सिनेमा, गीत और सत्ता: तमिलनाडु में विजय की सफलता की पूरी कहानी
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सिनेमा, गीत और सत्ता: तमिलनाडु में विजय की सफलता की पूरी कहानी

तमिल राजनीति में विजय का उभार अचानक नहीं था। फिल्मों और गीतों के जरिए उन्होंने वर्षों तक अपनी राजनीतिक छवि गढ़ी और सत्ता तक का रास्ता तैयार किया।


तमिल सिनेमा और राजनीति का रिश्ता दशकों पुराना है। हाल ही में तमिलनाडु की राजनीति में अभिनेता विजय के उभार ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या फिल्मों के गीत और संवाद केवल मनोरंजन का माध्यम होते हैं या वे राजनीतिक भविष्य भी गढ़ सकते हैं। फिल्म बीस्ट (2022) के गीत बीस्ट मोड की एक पंक्ति—"सिला पेरिन पेर थान ओरु आलुमई पेरुमामे" (सिर्फ कुछ लोगों के नाम ही सत्ता तक पहुंचते हैं)—आज कई लोगों को भविष्यवाणी जैसी लग सकती है। लेकिन यह संयोग नहीं था, बल्कि तमिल राजनीति और सिनेमा के लंबे इतिहास का हिस्सा था।

द्रविड़ आंदोलन और सिनेमा का राजनीतिक इस्तेमाल

1950 के दशक में पेरियार ई.वी. रामासामी के आत्मसम्मान आंदोलन (Self-Respect Movement) से जुड़े नेताओं ने जल्दी ही समझ लिया था कि सिनेमा आम जनता तक पहुंचने का सबसे प्रभावी माध्यम है। उस दौर में अखबार और अन्य मीडिया पर अभिजात वर्ग का प्रभाव था, जबकि फिल्में सीधे मजदूरों और आम लोगों तक पहुंचती थीं।

द्रविड़ मुनेत्र कषगम (DMK) के संस्थापक सी.एन. अन्नादुरई ने नाटक और पटकथा लेखन के जरिए द्रविड़ विचारधारा को लोकप्रिय बनाया। बाद में एम. करुणानिधि ने अपनी प्रभावशाली पटकथाओं और संवादों के माध्यम से इस परंपरा को आगे बढ़ाया।1952 में रिलीज हुई फिल्म पराशक्ति इसका सबसे बड़ा उदाहरण बनी। अभिनेता शिवाजी गणेशन द्वारा बोले गए संवादों ने धार्मिक कट्टरता, जातिगत भेदभाव और सरकारी विफलताओं पर खुलकर सवाल उठाए।

गीत बने राजनीतिक हथियार

द्रविड़ नेताओं ने जल्द ही महसूस किया कि गीत किसी भाषण या पर्चे से कहीं अधिक प्रभावी हो सकते हैं। गीत लोगों की जुबान पर चढ़ जाते थे और राजनीतिक संदेश सीधे उनके दिलों तक पहुंचता था।इस परंपरा के सबसे बड़े गीतकारों में पट्टुकोट्टई कल्याणसुंदरम का नाम लिया जाता है। उनकी रचनाओं ने द्रविड़ आंदोलन को जन-जन तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

1962 की फिल्म थिरुडाथे में एमजी रामचंद्रन (MGR) पर फिल्माए गए एक गीत ने कांग्रेस सरकार और ब्राह्मणवादी वर्चस्व पर सीधा हमला बोला। यह कोई राजनीतिक भाषण नहीं बल्कि फिल्मी गीत था, लेकिन उसका प्रभाव बेहद व्यापक था।

एमजीआर ने गीतों को बनाया राजनीतिक अभियान

1958 में आई फिल्म नाडोडी मन्नन ने सिनेमा और राजनीति के गठजोड़ को नई ऊंचाई दी। फिल्म में डीएमके के झंडे और उगते सूरज के प्रतीक का खुला इस्तेमाल किया गया।इसके बाद थूंगाथे थम्बी थूंगाथे और नान आनैयित्ताल जैसे गीतों ने एमजीआर की छवि एक ऐसे नेता के रूप में गढ़ी जो अन्याय के खिलाफ लड़ने और सामाजिक न्याय स्थापित करने आया है।

गीतकार पुलमई पिथन, वाली, मुथुलिंगम और कल्याणसुंदरम जैसे रचनाकारों ने एमजीआर के लिए ऐसे गीत लिखे जिनमें गरीबों के अधिकार, सामाजिक न्याय और व्यवस्था परिवर्तन की बात की जाती थी।जब 1972 में एमजीआर ने डीएमके से अलग होकर अपनी पार्टी बनाई और 1977 में मुख्यमंत्री बने, तब तक उनके फिल्मी गीतों ने उनके लिए एक मजबूत राजनीतिक आधार तैयार कर दिया था।

जब आंदोलन से बड़ा हो गया व्यक्तित्व

अन्नादुरई और करुणानिधि ने सिनेमा को एक सामूहिक राजनीतिक आंदोलन का माध्यम बनाया था, लेकिन एमजीआर ने इसे अपने व्यक्तिगत राजनीतिक ब्रांड में बदल दिया।उनकी फिल्मों में गरीबों की मदद करने वाला, माताओं का सम्मान करने वाला और बच्चों का प्रिय नायक दिखाया जाता था। लोगों ने इस छवि को वास्तविक जीवन से जोड़ लिया और एमजीआर को अपना उद्धारक मानने लगे।यहीं से तमिल राजनीति में व्यक्तित्व आधारित राजनीति की शुरुआत हुई।

रजनीकांत: संकेत तो मिले, लेकिन राजनीति नहीं

एमजीआर के बाद रजनीकांत ने भी अपने गीतों के जरिए प्रशंसकों से संवाद स्थापित किया, लेकिन उन्होंने कभी किसी राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी को निशाना नहीं बनाया।मुथु और बाबा जैसी फिल्मों के गीतों में राजनीति के बजाय आध्यात्मिकता, भाग्य और व्यक्तिगत विचारों पर अधिक जोर दिया गया।रजनीकांत ने राजनीतिक संभावनाओं के संकेत जरूर दिए, लेकिन कभी पूरी तरह राजनीति में नहीं उतरे। इसलिए उनका राजनीतिक प्रोजेक्ट अधूरा ही रह गया।

विजय की अलग राजनीतिक रणनीति

विजय ने अपने राजनीतिक संकेत अपेक्षाकृत देर से देने शुरू किए। 2002 की फिल्म तमिझन में भ्रष्टाचार और सुशासन जैसे मुद्दे दिखाई दिए, लेकिन उस समय तक उनकी राजनीतिक विचारधारा पूरी तरह स्पष्ट नहीं थी।2003 की वसीगारा में विजय ने अपने नृत्य और प्रस्तुति के जरिए खुद को एमजीआर की विरासत से जोड़ने का प्रयास किया।इसके बाद 2005 की फिल्म सिवकासी के गीत कोडंबक्कम एरिया में पहली बार ऐसे बोल सुनाई दिए जिनमें आम आदमी के मुख्यमंत्री बनने की बात की गई थी।

‘थलाइवा’ से खुलकर सामने आई राजनीतिक महत्वाकांक्षा

2013 में आई फिल्म थलाइवा विजय के राजनीतिक सफर का महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुई। फिल्म के शीर्षक से ही नेतृत्व और सत्ता की महत्वाकांक्षा झलकती थी।फिल्म के गीतों में ऐसे संदेश थे जो किसी किरदार से ज्यादा स्वयं विजय की छवि को मजबूत करते नजर आते थे।

‘अलापोरान तमिझन’ और तमिल पहचान की राजनीति

फिल्म मर्सल का गीत अलापोरान तमिझन विजय के राजनीतिक सफर में मील का पत्थर माना जाता है।गीत में तमिल पहचान, गर्व और सांस्कृतिक अस्मिता को प्रमुखता दी गई। यह केवल एक फिल्मी गीत नहीं बल्कि विजय की राजनीतिक सोच का सार्वजनिक बयान माना गया।इसके बाद गीतकार विवेक के साथ उनकी साझेदारी और मजबूत हुई।

‘ओरु विरल पुरच्ची’ और खुली राजनीतिक घोषणा

फिल्म सरकार के गीत ओरु विरल पुरच्ची में विजय ने भ्रष्ट व्यवस्था के खिलाफ सवाल उठाने, आम जनता की ताकत और बदलाव की जरूरत पर जोर दिया।यह गीत पारंपरिक द्रविड़ राजनीति के कई तत्वों को दोहराता था, लेकिन केंद्र में कोई आंदोलन नहीं बल्कि स्वयं विजय थे।यहीं से स्पष्ट हो गया कि विजय सिनेमा को सीधे राजनीतिक संदेश के मंच के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं।

फिल्मों से राजनीति तक का पूरा सफर

वसीगारा से लेकर मर्सल, सरकार और बीस्ट तक विजय ने एक-एक गीत के जरिए अपनी राजनीतिक पहचान को सावधानीपूर्वक गढ़ा।जब उन्होंने मार्च 2023 में औपचारिक रूप से राजनीति में प्रवेश किया, तब तक उनकी राजनीतिक छवि पहले ही तैयार हो चुकी थी।बीस्ट मोड की वह चर्चित पंक्ति किसी भविष्यवाणी का परिणाम नहीं थी, बल्कि एक सुनियोजित राजनीतिक रणनीति का हिस्सा थी।

तमिल राजनीति की नई दिशा

द्रविड़ आंदोलन ने 1950 के दशक में सिनेमा को राजनीतिक अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया था। एमजीआर ने इसे व्यक्तिगत राजनीतिक हथियार में बदल दिया और विजय ने उसी परंपरा को आधुनिक रूप में आगे बढ़ाया।आज सवाल यह नहीं है कि विजय ने फिल्मों के जरिए राजनीति में जगह बनाई या नहीं। असली सवाल यह है कि क्या वह इस लोकप्रियता को प्रभावी शासन में बदल पाएंगे।तमिलनाडु की राजनीति का अगला अध्याय इसी सवाल का जवाब तय करेगा।

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