बिखरा विपक्ष: बीजेपी के खिलाफ ममता की अपील क्यों रह गई अधूरी?
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बिखरा विपक्ष: बीजेपी के खिलाफ ममता की अपील क्यों रह गई अधूरी?

हालांकि इस तेज़-तर्रार नेता ने अतीत में कई बार वापसी की है, लेकिन भगवा खेमे के साथ उनकी यह नई लड़ाई बिल्कुल ही अलग तरह की है।


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West Bengal TMC's Fate : यह बदलाव वास्तव में आंखें खोल देने वाला और चौंकाने वाला है। एक ऐसी नेता के लिए जो हमेशा अपने कट्टर वफादारों से घिरी रहती थीं, जिन्हें अक्सर जनता 'चापलूस' कहकर पुकारती थी, मई 2026 का यह समय उनके लिए पूरी तरह से जमीन हिला देने वाला साबित हुआ है। यह समय 2011, 2016 और 2021 की उन सुनहरी मई की यादों से बिल्कुल अलग है, जब उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस (TMC) ने विपक्षी खेमे को बड़ी ही सहजता और गौरव के साथ पूरी तरह से साफ कर दिया था।


पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री और टीएमसी सुप्रीमो ममता बनर्जी ने 9 मई को कोलकाता स्थित अपने आवास पर गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर की जयंती मनाई। लेकिन वहां छाई खामोशी इतनी गहरी थी कि वह डराने वाली लग रही थी। खासकर तब, जब शहर के बीचों-बीच कुछ ही किलोमीटर की दूरी पर राज्य की पहली भारतीय जनता पार्टी (BJP) सरकार का भव्य और विशाल शपथ ग्रहण समारोह आयोजित किया जा रहा था। यह खामोशी हार के उस दर्द को बयान कर रही थी जिसे पार्टी ने कभी सोचा भी नहीं था।

ममता की राजनीतिक मशीनरी का अब क्या बचा है?
सिर्फ कालीघाट स्थित ममता का आवास ही सूना और वीरान नजर नहीं आ रहा था, बल्कि राज्य भर में फैले टीएमसी के तमाम कार्यालयों में भी ऐसा ही उदास और हताशा भरा माहौल देखा गया। पार्टी के कार्यकर्ता अपने टेलीविजन स्क्रीन पर भाजपा के केसरिया जश्न को अविश्वास भरी नज़रों से देख रहे थे। उनके मन में बस एक ही सवाल कौंध रहा था: ममता ने पिछले 28 वर्षों के अथक परिश्रम से जिस शक्तिशाली राजनीतिक मशीनरी को खड़ा किया था, उसका अब क्या बचा है? इसमें से पहले 13 साल (1998-2011) उन्होंने एक संघर्षशील और आक्रामक विपक्षी दल के रूप में बिताए और अगले 15 साल (2011-2026) राज्य की निर्विवाद सत्ता के रूप में।

एजेंसी की रिपोर्टों के अनुसार, पार्टी के ही एक अनुभवी दिग्गज नेता ने कहा कि नेतृत्व का एक बड़ा हिस्सा बहुत अधिक अहंकारी और जनता से कट गया था। उन्होंने प्रशासनिक स्तर पर काम के ठप होने और पार्टी के भीतर गुटबाजी को इस हार का बड़ा कारण बताया, जिसने विकास परियोजनाओं और सुशासन को गहरी चोट पहुँचाई। एक वरिष्ठ सांसद ने तो यहाँ तक कह दिया कि राजनीतिक सलाहकार संस्था 'आई-पैक' (I-PAC) और संगठन के भीतर हुए भीतरघात ने पार्टी को डुबो दिया। कई अन्य कार्यकर्ता ममता के भतीजे अभिषेक बनर्जी के 'कॉर्पोरेट' कार्यशैली को पार्टी के पतन के लिए जिम्मेदार ठहरा रहे हैं, जो पुराने कार्यकर्ताओं को रास नहीं आया।

राजनीतिक विश्लेषक विश्वनाथ चक्रवर्ती ने पीटीआई को बताया कि टीएमसी का पूरा ढांचा केवल "सत्ता तक अटूट और निरंतर पहुंच" पर टिका था। जैसे ही वह सत्ता की कड़ी टूटी, पार्टी का बिखराव और विखंडन शुरू होना तय था। टीएमसी कभी भी वामपंथ या भाजपा की तरह एक ठोस वैचारिक कैडर आधारित संगठन नहीं बन पाई। बंगाल की मिट्टी और ममता बनर्जी का व्यक्तिगत करिश्मा ही इसके इकलौते दो खंभे बने रहे, जिनके ढहते ही सब कुछ बिखरने लगा।

71 की उम्र में ममता के सामने नई और कठिन चुनौती
अब जबकि बंगाल की सत्ता हाथ से निकल चुकी है, पार्टी का पूरा अस्तित्व अब केवल और केवल सुप्रीमो ममता बनर्जी की अपनी क्षमता पर निर्भर है। लेकिन उनके सामने अब चुनौतियों का एक विशाल पहाड़ खड़ा है। 71 साल की उम्र में इन विपरीत परिस्थितियों से पार पाना उनके लिए उतना आसान नहीं होगा, जितना उनके युवा दिनों में था, जब वह सिंगूर और नंदीग्राम जैसे बड़े आंदोलनों के जरिए एक निडर विपक्षी नेता के रूप में स्थापित हुई थीं।

इस ऐतिहासिक हार के बाद, ममता ने भाजपा के खिलाफ एक बहुत बड़े और साझा मंच की अपील की है। उन्होंने वामपंथियों, अति-वामपंथियों और अन्य राष्ट्रीय दलों को एक साथ आने का न्योता दिया है। राजनीतिक दलों के अलावा, ममता ने छात्र संगठनों, नागरिक समूहों और उन सभी गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) से भी समर्थन माँगा है जो वैचारिक रूप से भाजपा के खिलाफ हैं। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में ऐलान किया है कि "हमारा सबसे पहला और सबसे बड़ा साझा दुश्मन भाजपा ही है।"

विपक्ष को एकजुट करने की ममता की यह कोशिश नई नहीं है। पिछले लोकसभा चुनावों में भी उन्होंने 'राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन' (NDA) के खिलाफ मोर्चा बनाने का असफल प्रयास किया था। 2001 में भी उन्होंने वामपंथियों को हराने के लिए 'महागठजोड़' बनाने की कोशिश की थी, लेकिन तब भी बात नहीं बनी थी। हालांकि, यह पहली बार नहीं है जब टीएमसी को इतनी करारी हार मिली हो; 2004 में भी ममता अपनी पार्टी की एकमात्र सांसद बची थीं, लेकिन फिर भी उन्होंने 2011 में कोलकाता की सत्ता के गलियारों में जोरदार वापसी की थी।

वामदल और कांग्रेस की गहरी बेरुखी
हालांकि, इस बार ममता पूरी तरह से अकेली लड़ती दिख रही हैं। माकपा (CPI-M) के राज्य सचिव मोहम्मद सलीम ने ममता की इस अपील पर तंज कसते हुए रवींद्रनाथ टैगोर की एक प्रसिद्ध कविता का उदाहरण दिया, जिसका भाव है कि "जब जीवन सूख जाता है और सब कुछ खत्म होने लगता है, तब आप करुणा की धारा बनकर आने की बात कर रहे हैं।"

एक अन्य वरिष्ठ नेता सुजन चक्रवर्ती ने कहा कि भले ही भाजपा को हराना आज की जरूरत है, लेकिन ममता बनर्जी की अपनी राजनीतिक साख अब बहुत बड़े संदेह के घेरे में है। उन्होंने आरोप लगाया कि ममता ने ही भाजपा को बंगाल में जड़ें जमाने के लिए राजनीतिक खाद-पानी दिया था और अब जब राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी एकता बन रही थी, तो ममता ने ही उसमें दरारें डालीं। वहीं, माओवादी नेता भी उन्हें पुराना इतिहास याद दिला रहे हैं और उन पर अपनी सत्ता के लिए लोगों के हितों का बलिदान देने का आरोप लगा रहे हैं।

'राहुल गांधी का नेतृत्व मानना पहली शर्त'
ममता के सबसे पुराने और मुखर आलोचक अधीर रंजन चौधरी ने भी विपक्षी एकता के उनके विचार पर करारा प्रहार किया। उन्होंने आरोप लगाया कि ममता ने ही कांग्रेस पार्टी और राज्य के धर्मनिरपेक्ष सामाजिक ताने-बाने को नष्ट किया है। चौधरी ने साफ़ कहा कि कांग्रेस उनकी अपील पर तभी गौर करेगी जब ममता बनर्जी राहुल गांधी को 'INDIA' गठबंधन का वास्तविक और निर्विवाद नेता स्वीकार करेंगी। गौरतलब है कि ममता और अभिषेक समय-समय पर राहुल के नेतृत्व की आलोचना करते रहे हैं, जिसकी भारी कीमत उन्हें 2026 के चुनाव में अकेले लड़कर चुकानी पड़ी।

ममता की विरासत और जवाबदेही का भारी बोझ
2026 की ममता बनर्जी अब 15 साल के शासन के भारी बोझ के साथ खड़ी हैं। इसमें शिक्षक भर्ती घोटाला, भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप, आंतरिक गुटबाजी और स्थानीय टीएमसी नेताओं के प्रति जनता का भारी आक्रोश शामिल है। इस चुनावी नतीजे ने टीएमसी के उस "अजेय" होने के भ्रम को पूरी तरह से तोड़ दिया है जो 2011 की ऐतिहासिक जीत के बाद से लगातार बना हुआ था।

पार्टी के भीतर अब यह डर घर कर गया है कि आने वाले महीनों में नगर पालिकाओं और पंचायतों में बड़े पैमाने पर दलबदल (Defection) शुरू हो सकता है। टीएमसी, जिसने कभी दूसरी पार्टियों को तोड़कर अपना कुनबा बढ़ाया था, अब खुद उसी खतरे की चपेट में है। विश्लेषकों का मानना है कि उम्र का बढ़ना, संगठन के भीतर आई थकान और बंगाल में भाजपा की अब तक की सबसे मजबूत और संगठित उपस्थिति ने वहां के राजनीतिक परिदृश्य को आधारभूत रूप से बदल दिया है।

ममता बनर्जी के लिए अब असली चुनौती सिर्फ सत्ता में फिर से वापसी की नहीं है, बल्कि अपनी उस राजनीतिक मशीनरी को पूरी तरह से बिखरने और संगठन को एक ऐतिहासिक पतन से बचाने की है।


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