
मोहनलाल ने बचाई इज्जत, लेकिन फीकी पड़ गई दृश्यम 3 की कहानी
दृश्यम 3 में मोहनलाल की शानदार एक्टिंग दिखती है, लेकिन कमजोर कहानी और फीके सस्पेंस के कारण फिल्म पहले जैसे असर छोड़ने में नाकाम रहती है।
दृश्यम 3 में प्रभाकर (सिद्दीकी) बार-बार यह कहता नजर आता है कि जॉर्जकुट्टी (मोहनलाल) उतना बड़ा मास्टरमाइंड नहीं है, जितना लोग उसे मानते हैं। उसके मुताबिक, जॉर्जकुट्टी अब तक सिर्फ किस्मत यानी “भाग्य” के सहारे बचता आया है। यह संवाद सिर्फ कहानी का हिस्सा नहीं लगता, बल्कि निर्देशक जीथू जोसेफ द्वारा अपनी ही फ्रेंचाइज़ी को लेकर किया गया आत्ममंथन महसूस होता है। लेकिन विडंबना यह है कि इस बार फिल्म को खुद उसी “भाग्य” की सबसे ज्यादा जरूरत थी, क्योंकि इसकी कहानी और भावनात्मक दांव पहले दोनों भागों की तुलना में काफी कमजोर नजर आते हैं।
इस बार तैयार नहीं दिखता जॉर्जकुट्टी
फिल्म की शुरुआत जीथू जोसेफ के एक दिलचस्प मेटा मोमेंट से होती है। हम एक पारिवारिक व्यक्ति को उसके अपराधों के लिए गिरफ्तार होते देखते हैं, लेकिन कैमरा पीछे हटता है और पता चलता है कि यह सब एक फिल्म का हिस्सा था — जिसका नाम “दृश्यम” है और जिसे खुद जॉर्जकुट्टी ने प्रोड्यूस किया है।
अब जॉर्जकुट्टी एक सफल फिल्म निर्माता बन चुका है और अंतरराष्ट्रीय कंपनियों के साथ ओवरसीज राइट्स को लेकर डील कर रहा है। उसकी बड़ी बेटी अंजू (अनिश्बा हसन) को थेरेपिस्ट पूरी तरह ठीक घोषित कर चुका है। परिवार अब उसके लिए रिश्ता तलाश रहा है, लेकिन हर संभावित रिश्ता किसी न किसी वजह से टूट जाता है।
दूसरी ओर, विदेश में गीता प्रभाकर (आशा शरथ) गहरे अवसाद में डूबी हुई है, जिससे उसका पति प्रभाकर मानसिक रूप से टूटने की कगार पर पहुंच जाता है।पहले और दूसरे भाग के विपरीत, इस बार जॉर्जकुट्टी पहले से कोई योजना बनाते नहीं दिखता। वह बिखरा हुआ, उलझा हुआ और लापरवाह नजर आता है। यह बदलाव शुरुआत में दिलचस्प लगता है, लेकिन फिल्म इसे पूरी तरह प्रभावी ढंग से इस्तेमाल नहीं कर पाती।
रहस्य ज्यादा, असर कम
इंटरवल तक यह साफ नहीं हो पाता कि फिल्म का असली संघर्ष आखिर है क्या। कहानी कई भटकाने वाले संकेतों के पीछे भागती रहती है — घर का छोटा-मोटा रेनोवेशन, जॉर्जकुट्टी का उसे पूरी तरह दोबारा न बनवाने का फैसला और परिवार के भीतर की बेचैनियां।जब असली विरोधी सामने आते हैं तो वह असर पैदा नहीं हो पाता, जिसकी उम्मीद “ड्रिश्यम” जैसी फ्रेंचाइज़ी से की जाती है। इस सीरीज की सबसे बड़ी ताकत हमेशा मनोवैज्ञानिक तनाव रही है, न कि सिर्फ कहानी के ट्विस्ट। जीथू जोसेफ इस बार भी किरदारों के भीतर चल रहे संघर्ष को दिखाने में सफल रहते हैं।
फिल्म इस बात पर फोकस करती है कि अपने परिवार को बचाने की जिद में जॉर्जकुट्टी ने बाकी लोगों की जिंदगी पर क्या असर डाला। नए विरोधी कहानी में एक नैतिक सवाल जोड़ते हैं, लेकिन जैसे ही पुराना दुश्मन लौटता है, फिल्म अपनी स्वाभाविकता खोने लगती है।कई किरदार बेहद सतही “बदला लेने वाले विलेन” बन जाते हैं, जबकि “ड्रिश्यम” की दुनिया हमेशा इससे कहीं ज्यादा समझदार और परिपक्व रही है।
मोहनलाल ने संभाला पूरा भार
कमजोरियों के बावजूद फिल्म को कलाकारों की शानदार एक्टिंग संभाल लेती है। अनु (एस्थर अनिल) और उसकी मां रानी (मीना) के बीच के छोटे-छोटे झगड़े बेहद स्वाभाविक और गर्मजोशी से भरे लगते हैं। इनके जरिए दोनों बेटियों के अलग-अलग व्यक्तित्व भी सामने आते हैं — एक संवेदनशील और कमजोर, दूसरी आधुनिक और विद्रोही।मोहनलाल अपने किरदार के धीरे-धीरे टूटने को बेहद बारीकी से निभाते हैं। खाली निगाहों से देखना, बेसिन की बजाय फर्श पर पानी थूक देना या अचानक गुस्सा खो देना — ये छोटे-छोटे पल उनके भीतर की बेचैनी को गहराई से महसूस कराते हैं।
क्या जॉर्जकुट्टी खुद राक्षस बन चुका है?
फिल्म का सबसे दिलचस्प पहलू अंजू की नजरों से जॉर्जकुट्टी को देखना है। सवाल यह उठता है कि जो आदमी एक “राक्षस” को खत्म करने निकला था, क्या वह खुद धीरे-धीरे वैसा ही बन गया है?यह विचार बेहद गहरा और सोचने पर मजबूर करने वाला है, लेकिन फिल्म इसे पूरी ताकत के साथ एक्सप्लोर नहीं कर पाती। जरूरत थी कि कहानी को अंजू के नजरिए से ज्यादा दिखाया जाता, क्योंकि असल बोझ उसी के हिस्से आता है।
फिल्म संघर्ष तक पहुंचने में बहुत समय लेती है, लेकिन अंत को जल्दबाजी में खत्म कर देती है। वीणा नंदकुमार का किरदार, जो पहले हिस्से में अहम लगता है, बाद में लगभग गायब हो जाता है। ऐसी खामियां जीथू जोसेफ जैसे निर्देशक से उम्मीद नहीं की जातीं।
अधूरा विराम लगती है दृश्यम 3’
अंत में महसूस होता है कि दृश्यम 2 ही इस कहानी का बेहतर निष्कर्ष था — जहां जॉर्जकुट्टी कानून से नहीं, बल्कि अपने डर और बेचैनी से जिंदगीभर की सजा पा चुका था। वही इस कहानी का पूर्ण विराम था।“दृश्यम 3” एक अनावश्यक कॉमा की तरह लगती है, जिसे दो बेहद प्रतिभाशाली लोगों ने उस वाक्य में जोड़ दिया, जिसे अब आगे बढ़ाने की शायद जरूरत नहीं थी।

