पर्दे का मुस्कुराता चेहरा हुआ खामोश, सलीम कुमार नहीं रहे
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पर्दे का मुस्कुराता चेहरा हुआ खामोश, सलीम कुमार नहीं रहे

मलयालम सिनेमा के दिग्गज अभिनेता सलीम कुमार का 56 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता कलाकार अपनी शानदार कॉमेडी और दमदार अभिनय के लिए याद किए जाएंगे।


अगर पिछले एक दशक की मलयालम मीम संस्कृति पर नजर डालें, तो एक चेहरा बार-बार सामने आता है। वह चेहरा जो हर परिस्थिति में खुद को नए रूप में ढाल लेता था—कभी हास्यास्पद, कभी तीखा, कभी भावुक और कभी बेहद मार्मिक। वह चेहरा था मलयालम सिनेमा के दिग्गज अभिनेता सलीम कुमार का।

मलयालम फिल्म इंडस्ट्री में बहुत कम कलाकार ऐसे हुए हैं जिन्होंने बेकाबू हंसी से लेकर गहरी खामोशी तक के भावों को इतनी सहजता से पर्दे पर उतारा हो। सलीम कुमार का अभिनय सफर सिर्फ एक अभिनेता की कहानी नहीं, बल्कि एक ऐसे कलाकार की यात्रा है जिसने हास्य और संवेदना के बीच की दूरी को मिटा दिया।

मंच से शुरू हुआ सफर

सलीम कुमार ने अपने करियर की शुरुआत मंच से की थी। वह एक प्रतिभाशाली मिमिक्री कलाकार थे, जिन्हें आवाज़ों, हाव-भाव और केरल के आम लोगों की जीवनशैली को मंच पर जीवंत करने की अद्भुत कला हासिल थी।

सिनेमा में आने से बहुत पहले ही उन्होंने दर्शकों के बीच अपनी पहचान बना ली थी। कॉलेज फेस्टिवल, मिमिक्री प्रतियोगिताएं और एर्नाकुलम के सांस्कृतिक मंच उनके शुरुआती प्रशिक्षण केंद्र बने।

एमजी यूनिवर्सिटी यूथ फेस्टिवल में उन्होंने लगातार तीन वर्षों तक प्रथम स्थान हासिल किया। यही वह दौर था जब उन्होंने लोगों के चेहरे, बोलियां, आदतें और व्यवहार को गहराई से समझा, जो बाद में उनके अभिनय की सबसे बड़ी ताकत बने।

नाम के पीछे भी छिपी है एक कहानी

सलीम कुमार का जन्म 10 अक्टूबर 1969 को केरल के एर्नाकुलम जिले के चिट्टाट्टुकारा में गंगाधरन और कौसल्या के घर हुआ था।उनके नाम के पीछे भी एक दिलचस्प कहानी है। उनके पिता समाज सुधारक सहोदरन अय्यप्पन के प्रशंसक थे। उन्होंने अपने बेटे का नाम "सलीम" इसलिए रखा ताकि उसके नाम से किसी विशेष धर्म की पहचान न हो सके।बाद में स्कूल में एक शिक्षक ने उनके नाम के साथ "कुमार" जोड़ दिया और तब से वह "सलीम कुमार" के नाम से जाने जाने लगे।

शादी के अगले दिन मिला पहला फिल्मी मौका

सलीम कुमार के जीवन में सिनेमा लगभग संयोगवश आया। सितंबर 1996 में उनकी शादी सुनीता से हुई और शादी के अगले ही दिन उन्हें एक फिल्म में अभिनय का प्रस्ताव मिला।उनकी पहली फिल्म "इष्टमानु नूरु वट्टम" थी। इसके बाद उन्होंने धीरे-धीरे मलयालम सिनेमा में अपनी पहचान बनाई।

"मीशा माधवन", "कल्याणरामन", "पुलिवाल कल्याणम", "थिलक्कम", "चथिक्कथा चंथु" और "CID मूसा" जैसी फिल्मों ने उन्हें घर-घर में लोकप्रिय बना दिया।वह केवल चुटकुले सुनाने वाले कॉमेडियन नहीं थे, बल्कि फिल्मों की आत्मा बन जाते थे। दर्शक उनके आने का इंतजार करते थे।

अभिनय का बड़ा मोड़

सलीम कुमार के करियर का पहला बड़ा मोड़ 2005 में आया, जब उन्होंने फिल्म "अचनुरंगाथा वीडु" में सैमुअल नामक किरदार निभाया।यह एक यौन उत्पीड़न पीड़िता के संघर्षरत पिता की भूमिका थी। इस किरदार में उन्होंने दर्द, सम्मान और धैर्य को बेहद संवेदनशील तरीके से प्रस्तुत किया।इस भूमिका के लिए उन्हें केरल राज्य फिल्म पुरस्कार (द्वितीय सर्वश्रेष्ठ अभिनेता) मिला और यह साबित हो गया कि वह केवल हास्य अभिनेता नहीं हैं।

"आदमिंटे मकन अबू" ने दिलाया राष्ट्रीय पुरस्कार

इसके बाद उनके करियर की सबसे यादगार फिल्म "आदमिंटे मकन अबू" आई।इस फिल्म में उन्होंने एक बुजुर्ग इत्र विक्रेता अबू का किरदार निभाया, जिसका जीवन भर का सपना हज यात्रा करना था।यह अभिनय पूरी तरह संयम और भावनात्मक गहराई से भरा था। न कोई अतिनाटकीयता, न ऊंची आवाज़ें—सिर्फ आंखों और खामोशी के जरिए भावनाओं को व्यक्त करने की कला।इस भूमिका के लिए वर्ष 2010 में उन्हें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार (सर्वश्रेष्ठ अभिनेता) और केरल राज्य फिल्म पुरस्कार (सर्वश्रेष्ठ अभिनेता) दोनों मिले।आज भी इसे मलयालम सिनेमा के सबसे प्रभावशाली प्रदर्शनों में गिना जाता है।

हास्य पर कभी नहीं खोई पकड़

गंभीर भूमिकाओं में सफलता मिलने के बावजूद उन्होंने हास्य अभिनय नहीं छोड़ा।2013 में फिल्म "अयालुम न्यानुम थम्मिल" के लिए उन्हें केरल राज्य पुरस्कार (सर्वश्रेष्ठ हास्य अभिनेता) मिला।उसी वर्ष उन्हें टेलीविजन क्षेत्र में उत्कृष्ट अभिनय के लिए राज्य टेलीविजन पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया।

निर्देशन और लेखन में भी आजमाया हाथ

सलीम कुमार ने अभिनय के अलावा निर्देशन और लेखन में भी हाथ आजमाया।उनकी कहानी "करुथा जूथन" के लिए उन्हें 2016 में केरल राज्य पुरस्कार (सर्वश्रेष्ठ कहानी) मिला।उन्होंने "कंपार्टमेंट" और "दैवमे कैथोज़म के कुमार आकानम" जैसी फिल्मों का निर्देशन भी किया।हालांकि उनके निर्देशन को मिश्रित प्रतिक्रिया मिली, लेकिन नए प्रयोग करने का उनका साहस हमेशा सराहा गया।

मीम संस्कृति का स्थायी चेहरा

सलीम कुमार सिर्फ फिल्मों तक सीमित नहीं रहे। उनकी अभिव्यक्तियां और संवाद मलयालम सोशल मीडिया और मीम संस्कृति का अभिन्न हिस्सा बन गए।उनकी एक नजर, एक ठहराव या आवाज़ का हल्का सा बदलाव पूरी स्थिति को बयां कर देता था।उनके कई दृश्य आज भी सोशल मीडिया पर व्यापक रूप से इस्तेमाल किए जाते हैं और नई पीढ़ी के बीच उतने ही लोकप्रिय हैं जितने उनके फिल्मी दौर में थे।

हास्य और संवेदना का अनूठा संगम

सलीम कुमार की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि उन्होंने गंभीर अभिनेता बनने के लिए हास्य से दूरी नहीं बनाई।उन्होंने हास्य को और गहराई दी। उनके किरदारों में हंसी और दर्द अक्सर एक साथ मौजूद रहते थे।यही संतुलन उन्हें अपने समकालीन कलाकारों से अलग बनाता था।

56 वर्ष की उम्र में निधन

मलयालम सिनेमा के इस महान कलाकार का 6 जून की रात करीब 10:43 बजे कोच्चि के एक निजी अस्पताल में निधन हो गया।वह निमोनिया का इलाज करा रहे थे। कुछ वर्ष पहले उनका लीवर प्रत्यारोपण (लिवर ट्रांसप्लांट) भी हुआ था। हालत बिगड़ने पर उन्हें वेंटिलेटर सपोर्ट पर रखा गया था।उनके परिवार में पत्नी सुनीता और दो बेटे—चंदू (जो स्वयं अभिनेता हैं) तथा अरोमल—शामिल हैं।

हमेशा जिंदा रहेगी उनकी विरासत

सलीम कुमार भले ही इस दुनिया को अलविदा कह गए हों, लेकिन उनकी विरासत हमेशा जीवित रहेगी।वह सिर्फ एक अभिनेता नहीं थे, बल्कि केरल की सामूहिक स्मृति का हिस्सा बन चुके थे। थिएटर, सिनेमा, टेलीविजन और रोजमर्रा की बातचीत में उनका योगदान हमेशा याद किया जाएगा।उनकी मुस्कान, उनकी अदाकारी और उनके किरदार आने वाली पीढ़ियों को भी हंसाते और भावुक करते रहेंगे।

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