
जंगल, जुगाड़ और जुनून से बना ‘मालगुडी डेज़’ का अमर संसार
‘मालगुडी डेज़’ के 40 साल बाद भी इसका जादू कायम है। शंकर नाग की टीम ने सीमित संसाधनों, जुगाड़ और जुनून ने यादगार संसार रचा था ।
1986 में दूरदर्शन पर पहली बार प्रसारित हुआ मशहूर टीवी धारावाहिक ‘मालगुडी डेज’ स्क्रीन पर जितना सरल और सहज दिखाई देता था, उसकी निर्माण यात्रा उतनी ही कठिन और संघर्षों से भरी हुई थी।करीब चालीस साल बाद जब आज इस सीरियल को दोबारा देखा जाता है, तो हैरानी होती है कि आम लोगों की छोटी-छोटी परेशानियों, सपनों और कमजोरियों को दिखाने वाली यह दुनिया आज भी उतनी ही जीवंत और प्रासंगिक महसूस होती है। इंटरनेट पर उपलब्ध यह धारावाहिक आज भी अपनी धीमी, सुकून भरी और देसी खुशबू से भरी दुनिया में दर्शकों को खींच लेता है। इसका मशहूर टाइटल ट्रैक “ताना नाना ना…” आज भी लोगों के दिलों में उसी तरह बसता है।
कर्नाटक के पश्चिमी घाटों के घने जंगलों के बीच बसे छोटे से गांव अगुम्बे में इस सीरियल की शूटिंग हुई थी। निर्देशक दिवंगत शंकर नाग और उनकी टीम ने मिलकर आरके नारायण की कल्पना वाली मालगुडी दुनिया को असल रूप देने की कोशिश की थी। मालगुडी कोई भी गांव या कस्बा हो सकता था। यहां कहानियां किसी बड़े हीरो की नहीं, बल्कि डाकिए, स्कूल मास्टर, मिठाई बेचने वाले या शरारती स्कूली बच्चों जैसे साधारण लोगों की थीं। यही उसकी सबसे बड़ी ताकत थी।
सितंबर 1986 में जब यह सीरियल दूरदर्शन पर प्रसारित हुआ, तो इसे देशभर में जबरदस्त सराहना मिली। लेकिन इस सीरियल को स्क्रीन तक पहुंचाने का सफर आसान नहीं था।
छोटे गांव में बड़ी दुनिया बसाने की चुनौती
सीरियल की टीम में करीब 60 से 120 लोग शामिल थे। शूटिंग ऐसे गांव में हो रही थी जहां सुविधाएं बेहद सीमित थीं। यूनिट के सदस्य गांववालों के घरों में ठहरते थे और स्थानीय लोग भी उन्हें पूरा सहयोग देते थे।
अगर शूटिंग के लिए हाथी, गधा या मॉरिस माइनर जैसी पुरानी कार चाहिए होती, तो उसे बेंगलुरु से करीब 300 किलोमीटर दूर से मंगाना पड़ता था। उस दौर में मोबाइल फोन नहीं थे। संदेश भेजने के लिए ट्रंक कॉल या टेलीग्राम का सहारा लिया जाता था।
कई बार देसी जुगाड़ से काम चलाना पड़ता था। एक एपिसोड की अंडरवॉटर शूटिंग के लिए आर्ट डायरेक्टर जॉन देवराज ने खुद खास उपकरण तैयार किया था।लेकिन सबसे बड़ा खतरा था — किंग कोबरा। अगुम्बे को किंग कोबरा का इलाका माना जाता था।सीरियल में ‘स्वामी’ का किरदार निभाने वाले मंजूनाथ नायक बताते हैं कि कुछ समय बाद टीम को खिड़कियों के आसपास लिपटे सांप देखकर भी डर नहीं लगता था।
आज बेंगलुरु में पब्लिक पॉलिसी कंसल्टेंट के रूप में काम कर रहे मंजूनाथ उस समय ‘मास्टर मंजूनाथ’ के नाम से मशहूर थे। वे कहते हैं, “1980 के दशक में बेहद सीमित संसाधनों के साथ 1940 के दौर को दिखाना बहुत बड़ी चुनौती थी। अगुम्बे में सिर्फ एक पोस्ट ऑफिस, एक बस स्टॉप, एक राशन की दुकान और एक पीडब्ल्यूडी गेस्ट हाउस था। लेकिन शंकर नाग, अरुंधति नाग, पद्मावती राव और पूरी टीम ने उस गांव को मालगुडी में बदल दिया।”इतना ही नहीं, स्थानीय बस कंडक्टर भी अगुम्बे स्टॉप पर ‘मालगुडी… मालगुडी…’ चिल्लाने लगे थे।
जब चाय देने वाला बन गया चोर
मंजूनाथ एक मजेदार किस्सा याद करते हैं। “‘हीरो’ एपिसोड में मैं एक चोर के पैर में काटकर उसे पकड़ता हूं। वह चोर असल में हमें चाय-कॉफी देने वाला व्यक्ति था। अगले ही सीन में वह कुर्ता उतारकर बैकग्राउंड में लंगड़ाते हुए चलता नजर आता था। कोई समझ ही नहीं पाता था कि वही आदमी दोनों भूमिकाएं निभा रहा है। यही शंकर नाग की प्रतिभा थी।”
किंग कोबरा से सामना
मंजूनाथ बताते हैं कि गांववालों ने पहले ही चेतावनी दी थी — “अगर कई सांप एक साथ भागते दिखें, तो उनके साथ भागना, क्योंकि इसका मतलब है कि किंग कोबरा आ रहा है।”‘नागा’ एपिसोड की शूटिंग के दौरान उन्हें असली सांप और बंदर के साथ काम करना पड़ा। एक सीन में सांप उनके कंधे पर था और अचानक वह तनाव में आ गया। मंजूनाथ तुरंत भागे और पूरी यूनिट उनके पीछे दौड़ पड़ी।
भाषा भी बनी चुनौती
सीरियल हिंदी और अंग्रेजी में शूट हो रहा था, लेकिन कई कलाकारों की इन भाषाओं पर पकड़ मजबूत नहीं थी।फिर भी शंकर नाग चाहते थे कि कलाकार दक्षिण भारत से ही हों। उनका मानना था कि हिंदी में दक्षिण भारतीय लहजा होना कोई समस्या नहीं है।सीरियल की सहायक निर्देशक और अभिनेत्री पद्मावती राव बताती हैं, “मंजू बेहद प्रतिभाशाली बच्चा था। उसे एक बार कुछ समझा दो, फिर वह उसे अपना बना लेता था।”
वे याद करती हैं कि अरासालु रेलवे स्टेशन पर शूटिंग के लिए टीम को सुबह बहुत जल्दी पहुंचना पड़ता था, क्योंकि स्टीम इंजन वाली ट्रेन दिन में सिर्फ एक बार सुबह 6 बजे गुजरती थी। रेलवे को बड़ी रकम जमा करनी पड़ती थी, लेकिन शंकर नाग हर चीज असली चाहते थे। ट्रेन कुछ ही सेकंड के लिए दिखाई देती थी और उसी दौरान मंजूनाथ को अंग्रेजी और हिंदी में संवाद बोलने होते थे।
आरके नारायण की कहानियों को स्क्रीन पर ढालने की चुनौती
स्क्रीनप्ले राइटर मरियम जेटपुरवाला कहती हैं कि आरके नारायण की कहानियों में पारंपरिक कहानी संरचना बहुत कम होती थी।“उनकी कहानियों में बड़ा संघर्ष या नाटकीय मोड़ नहीं होता था। कई कहानियां सिर्फ पांच-दस मिनट में सुनाई जा सकती थीं। चुनौती यह थी कि उन्हें लंबा कैसे किया जाए, बिना मूल भावना खोए।”उन्होंने और शंकर नाग ने मिलकर ‘स्वामी एंड फ्रेंड्स’ को आठ एपिसोड तक विस्तार दिया, जबकि सामग्री सिर्फ चार एपिसोड की थी।
महिलाओं के किरदारों को नया रूप
पद्मावती राव बताती हैं कि आरके नारायण की कहानियों में महिला पात्र बहुत सीमित थे।“हम महिलाओं के बिना दुनिया नहीं बना सकते थे, इसलिए हमने कई महिला किरदारों को विस्तार दिया।”‘द वेंडर ऑफ स्वीट्स’ एपिसोड में मिठाई वाले की पत्नी का किरदार सिर्फ कहानी में उल्लेख भर था। लेकिन सीरियल में उसे फ्लैशबैक और भावनात्मक दृश्यों के जरिए जीवंत बनाया गया।
मालगुडी की दुनिया कैसे बनी?
सीरियल की टीम ने खुद दुकानें, बस स्टॉप, स्कूल और यहां तक कि ‘सर लॉले’ की विशाल मूर्ति भी तैयार की।अगर कहानी में किसी खास तरह के स्ट्रीट लैंप या प्रॉप का जिक्र होता, तो टीम उसे ढूंढकर लाती।पद्मावती राव कहती हैं, “शंकर नाग अक्सर नामुमकिन चीजें मांगते थे — घोड़े, हाथी, गधे — लेकिन हमारी प्रोडक्शन टीम हर बार उसे संभव बना देती थी।”
बिना बड़े सितारों के बना क्लासिक
सीरियल में बड़े फिल्मी सितारे नहीं थे, लेकिन शंकर नाग ने अपनी कल्पना और निर्देशन से ऐसी दुनिया बनाई, जिसमें दर्शकों को अपनापन महसूस होता था।‘माली’ का किरदार निभाने वाले सुनील सदानंद कहते हैं, “मालगुडी डेज की सबसे बड़ी खूबी थी कि उसमें हर फ्रेम में जिंदगी चलती हुई महसूस होती थी।”वे बताते हैं कि मॉरिस माइनर कार, पुराने कपड़े, घर, मिट्टी के बर्तन और गांव का माहौल सब कुछ बेहद असली लगता था।
दूरदर्शन की नई नीति ने बदली तस्वीर
उस दौर में दूरदर्शन ने पहली बार निजी निर्माताओं को कार्यक्रम बनाने की अनुमति दी थी। इसी वजह से ‘रामायण’, ‘बुनियाद’ और ‘मालगुडी डेज’ जैसे धारावाहिक संभव हो पाए।शंकर नाग मानते थे कि आरके नारायण भारत में उतने प्रसिद्ध नहीं थे जितने विदेशों में। वे चाहते थे कि देश अपने साहित्य और कहानियों पर गर्व करे।
जब आरके नारायण ने ‘ओल्ड मैन एंड द टेंपल’ एपिसोड देखा, तो उन्होंने कहा, “मुझे नहीं पता था कि इस कहानी में इतना कुछ है।”इसके बाद उन्होंने शंकर नाग से कहा — “तुम्हें मेरी कहानियों को इस्तेमाल करने की पूरी आजादी है।”मंजूनाथ को देखकर उन्होंने कहा था, “तुमने स्वामी को बिल्कुल वैसा निभाया जैसा मैंने सोचा था।”
क्यों आज भी खास है ‘मालगुडी डेज’?
पद्मावती राव मानती हैं कि इस सीरियल की सबसे बड़ी ताकत उसकी मानवीय संवेदनाएं हैं।इसमें कोई किरदार पूरी तरह अच्छा या बुरा नहीं था। हर इंसान की कमजोरियां भी थीं और अच्छाइयां भी।दुबई में रहने वाले आरके नारायण के प्रशंसक अजय दासानी कहते हैं कि यह सीरियल इसलिए लोकप्रिय हुआ क्योंकि इसके किरदार आम इंसानों जैसे थे — कमजोर, गलतियां करने वाले, लेकिन फिर भी प्यारे।उनके मुताबिक, “मालगुडी सिर्फ दक्षिण भारत का गांव नहीं था, बल्कि उस दौर के पूरे भारत का प्रतीक था।” शायद यही वजह है कि चार दशक बाद भी ‘मालगुडी डेज’ सिर्फ एक टीवी सीरियल नहीं, बल्कि भारतीय स्मृतियों का अहम हिस्सा बना हुआ है।

