Bandar review: इरादा तो सिस्टम हिलाने का था, पर क्या अपनी ही स्क्रिप्ट में उलझ गए अनुराग कश्यप?
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Bandar review: इरादा तो सिस्टम हिलाने का था, पर क्या अपनी ही स्क्रिप्ट में उलझ गए अनुराग कश्यप?

बंदर का सबसे विचलित करने वाला हिस्सा वह है जो जेल के भीतर घटित होता है। अंडर-ट्रायल जेल के अंदर का संतरी समर को ठीक उसी तरह उठक-बैठक करने को कहता है जैसे एक बंदर करता है।


मशहूर फिल्म निर्माता अनुराग कश्यप हमेशा से ही इंसानी फितरत और समाज के सबसे अंधेरे कोनों को पर्दे पर उतारने के लिए जाने जाते हैं। उनकी फिल्मों में छिपे हुए एजेंडे नहीं होते, बल्कि वे सच को उसी कड़वाहट और गंदगी के साथ पेश करते हैं, जैसी वह असल जिंदगी में होती है। अपनी नई फिल्म/सीरीज 'बंदर' (Bandar) में कश्यप ने एक बार फिर यही किया है। इस बार उनके सह-निर्देशक के रूप में साक्षी मेहता लाउ और लेखक के रूप में सुदीप शर्मा और अभिषेक बनर्जी जैसी बेहतरीन टीम मौजूद है। 136 मिनट की यह फिल्म एक ऐसे दलदल की सैर कराती है, जहां से बाहर निकलने का हर रास्ता सीधे तबाही की ओर जाता है। फिल्म के मुख्य किरदार में बॉबी देओल हैं, जिन्होंने एक ढलते हुए और हताश कलाकार के रूप में अपने करियर का सबसे साहसिक अभिनय किया है।

कहानी एक थके हुए 'शोबिज मंकी' की

फिल्म की कहानी समर मेहरा (बॉबी देओल) के इर्द-गिर्द घूमती है, जो एक अभिनेता और गायक है। समर अब 50 साल का हो चुका है और उसने अपने जीवन और करियर दोनों में बहुत अच्छे दिन देखे हैं। कभी उसके नाम पर हिट फिल्में और सुपरहिट टीवी शो हुआ करते थे, लेकिन अब वह शोहरत पूरी तरह से फीकी पड़ चुकी है, पुरानी हो चुकी है। अब उसकी पहचान सिर्फ इतनी बची है कि उसे शादियों और छोटे-मोटे इवेंट्स में परफॉर्म करने के काम मिल जाते हैं। शारीरिक रूप से समर पूरी तरह टूट रहा है; उसकी पीठ को सीधा रखने के लिए एक मेडिकल ब्रेस (बेल्ट) की जरूरत होती है। मानसिक रूप से वह भयंकर अकेलेपन से जूझ रहा है, जिसे दूर करने के लिए वह अक्सर डेटिंग ऐप्स खंगालता रहता है। वह बरसों से ग्लैमर की दुनिया का हिस्सा रहा है, इसलिए उसमें एक अजीब सा झूठा अहंकार और गर्व बचा हुआ है, लेकिन अंदर से वह हर वक्त लोगों से खुद को सही साबित करने (Validation) की भीख मांगता रहता है।

कुछ भी छुपा नहीं है

अनुराग कश्यप के इस सिनेमा में सतह के नीचे कुछ भी छुपा हुआ नहीं है। यहां सब कुछ सीधे दर्शकों के चेहरे पर मारा गया है। जब समर को पता चलता है कि उसकी नई डेटिंग फ्रेंड खुशी (सबा आजाद) आपसी सहमति के बावजूद किसी और से भी मिल रही है, तो वह अपनी चिढ़ और गुस्से को छुपाने की कोशिश नहीं करता। कहानी में बड़ा मोड़ तब आता है जब पुलिस समर को बलात्कार, ब्लैकमेलिंग और जबरन वसूली के आरोपों में गिरफ्तार कर लेती है। समर खुद को बेगुनाह बताता है और चीखता-चिल्लाता है, लेकिन पुलिस अधिकारी (जितेंद्र जोशी द्वारा अभिनीत) उसके खिलाफ मौजूद आपत्तिजनक सबूतों—एक बेहद स्पष्ट अश्लील तस्वीर और सेक्सटिंग चैट्स—को समर और दर्शकों के सामने जोर-जोर से पढ़कर सुनाता है।

जब समर पर आरोप लगाने वाली महिला गायत्री (सपना पब्बी) की एंट्री होती है, तो उसके जुनूनी और मानसिक रूप से अस्थिर (Borderline Psychotic) व्यवहार को लेकर निर्देशक कोई सस्पेंस नहीं छोड़ते। बार-बार दिखाए जाने वाले विजुअल्स और बैकग्राउंड में बजने वाला डरावना म्यूजिक साफ कर देता है कि यह मामला सीधे तौर पर ब्लैक एंड व्हाइट नहीं है।

जेल की अमानवीय सच्चाई और 'पिंजरे' का सच

'बंदर' का सबसे विचलित करने वाला हिस्सा वह है जो जेल के भीतर घटित होता है। अंडर-ट्रायल जेल के अंदर का संतरी समर को ठीक उसी तरह उठक-बैठक करने को कहता है जैसे एक बंदर करता है। बैरकों के अंदर के शौचालय इस हद तक जाम और गंदे हैं कि गंदगी ऊपर तक तैर रही है, और कैमरा जानबूझकर उस दृश्य पर कुछ सेकंड के लिए टिक जाता है। यह यथार्थवाद (Hyper-realism) दर्शकों को असहज कर देता है।

जेल के अंदर दो कैदी (जिसमें राज बी. शेट्टी और फिल्म निर्माता नटेश हेगड़े ने शानदार कैमियो किया है) एक गाना गाते हैं। उस गाने के बोल सीधे तौर पर कहते हैं कि इस व्यवस्था में प्यार से लेकर संतान तक और खुद यह देश भी सिर्फ एक 'पिंजरा' है। कश्यप अपने मुख्य किरदार के इस जीवंत दुःस्वप्न को दिखाने के लिए डॉक्यु-फिक्शन (Docu-fiction) जैसी तकनीक का इस्तेमाल करते हैं, जो दर्शकों को समर के साथ उस कंक्रीट के फर्श पर घिसटने के लिए मजबूर कर देती है। चाहे पुलिस की संदिग्ध जांच हो या समर की कानूनी टीम द्वारा पूछे जाने वाले ऐसे बारीक सवाल जिन्हें कोई भी इंसान भूल सकता है, फिल्म हर पल जेल के अंदर के मौत जैसे डर को महसूस कराती है।

कलात्मकता बेहतरीन, लेकिन नजरिए की कमी

प्रशांत बिडकर के प्रोडक्शन डिजाइन और सैयद शाज रिजवी की सिनेमैटोग्राफी ने फिल्म को एक बेहद डार्क और रियलिस्टिक लुक दिया है। सान्या मल्होत्रा (समर की बहन के रूप में), इंद्रजीत सुकुमारन और सुकांत गोयल सहित पूरी स्टारकास्ट ने बेहतरीन काम किया है। अनुराग कश्यप ने 'कालापानी' (1996) और 'द नाइट ऑफ' (2016) जैसी सीरीज में दिखाई गई न्यायिक संस्थाओं की अमानवीयता को लिया और उसमें और अधिक आक्रामकता भर दी।

लेकिन फिल्म की मुख्य समस्या यहीं से शुरू होती है। जब फिल्म का पूरा ध्यान सिर्फ और सिर्फ सिस्टम की क्रूरता दिखाने पर टिक जाता है, तो वह यह भूल जाती है कि ऐसी संवेदनशील कहानी में एक से अधिक दृष्टिकोण (Vantage Points) का होना बेहद जरूरी था। समर के अलावा अन्य किरदारों के नजरिए को शामिल न करने से कहानी में जो 'ग्रे शेड' आ सकता था, वह गायब हो गया है और बहस पूरी तरह से एकतरफा बनकर रह जाती है।

कई विचार, लेकिन बारीकियों की अनदेखी

'बंदर' एक साथ कई सामाजिक मुद्दों पर बात करने की कोशिश करती है। यह दिखाती है कि फिल्म इंडस्ट्री के प्रति पूर्वाग्रह (Prejudice) के कारण कैसे कानून समर जैसे इंसान को आसानी से मोहरा बना देता है ताकि समाज के सामने एक कड़ा उदाहरण पेश किया जा सके। यह यह भी बताती है कि आज के 'कैंसल कल्चर' (Cancel Culture) के दौर में आत्म-प्रमाणित सच और जनता की राय के बीच की रेखा कितनी धुंधली हो चुकी है। यह पुरुषों के उस अहंकार और अधिकार की भावना (Entitlement) पर भी चोट करती है जो उन्हें महिलाओं से सहज ही यौन रूप से आक्रामक अनुरोध करने की अनुमति देता है।

हालांकि, फिल्म उस बारीकी (Nuance) को भूल जाती है जो यह तर्क दे सकती थी कि समाज को पश्चाताप और सुधार का मौका देना चाहिए, खासकर तब जब कोई अपराध पूरी तरह से साबित न हुआ हो। फिल्म गायत्री के किरदार को एक स्वतंत्र व्यक्तित्व या उसकी अपनी कोई ठोस वजह देने में नाकाम रहती है, जिससे वह केवल एकतरफा खलनायक बनकर रह जाती है।

क्या यह 'मेन टू' (Men Too) आंदोलन का हिस्सा है?

तो क्या 'बंदर' को उन फिल्मों की श्रेणी में रखा जाना चाहिए जो पुरुषों को पीड़ित दिखाने के लिए 'मी टू' के खिलाफ बनाई जाती हैं? नहीं, यह फिल्म उस संकीर्ण सोच से बहुत आगे की बात करती है। यह कई जगहों पर पुरुषों को भी कटघरे में खड़ा करती है और दिखाती है कि यौन अपराध का आरोपी कोई भी पुरुष कभी अपनी गलती आसानी से स्वीकार नहीं करता। वह हमेशा यही मानता है कि उसने कुछ गलत नहीं किया।

जेल समर के लिए एक ऐसी जगह बन जाती है जहां उसे जीवित रहने के लिए उस अपराध को स्वीकार करना पड़ सकता है जिसे शायद उसने उस भयानक तरीके से अंजाम नहीं दिया था जैसा कि आरोप लगाया गया है। क्या उसका सच किसी और का सच हो सकता है? क्या इस गंदी जगह पर झूठ बोलना ही आपको अधिक सच्चा बनाता है? अगर कहानी इन दार्शनिक और मनोवैज्ञानिक सवालों पर थोड़ा और गहराई से बात करती, तो यह सिर्फ एक विचलित करने वाली फिल्म न रहकर एक कालजयी सिनेमा बन सकती थी।

अंततः, 'बंदर' अपनी बुद्धिमत्ता और ह्यूमिलिटी के घालमेल की कहानी है। यह एक ऐसी दुनिया को दिखाती है जो अनिश्चित, गतिशील और भावनाओं से संचालित है। बॉबी देओल के शानदार अभिनय और अनुराग कश्यप के बेबाक अंदाज के लिए इसे एक बार जरूर देखा जाना चाहिए, बशर्ते आपका दिल मजबूत हो।

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