिंग में सिर्फ एक ही सेंट्रल जीना (सीढ़ी) था। आग लगते ही सबसे पहले धुआं और लपटें इसी सीढ़ी के रास्ते ऊपर की तरफ भागीं।
इसका नतीजा यह हुआ कि लोगों के पास नीचे उतरने का कोई रास्ता ही नहीं बचा। जांच इस बात पर भी केंद्रित है कि क्या बिल्डर ने नक्शा पास कराते समय किसी वैकल्पिक रास्ते का जिक्र किया था? अगर बिल्डिंग 15 मीटर से कम ऊंची थी, तो नियमों में ढील का फायदा उठाकर क्या सुरक्षा को पूरी तरह ताक पर रख दिया गया था?
ग्रिल और जाल: सुरक्षा या खुद की कैद?
पीछे की तरफ रहने वाले परिवार सबसे ज्यादा प्रभावित हुए। इसका मुख्य कारण खिड़कियों और बालकनी में लगी मजबूत लोहे की ग्रिल थी। चोरी से बचने के लिए लगाई गई इन जालियों ने लोगों को फ्लैट के अंदर ही कैद कर दिया। जब फायर ब्रिगेड मौके पर पहुंची, तो उन्हें इन ग्रिल को काटने में काफी वक्त लगा।
यही नहीं, जांच में यह भी सामने आया है कि लोगों ने सीढ़ियों के पास और फायर एस्केप के रास्तों पर बड़े-बड़े गमले और प्लांटर्स रखे हुए थे। सुंदरता बढ़ाने के चक्कर में रास्ता इतना संकरा हो गया कि अंधेरे और धुएं के बीच लोग लड़खड़ाकर गिर गए। पुलिस अब यह देख रही है कि क्या रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन (RWA) या मकान मालिकों को इन बाधाओं के लिए पहले कभी चेतावनी दी गई थी?
ममटी का बंद ताला और आखिरी उम्मीद
जब जीना आग से घिर गया, तो लोगों के पास आखिरी रास्ता छत की ओर भागने का था। लेकिन वहां भी किस्मत ने साथ नहीं दिया। छत पर जाने वाले दरवाजे (ममटी) पर ताला लटका था। तीन लोगों की लाशें इसी दरवाजे के पास मिलीं, जो शायद आखिरी वक्त तक उसे खोलने की कोशिश करते रहे होंगे।
जांच टीम अब यह पता लगा रही है कि इस दरवाजे की चाबी किसके पास रहती थी और क्या इसे हमेशा बंद रखना बिल्डिंग के नियमों का हिस्सा था? एक बंद दरवाजा नौ लोगों की जिंदगी और मौत के बीच का फासला बन गया। फायर विभाग के अधिकारी मुकेश वर्मा के बयान से साफ है कि अगर छत का रास्ता खुला होता, तो शायद हताहतों की संख्या बहुत कम होती।
जिम्मेदारी का खेल: बिल्डर बनाम निवासी
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि इस हादसे का ठीकरा किस पर फोड़ा जाए? कानूनन 15 मीटर से नीचे की रिहाइशी इमारतों को फायर एनओसी की जरूरत नहीं होती, जिसका फायदा उठाकर बिल्डर फायर सिस्टम नहीं लगाते। लेकिन क्या निवासियों की कोई जिम्मेदारी नहीं थी?
ए.के. जैन के मुताबिक, यह 'इंडिविजुअल नेग्लिजेंस' यानी व्यक्तिगत लापरवाही का मामला ज्यादा लग रहा है। खराब क्वालिटी के एसी पार्ट्स का इस्तेमाल करना, फायर रूट पर गमले रखना और इमरजेंसी रास्तों को बंद रखना, ये सब निवासियों की आदतों में शुमार है। पुलिस अब बिल्डिंग के पुराने रिकॉर्ड खंगाल रही है ताकि देखा जा सके कि क्या निर्माण के समय किसी नियम को तोड़ा गया था।
जांच से क्या निकलेगा?
विवेक विहार की यह आग दिल्ली के हजारों अन्य फ्लैटों के लिए एक चेतावनी है। पुलिस की चार्जशीट में एसी मैकेनिक, बिल्डर और शायद कुछ निवासियों के नाम भी शामिल हो सकते हैं। लेकिन असली सवाल वही है कि क्या हम अगले हादसे का इंतजार करेंगे?
जांच टीम की रिपोर्ट आने के बाद शायद कुछ नए नियम बनें, लेकिन जो नौ जिंदगियां इस 'सिस्टम' की भेंट चढ़ गईं, उनका हिसाब कभी नहीं मिल पाएगा। फिलहाल, पुलिस फॉरेंसिक रिपोर्ट का इंतजार कर रही है ताकि एसी में इस्तेमाल हुई गैस और शॉर्ट सर्किट के सटीक कारणों को कोर्ट के सामने रखा जा सके।