हंसी, सस्पेंस और सामाजिक कटाक्ष का बेहतरीन मेल, दिल जीतती है मां बहन
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हंसी, सस्पेंस और सामाजिक कटाक्ष का बेहतरीन मेल, दिल जीतती है 'मां बहन'

'मां बहन' तीन महिलाओं की कहानी है जो समाज की धारणाओं और पूर्वाग्रहों से जूझती हैं। माधुरी दीक्षित के दमदार अभिनय से सजी यह डार्क कॉमेडी मनोरंजन के साथ सामाजिक संदेश भी देती है।


निर्देशक सुरेश त्रिवेणी की नई फिल्म Maa Behen में रेखा (माधुरी दीक्षित) वर्षों से आदर्श नगर के लोगों के लिए चर्चा और विवाद का विषय रही हैं। एक अकेली मां, जिसने कभी साइबर कैफे चलाया, कभी अंतःवस्त्र बेचे और अब शराब की दुकान में काम करती है, रेखा कभी भी समाज की उस पारंपरिक छवि में फिट नहीं बैठीं जिसे लोग “सम्मानजनक महिला” मानते हैं।

अपने बोल्ड ब्लाउज, गहरे लाल रंग की लिपस्टिक और सामाजिक मानदंडों को चुनौती देने वाले व्यक्तित्व के कारण पड़ोसी उन्हें कभी पुरुषों को बहकाने वाली महिला, कभी घर तोड़ने वाली और कभी समाज के लिए खतरा मानते रहे हैं।

अफवाहों से घिरी एक महिला की कहानी

रेखा के बारे में कहानियां हमेशा सच से ज्यादा तेजी से फैली हैं। नेटफ्लिक्स पर रिलीज हुई यह डार्क कॉमेडी तीन ऐसी महिलाओं की कहानी है, जिनका केवल अस्तित्व ही लोगों को असहज कर देता है।

फिल्म का केंद्र बिंदु यही है कि रेखा वास्तव में कौन हैं और समाज उन्हें क्या समझता है। जब उनकी बेटियां जया (तृप्ति डिमरी) और सुषमा (धर्ना दुर्गा) एक रहस्यमयी घटना में फंस जाती हैं और पड़ोसी चरित्र कुमार गुप्ता (रवि किशन) का शव उनके घर में मिलता है, तब कहानी एक ऐसे रहस्य में बदल जाती है जो अपराध से ज्यादा सामाजिक धारणाओं पर सवाल उठाती है।

सनसनीखेज मीडिया की नजर से कहानी

फिल्म की कहानी ‘खलबली’ नामक एक सनसनीखेज क्राइम शो के नजरिए से सुनाई जाती है, जिसे रेखा बड़े चाव से देखती हैं। शो का एंकर कथावाचक की भूमिका निभाता है और घटनाओं को उसी अतिरंजित अंदाज में पेश करता है जैसा अक्सर टीवी के क्राइम शो में देखा जाता है।इस माध्यम से निर्देशक सुरेश त्रिवेणी और सह-लेखिका पूजा ठोलिया समाज की उस मानसिकता पर कटाक्ष करते हैं जो गॉसिप, अफवाह और नैतिक फैसलों को सच से ज्यादा महत्व देती है।

आदर्श नगर की सबसे चर्चित महिला

आदर्श नगर का लगभग हर व्यक्ति रेखा की अपनी अलग कहानी गढ़ चुका है। कोई उनकी बेटियों के अलग-अलग पिताओं पर चर्चा करता है, कोई उन्हें जादूगरनी मानता है जो कभी बूढ़ी नहीं होती, तो कोई उन्हें संभावित हत्यारिन समझता है जिसके घर के गेंदा फूलों के नीचे कोई शव दबा हो सकता है।विडंबना यह है कि उनके घर का नाम ‘कृपा निवास’ है, लेकिन वही घर कॉलोनी की सबसे अधिक आलोचना झेलने वाली महिला का पता बन गया है।

बेटियां भी बनीं समाज के निशाने पर

रेखा की बेटियां भी लोगों की धारणाओं का शिकार हैं। जया को उस लड़की के रूप में देखा जाता है जिसने अपनी सबसे अच्छी दोस्त के मंगेतर से शादी कर ली, जबकि सुषमा को अवैध संतान और विवादों में घिरी युवती के रूप में बदनाम किया जाता है।कॉलोनी का रवैया साफ है—“जैसी मां, वैसी बेटियां।” लोगों की नजर में उनका घर एक ऐसा निषिद्ध किला है जो उसमें प्रवेश करने वाले किसी भी व्यक्ति का जीवन बर्बाद कर सकता है।

शव, संदेह और रहस्य

जब तीनों महिलाएं अपने घर में मिले शव को ठिकाने लगाने की योजना बनाती हैं, तभी गुप्ता की पत्नी (गीतांजलि कुलकर्णी), जो अपनी बेटी की शादी की तैयारियों में व्यस्त है, यह मान बैठती है कि पड़ोस की ‘डायन’ रेखा ने ही उसके पति को अपने जाल में फंसाया होगा।वह घर में घुसकर कथित बुरी शक्तियों को खत्म करना चाहती है। इसी बीच उसका भाई महेश्वरी (अरुणोदय सिंह), जो पुलिस अधिकारी है और जया के प्रति नरम रुख रखता है, मामले की जांच शुरू करता है।हालांकि, उसे शक है कि गुप्ता अपनी किसी निजी मुसीबत के कारण इस स्थिति में फंसा होगा।

फिल्म की सबसे बड़ी ताकत हैं कलाकार

फिल्म की सबसे बड़ी शक्ति इसके कलाकार हैं। रेखा के किरदार में माधुरी दीक्षित ने हाल के वर्षों का अपना सबसे बेबाक और प्रभावशाली अभिनय किया है। उन्होंने इस किरदार में हास्य, संवेदनशीलता, विद्रोह और मानवीय गर्मजोशी का सुंदर संतुलन प्रस्तुत किया है।तृप्ति डिमरी ने जया के किरदार को गहराई और जटिलता दी है, जबकि धर्ना दुर्गा सोशल मीडिया की दुनिया में लोकप्रियता की तलाश करती सुषमा के रूप में बेहद स्वाभाविक लगती हैं।तीनों अभिनेत्रियों के बीच की सहज केमिस्ट्री फिल्म को वास्तविक और भावनात्मक बनाती है।

महिलाओं पर समाज की नजर का विश्लेषण

फिल्म का शीर्षक ‘मां बहन’ भी अपने आप में एक व्यंग्य है। उत्तर भारत में यह शब्द अक्सर गाली, मजाक या गुस्से में इस्तेमाल होता है। सुरेश त्रिवेणी इस शब्द को नया अर्थ देते हैं।यहां मां और बेटियां किसी और की कहानी का हिस्सा नहीं हैं, बल्कि पूरी कहानी उन्हीं के इर्द-गिर्द घूमती है।

फिल्म प्रतिष्ठा, नैतिकता, सोशल मीडिया पर वायरल होने की संस्कृति और सार्वजनिक फैसलों पर तीखी टिप्पणी करती है। यह दिखाती है कि समाज किस तरह महिलाओं पर जल्दी से लेबल चिपका देता है और फिर उन्हीं धारणाओं के आधार पर उन्हें आंकता रहता है।

कुछ कमजोरियां भी मौजूद

फिल्म का दूसरा भाग पहले हिस्से की तुलना में थोड़ा धीमा और अनुमानित हो जाता है। कुछ रहस्योद्घाटन उतना प्रभाव नहीं छोड़ते जितनी उम्मीद की जाती है। कई बार सामाजिक टिप्पणियां रहस्य से ज्यादा प्रभावशाली लगती हैं।फिर भी कलाकारों का मजबूत अभिनय कहानी को पटरी से उतरने नहीं देता।

अंततः 'मां बहन' केवल एक मर्डर मिस्ट्री या डार्क कॉमेडी नहीं है। यह उन महिलाओं की कहानी है जो पूरी जिंदगी दूसरों की नजरों से परखी जाती रही हैं। फिल्म यह सवाल उठाती है कि जब ऐसी महिलाओं को आखिरकार अपनी कहानी खुद कहने का मौका मिलता है, तब समाज की बनाई हुई धारणाओं का क्या होता है।सुरेश त्रिवेणी की यह फिल्म मनोरंजन के साथ-साथ समाज के पूर्वाग्रहों पर भी गंभीर और प्रभावशाली टिप्पणी करती है।

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