
2029 या 2034? लोकसभा में मिली हार के बाद अब कब लागू होगा महिला आरक्षण?
गृह मंत्री अमित शाह ने सदन को बार-बार भरोसा दिलाया कि नए परिसीमन से राज्यों के बीच सीटों का मौजूदा अनुपात नहीं बदलेगा और प्रत्येक राज्य की सीटें समान रूप से (50%) बढ़ाई जाएंगी।
भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में गुरुवार का दिन एक दुर्लभ और महत्वपूर्ण घटना का गवाह बना। जब गृह मंत्री अमित शाह और कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने लोकसभा में तीन महत्वपूर्ण विधेयक संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, परिसीमन विधेयक और केंद्र शासित प्रदेश कानून संशोधन विधेयक पेश किए, तो सदन में जो हुआ उसने शुक्रवार को होने वाली असली जंग की तस्वीर साफ कर दी।
आमतौर पर किसी बिल के पेश होने (Introduction) के समय विपक्ष केवल मौखिक विरोध करता है, लेकिन गुरुवार को 'INDIA' गठबंधन ने न केवल विरोध किया बल्कि मतविभाजन (Division of Votes) की मांग कर डाली। हालांकि बिल पेश करने के प्रस्ताव के पक्ष में 251 और विरोध में 185 वोट पड़े, लेकिन इस कदम ने सरकार को स्पष्ट चेतावनी दे दी है: "शुक्रवार की राह आसान नहीं होगी।"
दो-तिहाई बहुमत की असली चुनौती
शुक्रवार शाम 4 बजे जब इन बिलों पर अंतिम मतदान होगा, तब असली चुनौती 'संविधान संशोधन' को लेकर होगी। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 368 के तहत, किसी भी संशोधन को पारित करने के लिए सदन के दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होती है।
गणित समझिए: वर्तमान में लोकसभा की प्रभावी संख्या 540 है (3 सीटें खाली हैं)। दो-तिहाई बहुमत के लिए सरकार को 360 सांसदों के समर्थन की जरूरत है।
एनडीए की स्थिति: भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए के पास केवल 293 सांसद हैं। यानी दो-तिहाई बहुमत के जादुई आंकड़े से सरकार 67 सीटें दूर है।
अगर कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और डीएमके जैसे दल एकजुट रहते हैं, तो सरकार के लिए इस बिल को पास कराना लगभग असंभव है।
विपक्ष का 'ट्रैप' और दक्षिण का डर
मल्लिकार्जुन खड़गे और विपक्ष के अन्य नेताओं ने इस बिल को एक "जाल" करार दिया है। विपक्ष का मुख्य तर्क यह है कि सरकार 2011 की जनगणना के आधार पर परिसीमन करके लोकसभा की सीटें 816 करना चाहती है। विपक्ष का आरोप है कि बिना नई जनगणना (जो 2027 में होनी है) के परिसीमन करना उन राज्यों के साथ अन्याय है जिन्होंने जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर काम किया है, खासकर दक्षिण भारत के राज्य।
अखिलेश यादव, गौरव गोगोई और प्रियंका गांधी जैसे नेताओं ने सरकार की 'राजनीतिक मंशा' पर सवाल उठाए। कांग्रेस सांसद प्रणीति शिंदे ने स्पष्ट कहा, "महिला आरक्षण तो पहले ही 2023 के कानून से संविधान का हिस्सा बन चुका है, यह बिल तो केवल परिसीमन के जरिए देश का राजनीतिक नक्शा बदलने की कोशिश है।"
अमित शाह का आश्वासन और विपक्ष की शंका
गृह मंत्री अमित शाह ने सदन को बार-बार भरोसा दिलाया कि नए परिसीमन से राज्यों के बीच सीटों का मौजूदा अनुपात नहीं बदलेगा और प्रत्येक राज्य की सीटें समान रूप से (50%) बढ़ाई जाएंगी। उन्होंने कहा कि इसका उद्देश्य केवल 2029 के चुनावों से महिलाओं को 33% आरक्षण देना है।
हालांकि, विपक्ष इस आश्वासन को लिखित रूप में बिल में न पाकर संदेहास्पद है। कांग्रेस के केसी वेणुगोपाल और डीएमके के ए. राजा का कहना है कि बिल के मूल पाठ में शाह के आश्वासनों का कोई जिक्र नहीं है। विपक्ष की मांग है कि अगर सरकार गंभीर है, तो वह परिसीमन को हटाकर वर्तमान सीटों पर ही महिलाओं को आरक्षण दे।
क्या रुक जाएगा महिला आरक्षण?
अगर शुक्रवार को संविधान संशोधन विधेयक गिर जाता है, तो भाजपा निश्चित रूप से इसे चुनावी मुद्दा बनाएगी और विपक्ष को 'महिला विरोधी' बताएगी। लेकिन विपक्षी नेताओं का कहना है कि उनके विरोध से महिला आरक्षण नहीं रुकेगा।
जयराम रमेश का तर्क है कि 2023 का मूल कानून (नारी शक्ति वंदन अधिनियम) पहले से ही लागू है। जनगणना आयुक्त के अनुसार, 2027 की जनगणना के आंकड़े समय पर आ जाएंगे, जिससे 2029 के चुनावों से पहले नियमानुसार परिसीमन और आरक्षण संभव होगा। विपक्ष का कहना है कि सरकार सिर्फ जल्दबाजी दिखा रही है ताकि वह 2011 के पुराने आंकड़ों का इस्तेमाल कर सके, जिसमें 'जातिगत आंकड़े' शामिल नहीं हैं।
ओबीसी कोटे की मांग और जाति जनगणना
समाजवादी पार्टी के सांसद सनातन पांडे ने एक और महत्वपूर्ण मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि सरकार 2011 की जनगणना का सहारा इसलिए लेना चाहती है क्योंकि उसमें ओबीसी (OBC) की आबादी का डेटा नहीं है। विपक्ष चाहता है कि 2027 की जनगणना में ओबीसी महिलाओं के लिए "कोटे के भीतर कोटा" सुनिश्चित किया जाए, जिसे टालने के लिए सरकार 2011 के आंकड़ों का इस्तेमाल कर रही है।
एक बड़ा संवैधानिक गतिरोध
शुक्रवार शाम का मतदान केवल एक कानून का फैसला नहीं करेगा, बल्कि यह तय करेगा कि भारत की राजनीति में दक्षिण और उत्तर के राज्यों का संतुलन कैसा रहेगा। यदि बिल गिरता है, तो यह मोदी सरकार के लिए एक बड़ी विधायी हार होगी। वहीं दूसरी ओर, यदि सरकार बैक-चैनल बातचीत से अन्य दलों का समर्थन जुटा लेती है, तो यह उनकी कूटनीतिक जीत होगी। फिलहाल, संसद में सस्पेंस अपने चरम पर है।

