CBSE का थ्री-लैंग्वेज फॉर्मूला, दक्षिण के राज्यों में बढ़ा भाषा विवाद
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CBSE का थ्री-लैंग्वेज फॉर्मूला, दक्षिण के राज्यों में बढ़ा भाषा विवाद

NEP 2020 के तहत कक्षा 9 और 10 में तीन भाषाएं पढ़ना हुआ अनिवार्य। एमके स्टालिन ने बताया भाषा थोपने की कोशिश। स्कूलों ने उठाईं प्रशासनिक मुश्किलें।


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Three Language Policy : सत्र 2026-27 से लागू होने जा रहे केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) के इस नए भाषाई ढांचे का दक्षिण और अन्य गैर-हिंदी भाषी राज्यों में कड़ा विरोध हो रहा है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 और नेशनल करिकुलम फ्रेमवर्क (NCFSE) 2023 के तहत लिए गए इस फैसले ने देश में एक बार फिर भाषाई प्रभुत्व, संघवाद और क्षेत्रीय पहचान से जुड़ी पुरानी बहस को गरमा दिया है।


क्या है सीबीएसई का नया भाषाई ढांचा और कैसे होगा इसका मूल्यांकन?
संशोधित नियमों के अनुसार, अब कक्षा 9 और 10 के छात्रों को तीन भाषाएं पढ़नी होंगी, जिनमें से कम से कम दो भारतीय भाषाएं होना अनिवार्य है। सीबीएसई ने साफ किया है कि छात्रों पर पढ़ाई का दबाव कम करने के लिए तीसरी भाषा को कक्षा 10 की बोर्ड परीक्षा का हिस्सा नहीं बनाया जाएगा, बल्कि इसका मूल्यांकन स्कूलों द्वारा आंतरिक (Internal Assessment) तौर पर किया जाएगा। छात्र हिंदी, तमिल, तेलुगु, कन्नड़, मलयालम, बंगाली, मराठी, गुजराती, उर्दू और संस्कृत जैसी भारतीय भाषाओं में से चुनाव कर सकते हैं। फ्रेंच, जर्मन, स्पेनिश जैसी विदेशी भाषाओं को केवल तभी चुना जा सकेगा जब छात्र पहले से दो भारतीय भाषाएं पढ़ रहे हों।

एमके स्टालिन ने लगाया हिंदी थोपने का आरोप, तमिल नाडु में तीखा विरोध
नीति का विरोध मुख्य रूप से इस डर से हो रहा है कि "भारतीय भाषाओं" के नाम पर गैर-हिंदी भाषी राज्यों पर परोक्ष रूप से हिंदी को थोपा जा सकता है। तमिलनाडु के पूर्व मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने इस कदम की तीखी आलोचना करते हुए इसे सोची-समझी भाषाई थोपने की कोशिश बताया है। तमिलनाडु की राजनीतिक पार्टियों का तर्क है कि राज्य में लंबे समय से लागू दो-भाषा फॉर्मूला (तमिल और अंग्रेजी) उनकी क्षेत्रीय पहचान और संवैधानिक संघवाद का प्रतीक है। आलोचकों का कहना है कि भले ही हिंदी को अनिवार्य नहीं किया गया है, लेकिन इस नीति का ढांचा दक्षिण भारत के सीबीएसई स्कूलों में धीरे-धीरे हिंदी के विस्तार को बढ़ावा देगा।

धर्मेंद्र प्रधान ने आरोपों को नकारा, कहा- नीति बहुभाषावाद को देती है बढ़ावा
विपक्ष और क्षेत्रीय दलों के आरोपों पर पलटवार करते हुए केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने इन दावों को पूरी तरह खारिज किया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह नीति किसी भी राज्य पर हिंदी थोपने के लिए नहीं है, बल्कि इसका उद्देश्य छात्रों के बीच बहुभाषावाद (Multilingualism) को बढ़ावा देना है। उन्होंने बार-बार दोहराया है कि एनईपी में हिंदी को अनिवार्य नहीं किया गया है और स्कूल सीबीएसई की स्वीकृत सूची में से अपनी पसंद की कोई भी भारतीय भाषा चुनने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र हैं।

सत्र शुरू होने के बाद सर्कुलर जारी होने से स्कूल परेशान, पुडुचेरी में 'फ्रेंच' पर संकट
राजनीतिक विवाद के अलावा स्कूलों ने इस नीति को जमीन पर लागू करने में आ रही व्यावहारिक दिक्कतों को भी उजागर किया है। मई के मध्य में यह सर्कुलर तब जारी किया गया जब अप्रैल से शैक्षणिक सत्र पहले ही शुरू हो चुका था। केरल और अन्य दक्षिणी राज्यों के प्राचार्यों ने पाठ्यपुस्तकों की कमी, पाठ्यक्रम की अस्पष्टता और प्रशिक्षित भाषा शिक्षकों की अनुपलब्धता की तरफ इशारा किया है। वहीं पुडुचेरी में स्थिति और संवेदनशील हो गई है, जहाँ फ्रेंच का ऐतिहासिक महत्व है। नई नीति में केवल एक विदेशी भाषा की अनुमति होने के कारण (चूंकि अंग्रेजी पहले ही अनिवार्य विदेशी भाषा का स्लॉट ले चुकी है) कई स्कूलों को फ्रेंच को पाठ्यक्रम से हटाना पड़ा है। कांग्रेस सांसद वी. वैथिलिंगम ने कहा कि इससे छात्रों के वैश्विक अवसरों पर असर पड़ेगा।

हिंदी से बचने के लिए राज्यों ने निकाला रास्ता, छात्र चुन रहे हैं 'संस्कृत' का विकल्प
इस केंद्रीय ढांचे के विरोध में कई राज्य अब अपने स्तर पर रास्ते तलाश रहे हैं। तमिलनाडु ने साफ कर दिया है कि वह अपने कानूनी रूप से समर्थित दो-भाषा नीति पर ही कायम रहेगा। कर्नाटक भी केंद्र के एनईपी ढांचे को खारिज कर सरकारी स्कूलों के लिए अपनी राज्य शिक्षा नीति पर आगे बढ़ रहा है। इस बीच, गैर-हिंदी भाषी राज्यों के कुछ सीबीएसई स्कूल राजनीतिक संवेदनशीलता और हिंदी के विवाद से बचने के लिए छात्रों को 'संस्कृत' चुनने की सलाह दे रहे हैं, क्योंकि इसे स्कोरिंग के लिहाज से भी आसान माना जाता है। वहीं कुछ सीमावर्ती जिलों के स्कूल पड़ोसी राज्यों की क्षेत्रीय भाषाओं के संयोजन पर विचार कर रहे हैं।


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