
धांधली या मानवीय चूक? योगेंद्र यादव ने खोली बंगाल SIR प्रक्रिया की पोल
राजनीतिक विश्लेषक योगेंद्र यादव का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट इस बात से अवगत लग रहा है कि कुछ ऐसा हुआ है, जो स्वीकार्य नहीं है। लेकिन अब वह इसके प्रभाव को कम...
"सत्ताइस लाख लोगों को गलत तरीके से उनके मताधिकार से वंचित कर दिया गया है और अंतिम समय में किए जा रहे इन अधिकांश सुधारों का कोई परिणाम नहीं निकलेगा," राजनीतिक विश्लेषक योगेंद्र यादव ने पश्चिम बंगाल में मतदाता सूचियों के विवादास्पद 'विशेष गहन पुनरीक्षण' (SIR) पर गंभीर चिंता जताते हुए यह बात कही। जैसे-जैसे मतदान करीब आ रहा है और मतदाता सूचियों में संशोधन की खबरें आ रही हैं। इस प्रक्रिया की वैधानिकता, निष्पक्षता और संस्थागत जवाबदेही पर सवाल और गहरे हो गए हैं।
संकेत उपाध्याय ने 'AI With Sanket' के इस एपिसोड में यादव से उस स्थिति के बारे में बात की, जिसे वे भारत के चुनावी इतिहास में एक अभूतपूर्व स्थिति बताते हैं।
साक्षात्कार के मुख्य अंश यहां दिए गए हैं...
क्या कभी ऐसी स्थिति रही है, जहां मतदान के दिन के इतने करीब मतदाता सूचियों को संशोधित किया गया हो?
कभी नहीं। इस देश में एक सीधा कानून है जो कहता है कि चुनावी रोल यानी मतदाता सूची नामांकन के अंतिम दिन 'फ्रीज' (स्थिर) हो जानी चाहिए, जो मतदान से लगभग एक महीने पहले होता है। इसलिए, चुनाव आयोग (EC) के लिए उस समय सीमा के बाद नाम जोड़ना या घटाना कानूनी रूप से संभव नहीं है। यह एक असामान्य मामला है क्योंकि सुप्रीम कोर्ट भारतीय संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी विशेष शक्तियों का आह्वान कर रहा है।
अनुच्छेद 142 क्या अनुमति देता है और यहां इसका उपयोग कैसे किया जा रहा है?
अनुच्छेद 142 सुप्रीम कोर्ट को वह सब कुछ करने की शक्ति देता है जो वह न्याय के हित में उचित समझे। यह कानून और संवैधानिक मिसाल — सब कुछ दरकिनार कर सकता है। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह जमीनी हकीकत को दरकिनार कर सकता है? जबकि शीर्ष अदालत कह रही है कि अंतिम समय में नाम जोड़े जा सकते हैं, सच्चाई यह है कि सार्थक रूप से ऐसा कुछ भी नहीं होने वाला है। अदालत ने प्रभावी रूप से कम से कम 27 लाख मतदाताओं के नाम हटाए जाने पर अपनी मंजूरी की मुहर लगा दी है।
क्या ये अंतिम समय के सुधार वास्तव में सार्थक हैं?
वास्तव में नहीं। सुप्रीम कोर्ट इस बात से अवगत लग रहा है कि कुछ ऐसा हुआ है जो स्वीकार्य नहीं है। लेकिन अब वह इसके प्रभाव को कम करने (soften the impact) की कोशिश कर रहा है। चाहे 27 या 2,700 नाम बहाल कर दिए जाएं, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता, जब 27 लाख लोगों को बाहर कर दिया गया हो। ये केवल दिखावटी (cosmetic) उपाय हैं। हकीकत में ये लोग मतदाता सूची से बाहर हैं।
क्या यह स्वयं SIR प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल उठाता है?
बिल्कुल। यह एक क्रूर चुनाव की स्थिति पैदा करता है कि चुनाव समय पर कराए जाएं या निष्पक्ष तरीके से। दुर्भाग्य से, चुनाव आयोग के आचरण और सुप्रीम कोर्ट की पहले की चुप्पी ने हमें इस स्थिति में धकेल दिया है। हालाँकि SIR पूरे देश में आयोजित किया जाता है। लेकिन पश्चिम बंगाल में इसका कार्यान्वयन असाधारण रूप से अलग रहा है।
क्या बंगाल के साथ अलग व्यवहार करने का कोई सांख्यिकीय आधार था?
नहीं, ऐसा कोई आधार नहीं था। मैंने कई संकेतकों की जांच की। बंगाल में मतदाता सूची का आकार वहां की वयस्क जनसंख्या के साथ लगभग पूरी तरह मेल खाता था, 6.67 करोड़ वयस्कों के मुकाबले 6.66 करोड़ मतदाता। यह एक असामान्य रूप से सटीक मेल है। इसलिए वहां नामों की संख्या बढ़ी हुई (inflation) नहीं थी। यहां तक कि SIR से पहले हाल ही में जो नाम जोड़े गए थे, उनमें 41 प्रतिशत की 'अस्वीकृति दर' (rejection rate) देखी गई थी, जो दर्शाता है कि वहां कोई सामूहिक हेरफेर (mass manipulation) नहीं था।
"मैपिंग" या सत्यापन से जुड़ी चिंताओं के बारे में क्या?
वहां भी बंगाल की स्थिति असामान्य नहीं थी। बंगाल में "अनमैप्ड" (जिनका मानचित्रण नहीं हुआ) मतदाताओं का अनुपात 4.5 प्रतिशत था, जो वास्तव में राजस्थान और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों की तुलना में अधिक है, जहां यह केवल 1.6 प्रतिशत है। इसलिए यह दावा कि बंगाल की स्थिति संदिग्ध थी, सांख्यिकीय रूप से टिकता नहीं है।
तो आपको क्यों लगता है कि बंगाल के साथ अलग व्यवहार किया गया?
पहले चरण के बाद, चुनाव आयोग (EC) ने बिना किसी सांख्यिकीय आधार के बंगाल को एक 'विशेष मामले' के रूप में मानने का निर्णय लिया। आयोग ने उत्तर प्रदेश में केवल चार के मुकाबले बंगाल में 30 पर्यवेक्षक (Observers) तैनात किए। इसने बंगाल में 8,000 माइक्रो-ऑब्जर्वर नियुक्त किए और अन्य कहीं भी नहीं। अधिकारियों के लगभग 95 प्रतिशत स्थानांतरण (ट्रांसफर) अकेले बंगाल में हुए। इसे सांख्यिकीय रूप से नहीं समझाया जा सकता, केवल राजनीतिक रूप से समझाया जा सकता है।
इसके पीछे आप क्या राजनीतिक स्पष्टीकरण देखते हैं?
बंगाल में भाजपा के पास '4D' समस्या है। वह हताश (Desperate) है, संगठनात्मक रूप से कमजोर है, ममता बनर्जी के रूप में उसके पास एक मजबूत प्रतिद्वंद्वी है और उसे जनसांख्यिकीय नुकसान (Demographic disadvantage) का सामना करना पड़ रहा है। मोटे तौर पर बंगाल के एक-तिहाई मतदाता, जिनमें मुख्य रूप से मुस्लिम शामिल हैं। उनके द्वारा भाजपा को वोट देने की संभावना कम है। यदि उनकी संख्या कम कर दी जाती है, तो चुनावी रास्ता आसान हो जाता है। SIR (विशेष गहन पुनरीक्षण) वही करता हुआ प्रतीत हो रहा है।
क्या लक्षित तरीके से नाम हटाए जाने (Targeted Deletions) के संकेत हैं?
हां। नंदीग्राम को ही लें। वहां मुस्लिम आबादी लगभग 25 प्रतिशत है। लेकिन जिन लोगों के नाम हटाने की सिफारिश की गई है, उनमें से 95 प्रतिशत मुस्लिम हैं। यह सांख्यिकीय रूप से असंभव है। भवानीपुर में, जहां मुस्लिम आबादी 54 प्रतिशत है, हटाए गए नामों में से लगभग 76 प्रतिशत इसी समुदाय से हैं। यह चुनावी लोकतंत्र के तर्क को पूरी तरह से उलट देता है।
आपने SIR के अलावा एक व्यापक पैटर्न का भी उल्लेख किया। आपका क्या मतलब है?
SIR केवल एक हिस्सा है। तीन तत्वों के माध्यम से लोकतंत्र को नया आकार देने का एक बड़ा प्रयास हो रहा है। भूगोल (Geography), कैलेंडर (Calendar), और अभिनेता (Actors)। परिसीमन (Delimitation) के माध्यम से भूगोल बदला जा रहा है। 'एक राष्ट्र, एक चुनाव' जैसे प्रस्तावों के माध्यम से कैलेंडर बदला जा रहा है। और अभिनेता जिसका अर्थ मतदाता है, उन्हें SIR जैसे अभ्यासों के माध्यम से बदला जा रहा है।
ऐसी स्थिति में क्या चुनाव स्थगित कर दिए जाने चाहिए थे?
आदर्श रूप से, हां। यदि अनुच्छेद 142 का उपयोग इस असाधारण न्यायिक प्रणाली को बनाने के लिए किया जा सकता था तो इसका उपयोग चुनाव स्थगित करने या इन 27 लाख लोगों को अपील लंबित रहने तक वोट देने की अनुमति देने के लिए भी किया जा सकता था। अब तक केवल 134 अपीलों पर सुनवाई हुई है और उनमें से 132 मान्य पाई गईं। यह दर्शाता है कि अधिकांश निष्कासन (नाम हटाया जाना) संभवतः गलत थे।
क्या चुनाव स्थगित करने का कोई विकल्प था?
हां, सुप्रीम कोर्ट उन सभी लोगों को, जिन्होंने अपील की थी, उनके मामलों का फैसला होने तक वोट देने की अनुमति दे सकता था। ऐसा नहीं हुआ। चुनाव के बाद के कानूनी उपचार (Post-election remedies) काम नहीं करते क्योंकि चुनाव याचिकाओं को निपटाने में वर्षों लग जाते हैं। इसलिए, जो कुछ भी किया जा सकता था, उसे मतदान से पहले ही किया जाना चाहिए था।
आप इस स्थिति के लिए किसे जिम्मेदार मानते हैं?
यहां मुख्य कर्ता चुनाव आयोग (EC) है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट भी उस समय हस्तक्षेप करने में विफल रहा जब वह ऐसा कर सकता था। अदालत ने एक ऐसी प्रणाली की अनुमति दी जहां 35 दिनों में 60 लाख मामलों का फैसला किया गया। इसका मतलब है कि प्रति मामले में तीन मिनट से भी कम का समय दिया गया। इसे निष्पक्ष न्यायनिर्णयन (Fair Adjudication) नहीं कहा जा सकता।
इस स्थिति पर आपका अंतिम आकलन क्या है?
यह मतदाता न्याय की एक गंभीर विफलता (Miscarriage of Voter Justice) है। ये वे लोग नहीं हैं, जो अनुपस्थित हैं या मृत हैं। उन्होंने दस्तावेज़ जमा किए, सुनवाई में शामिल हुए और यहां तक कि पासपोर्ट तक पेश किए। फिर भी उन्हें बाहर कर दिया गया। भले ही अब कुछ हज़ार नाम बहाल कर दिए जाएं लेकिन यह केवल प्रतीकात्मक होगा। नुकसान पहले ही हो चुका है।
आपका कहना है कि इससे बचा जा सकता था?
हां। या तो उन्हें अपील लंबित रहने तक मतदान करने की अनुमति दी जाती या फिर चुनाव स्थगित कर दिए जाते। दोनों में से कुछ भी नहीं हुआ। इसलिए हम एक ऐसी स्थिति में हैं, जहां लाखों लोगों को प्रभावी रूप से उनके लोकतांत्रिक अधिकार से वंचित कर दिया गया है।
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