94 की उम्र में रोमिला थापर की कलम से जिंदगी, इतिहास और यादों का लेखा-जोखा
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94 की उम्र में रोमिला थापर की कलम से जिंदगी, इतिहास और यादों का लेखा-जोखा

‘जस्ट बीइंग’ में रोमिला थापर ने अपने 90 वर्षों से अधिक लंबे जीवन, इतिहास, स्मृतियों और बदलते विचारों की गहन पड़ताल की है।


“वर्तमान समय और बीता हुआ समय, शायद दोनों ही भविष्य के समय में मौजूद हैं, और भविष्य का समय अतीत के समय में समाहित है।”

इतिहासकार रोमिला थापर अपनी 2026 में प्रकाशित आत्मकथा ‘जस्ट बीइंग’ की प्रस्तावना का समापन टी.एस. इलियट की इन पंक्तियों से करती हैं। पुस्तक पढ़ते समय पाठक बार-बार इन पंक्तियों की ओर लौट सकते हैं, क्योंकि वे केवल दार्शनिक नहीं लगतीं, बल्कि उस पूरी कोशिश को व्यक्त करती हैं जो थापर इस संस्मरण में करती हैं।

यह आत्मकथा केवल उनके जीवन की कहानी नहीं है। यह स्मृति, इतिहास और आत्म-विश्लेषण के बीच के जटिल संबंधों को समझने का प्रयास भी है। 94 वर्षीय रोमिला थापर अपने जीवन को केवल याद नहीं करतीं, बल्कि एक इतिहासकार की तरह उसका विश्लेषण भी करती हैं।

स्मृति और इतिहास के बीच की दूरी

संस्मरण लेखन का इतिहास स्वयं में रोचक है। प्राचीन काल से ही मनुष्य अपने जीवन और समय को दर्ज करने की कोशिश करता रहा है। लेकिन जब कोई इतिहासकार आत्मकथा लिखता है, तो यह कार्य और अधिक जटिल हो जाता है।इतिहासकारों को स्मृतियों पर संदेह करना, स्रोतों की जांच करना और तथ्यों के आधार पर निष्कर्ष निकालना सिखाया जाता है। ऐसे में अपने ही जीवन को वस्तुनिष्ठ दृष्टि से देखना आसान नहीं होता।

थापर अपनी पुस्तक की शुरुआत इसी स्वीकारोक्ति से करती हैं कि स्मृतियां कभी पूरी तरह निष्पक्ष नहीं होतीं। याद रखना, भूल जाना और चयन करना—ये सभी स्मृति का हिस्सा हैं। इसलिए वे स्पष्ट करती हैं कि उनकी यह पुस्तक किसी अंतिम सत्य का दावा नहीं करती, बल्कि जीवन की कुछ चुनी हुई स्मृतियों का संग्रह है।

महामारी के दौरान शुरू हुई स्मृतियों की यात्रा

पुस्तक की शुरुआत उनके बचपन से नहीं होती। कथा का आरंभ महामारी के दौरान उनके घर के बगीचे से होता है, जहां वे अकेली बैठकर लिख रही हैं।पेड़ों, पौधों, गिलहरियों और पक्षियों से भरा उनका बगीचा किसी ज़ेन उद्यान जैसा प्रतीत होता है। वहीं बैठकर वे अपने अतीत की ओर लौटती हैं और पाठकों को अपने बचपन की दुनिया में ले जाती हैं।

लाहौर से पेशावर तक का बचपन

थापर का बचपन सैन्य छावनियों में बीता। शुरुआती वर्ष लाहौर और बाद में उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत (वर्तमान खैबर पख्तूनख्वा, पाकिस्तान) में गुजरे।वे पेशावर के प्रसिद्ध किस्सा ख्वानी बाज़ार का उल्लेख करती हैं, जो कहानीकारों और सांस्कृतिक परंपराओं के लिए जाना जाता है। इसी वातावरण में उनका बचपन आकार ले रहा था।

उनके पिता दया राम थापर सेना की मेडिकल कोर में उच्च पद पर थे। चिकित्सा के अलावा उनकी रुचि फोटोग्राफी और फिल्म निर्माण में भी थी। उन्होंने थाल किले में रहते हुए एक मूक फिल्म ‘किडनैप्ड’ भी बनाई थी।थापर इन स्मृतियों के माध्यम से उस दौर के सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन की जीवंत तस्वीर प्रस्तुत करती हैं।

इतिहास का जीवंत अनुभव

आत्मकथा की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इतिहास केवल पृष्ठभूमि नहीं बनता, बल्कि कथा का हिस्सा बन जाता है।1939 में जब उनका परिवार रावलपिंडी पहुंचा, उसी वर्ष द्वितीय विश्व युद्ध शुरू हुआ। वे याद करती हैं कि किस तरह पूरा परिवार रेडियो के आसपास बैठकर ब्रिटेन के राजा जॉर्ज षष्ठम का संबोधन सुनता था।यह इतिहास को किताबों से बाहर निकालकर जीवन के अनुभवों में बदल देता है।

विचारों का बदलता सफर

थापर अपने जीवन के असहज और विवादास्पद पहलुओं से भी नहीं बचतीं।वे स्वीकार करती हैं कि शुरुआती दिनों में वे इजरायल के प्रति सहानुभूति रखती थीं और उन मित्रों से बहस करती थीं जो इसका विरोध करते थे। लेकिन समय के साथ घटनाओं को करीब से देखने के बाद उनके विचार बदले और वे अधिक आलोचनात्मक दृष्टिकोण अपनाने लगीं।इस तरह वे दिखाती हैं कि विचार स्थिर नहीं होते, बल्कि अनुभवों के साथ विकसित होते हैं।

इतिहास को जनता तक पहुंचाने का प्रयास

पुस्तक में वे सार्वजनिक इतिहास (Public History) और इतिहासकारों की भूमिका पर भी चर्चा करती हैं।उनका मानना है कि इतिहास को केवल राजाओं और राजनीतिक घटनाओं तक सीमित नहीं रहना चाहिए। वे अकादमिक इतिहास और लोकप्रिय इतिहास के बीच अंतर को रेखांकित करते हुए कहती हैं कि ऐतिहासिक पद्धति का पालन करने वाले इतिहासकार और केवल दावे करने वाले लोगों के बीच फर्क समझना जरूरी है।उनके शब्दों में, “यह अंतर बार-बार बताना जरूरी है ताकि नकली को असली न समझ लिया जाए।”

चीन से अमेरिका तक की यात्राएं

थापर की यात्राएं भी पुस्तक का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।1950 के दशक में वे श्रीलंकाई इतिहासकार अनिल डी सिल्वा के साथ चीन गईं, जहां उन्होंने बौद्ध इतिहास पर काम किया। इसी यात्रा के दौरान उनकी मुलाकात माओ त्से तुंग और झोउ एनलाई जैसे नेताओं से हुई।बाद में अमेरिका में उन्होंने प्रसिद्ध लेखक और इतिहासकार स्टड्स टर्केल से मुलाकात की। यह मुलाकात मार्टिन लूथर किंग जूनियर की हत्या के तुरंत बाद हुई थी और इसके माध्यम से उन्हें अमेरिकी समाज में नस्लीय विभाजन को समझने का अवसर मिला।

शिक्षा, छात्र आंदोलन और जेएनयू

भारत लौटने के बाद उन्होंने कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय और बाद में दिल्ली विश्वविद्यालय में अध्यापन किया।वे 1960 के दशक के छात्र आंदोलनों और नक्सल आंदोलन के उदय का भी उल्लेख करती हैं। उनका मानना था कि छात्रों की राजनीतिक चेतना महत्वपूर्ण है, लेकिन ग्रामीण भारत की वास्तविकताओं को समझे बिना किसी आंदोलन में शामिल होना जोखिमपूर्ण हो सकता है।

वे जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) के शुरुआती वर्षों को भी विस्तार से याद करती हैं और उन लोगों का उल्लेख करती हैं जिन्होंने इस संस्थान को आकार दिया।

इतिहास लेखन का उनका दृष्टिकोण

थापर हमेशा व्यापक अध्ययन, प्रमाण आधारित शोध और अन्य विषयों के साथ संवाद की पक्षधर रही हैं।उनके लिए इतिहास त्वरित उत्तर देने का माध्यम नहीं, बल्कि जटिल प्रश्नों को समझने की प्रक्रिया है। वे उन लोगों की आलोचना करती हैं जो इतिहास को सरल और सतही निष्कर्षों तक सीमित कर देते हैं।एनसीईआरटी की पाठ्यपुस्तकों पर अपने काम और इतिहास अध्ययन केंद्र (Centre for Historical Studies) की स्थापना के दिनों को भी वे विस्तार से याद करती हैं।

केवल इतिहासकार नहीं, एक बहुआयामी व्यक्तित्व

इस आत्मकथा को रोचक बनाने वाली बात यह है कि यह केवल एक अकादमिक जीवन का विवरण नहीं है।रोमिला थापर की रुचियां इतिहास से कहीं आगे तक फैली हुई हैं—कविता, दर्शन, संगीत, वनस्पति विज्ञान, यात्रा, भोजन और पुरातत्व तक।वे दिल्ली की ध्रुपद सोसायटी की संस्थापक सदस्यों में रही हैं। टी.एस. इलियट और फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ जैसे लेखकों और कवियों को पढ़ने का प्रभाव उनकी लेखन शैली में भी दिखाई देता है।

एक जीवन से आगे की सीख

‘जस्ट बीइंग’ केवल रोमिला थापर के जीवन का संस्मरण नहीं है। यह उस बौद्धिक परंपरा का दस्तावेज भी है जिसने आधुनिक भारत की ऐतिहासिक समझ को आकार दिया।थापर का महत्व केवल उनकी लिखी पुस्तकों में नहीं, बल्कि उस जीवन-पद्धति में भी है जिसे उन्होंने जिया—जिज्ञासु, अनुशासित, आलोचनात्मक और लगातार स्वयं से प्रश्न करने वाली।नब्बे वर्षों से अधिक के जीवन और सार्वजनिक आलोचनाओं के बीच भी इस दृष्टिकोण को बनाए रखना आसान नहीं था।

इस आत्मकथा को पढ़ना हमें यह याद दिलाता है कि विचार करना भी एक अनुशासन है, जिसके लिए धैर्य, साहस और निरंतर आत्ममंथन की आवश्यकता होती है। शायद यही ‘जस्ट बीइंग’ की सबसे बड़ी विरासत है—सिर्फ एक जीवन की स्मृति नहीं, बल्कि दुनिया में रहने और उसे समझने का एक तरीका।

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