टीचर के हाथ में जनगणना का रजिस्टर, बच्चों में समाया फेल होने का डर
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टीचर के हाथ में जनगणना का रजिस्टर, बच्चों में समाया फेल होने का डर

पिछले दो महीनों से दिल्ली के शिक्षक चैन की सांस नहीं ले पाए हैं। पहले 10वीं और 12वीं की सीबीएसई बोर्ड परीक्षाओं की ड्यूटी, फिर दिल्ली में विशेष गहन संशोधन (SIR) अभ्यास के लिए बीएलओ के रूप में चुनाव मैपिंग का काम, और अब जनगणना।


देश की राजधानी दिल्ली के सरकारी स्कूलों को अक्सर 'शिक्षा क्रांति' के मॉडल के रूप में पेश किया जाता है। लेकिन इस चमक-धमक वाली तस्वीर के पीछे एक कड़वा सच छिपा है। दिल्ली के सरकारी स्कूलों के शिक्षक आज एक ऐसे दोराहे पर खड़े हैं जहाँ उनके हाथ में चौक और डस्टर के बजाय जनगणना के फॉर्म, चुनाव मैपिंग के रजिस्टर और प्रशासनिक नोटिसों की फाइलें हैं।

आगामी जनगणना (Census) ने दिल्ली के सरकारी स्कूलों के शिक्षकों पर गैर-शैक्षणिक कामों का एक नया और भारी बोझ लाद दिया है। हालात ये हैं कि शिक्षक अब क्लासरूम में कम और सरकारी दफ्तरों या सर्वे के लिए सड़कों पर ज्यादा नज़र आ रहे हैं।

'शिक्षक हैं या सरकारी मजदूर?'

नरेला इलाके में बीएलओ (BLO) की ड्यूटी कर रहे एक शिक्षक का दर्द छलक पड़ा। उन्होंने कहा, "ऐसा लगता है कि सरकार को लगता है कि हम सबसे ज्यादा खाली लोग हैं। हमारे पास दुनिया भर के प्रशासनिक काम करने के लिए बहुत समय है। आज लगभग 90 फीसदी शिक्षक किसी न किसी सरकारी काम में फंसे हैं। हमें वह सब कुछ करना पड़ रहा है जिसके लिए हमें भर्ती नहीं किया गया था। हम पढ़ाना चाहते हैं, लेकिन हमें क्लर्क बना दिया गया है।"

परीक्षा, चुनाव और अब जनगणना: एक अंतहीन चक्र

पिछले दो महीनों से दिल्ली के शिक्षक चैन की सांस नहीं ले पाए हैं। पहले 10वीं और 12वीं की सीबीएसई बोर्ड परीक्षाओं की ड्यूटी, फिर दिल्ली में विशेष गहन संशोधन (SIR) अभ्यास के लिए बीएलओ के रूप में चुनाव मैपिंग का काम, और अब जनगणना। मई के मध्य से दोबारा बोर्ड परीक्षाएं शुरू होने वाली हैं, ऐसे में शिक्षकों के पास अपनी क्लास के बच्चों का सिलेबस पूरा कराने का समय ही नहीं बचा है।

किरारी के एक स्कूल टीचर बताते हैं, "इन कामों के आदेश अचानक आते हैं। हमारे पास कोई प्लान बनाने का समय नहीं होता। जब एक टीचर को स्कूल से बाहर भेजा जाता है, तो उसकी क्लास का रिदम टूट जाता है। बाकी स्टाफ को या तो डबल क्लास लेनी पड़ती है या सेक्शन मर्ज करने पड़ते हैं। यह पढ़ाई के माहौल को पूरी तरह बर्बाद कर रहा है।"

मॉडल टाउन का हाल: युद्ध जैसी तैयारी!

कुछ स्कूलों में स्थिति 'ब्रेकिंग पॉइंट' तक पहुँच गई है। मॉडल टाउन के एक स्कूल के प्रिंसिपल ने बताया कि पिछले दिनों जब पुलिस अधिकारी स्कूल आए, तो उन्होंने कहा कि यहाँ पढ़ाई नहीं बल्कि युद्ध जैसी तैयारियां दिख रही हैं। प्रिंसिपल ने बताया, "हमारे पास 24 सेक्शन हैं और संभालने के लिए सिर्फ 7-8 टीचर। यह कैसे मुमकिन है? फिलहाल मेरे स्कूल के 100% टीचर जनगणना की ट्रेनिंग में हैं, जो सुबह से शाम तक चलती है। ऊपर से 25% टीचर बीएलओ का काम भी देख रहे हैं। वे डबल ड्यूटी कर रहे हैं।"

हर क्षेत्र में शिक्षकों की तैनाती

शिक्षकों का उपयोग सिर्फ जनगणना या चुनाव तक सीमित नहीं है। 13 फरवरी से शुरू हुए महीने भर लंबे 'दिल्ली खेल महाकुंभ' में शारीरिक शिक्षा (PT) शिक्षकों को बड़े पैमाने पर तैनात किया गया। एक पीटी टीचर ने बताया, "जब तक खेल महाकुंभ चला, हमारी ड्यूटी वहीं लगी रही। स्कूल के प्रशासनिक काम, सरकारी योजनाएं और अब ये खेल... यह कभी न खत्म होने वाला सिलसिला है।"

नोटिस का डर और मानसिक तनाव

काम का बोझ ही काफी नहीं था, ऊपर से हर दिन की रिपोर्टिंग और कारण बताओ नोटिस (Show-cause notice) ने शिक्षकों की रातों की नींद हराम कर दी है। अशोक विहार के एक शिक्षक ने बताया कि उन्हें हर दिन शाम 5 बजे तक रिपोर्ट देनी होती है कि उन्होंने कितना टारगेट पूरा किया। मार्च के महीने में वे स्कूल में बच्चों पर ध्यान ही नहीं दे पाए क्योंकि उन पर फील्ड वर्क पूरा करने का दबाव था। टारगेट पूरा न होने पर कई शिक्षकों को नोटिस थमा दिए गए हैं। तनाव इस कदर बढ़ गया है कि कई महिला शिक्षकों के पति या परिवार के अन्य सदस्य उनके हिस्से का बीएलओ काम (घर-घर जाकर सर्वे) करने को मजबूर हैं, ताकि उनकी नौकरी पर आंच न आए।

कानून और हकीकत का टकराव

यह विवाद नया नहीं है। दिल्ली हाई कोर्ट ने 2019 में स्पष्ट निर्देश दिया था कि शिक्षकों को गैर-शैक्षणिक कार्यों में नहीं लगाया जाना चाहिए क्योंकि उनका प्राथमिक कार्य शिक्षा देना है। लेकिन पिछले साल सुप्रीम कोर्ट की एक टिप्पणी ने इस पर स्थिति बदल दी, जहाँ कहा गया कि ऐसे कार्यों के लिए शिक्षकों की नियुक्ति पर कोई पूर्ण प्रतिबंध नहीं है। इसी का फायदा उठाकर प्रशासन शिक्षकों को हर काम में झोंक देता है।

अमीर-गरीब की शिक्षा के बीच बढ़ती खाई

इस पूरे संकट का सबसे दुखद पहलू 'समानता' का अभाव है। प्राइवेट स्कूलों के बच्चों को इन रुकावटों का सामना नहीं करना पड़ता। उनके टीचर केवल पढ़ाते हैं। दूसरी तरफ, सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले गरीब तबके के बच्चे बार-बार होने वाली इन छुट्टियों और शिक्षकों की अनुपस्थिति के कारण पिछड़ रहे हैं।

एक शिक्षक ने सवाल उठाया, "सरकार केवल हम पर ही भरोसा क्यों करती है? क्या प्राइवेट स्कूलों या सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों के शिक्षकों को इन कामों का हिस्सा नहीं बनाया जाना चाहिए? सारा बोझ सिर्फ सरकारी स्कूल के मास्टर पर ही क्यों?"

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