तीस्ता पर चीन को मिली फिर एंट्री, क्या भारत की रणनीतिक बढ़त को लगेगा झटका?
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तीस्ता पर चीन को मिली फिर एंट्री, क्या भारत की रणनीतिक बढ़त को लगेगा झटका?

बांग्लादेश ने तीस्ता परियोजना में चीन की भागीदारी बढ़ाने का फैसला किया है। इससे भारत की रणनीतिक चिंताएं बढ़ी हैं और दक्षिण एशिया में भारत-चीन प्रतिस्पर्धा तेज होने के संकेत मिले हैं।


बांग्लादेश द्वारा तीस्ता नदी व्यापक प्रबंधन एवं पुनर्स्थापन परियोजना में चीन की भागीदारी को दोबारा प्राथमिकता दिए जाने से भारत की रणनीतिक चिंताएँ एक बार फिर गहरा गई हैं। यह परियोजना भारत के लिए इसलिए अत्यंत संवेदनशील मानी जाती है क्योंकि इसका क्षेत्र सिलीगुड़ी कॉरिडोर के बेहद करीब स्थित है। यही संकरा भू-भाग भारत के पूर्वोत्तर राज्यों को देश के बाकी हिस्सों से जोड़ने वाला एकमात्र जमीनी संपर्क मार्ग है।

जानकारों का मानना है कि ढाका का यह फैसला केवल एक बुनियादी ढांचा परियोजना तक सीमित नहीं है, बल्कि यह दक्षिण एशिया में भारत और चीन के बीच बढ़ती भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का भी संकेत देता है। नई दिल्ली को उम्मीद थी कि पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के समर्थन के बाद इस परियोजना में भारत को प्रमुख भूमिका मिलेगी, लेकिन मौजूदा घटनाक्रम ने उस संभावना को काफी हद तक बदल दिया है।

बीजिंग में हुआ नया समझौता

25 जून को बीजिंग में बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान और चीन के जल संसाधन मंत्री ली गुओयिंग के बीच हुई बैठक में दोनों देशों ने नदी प्रबंधन के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने पर सहमति जताई। इस दौरान तीस्ता नदी व्यापक प्रबंधन एवं पुनर्स्थापन परियोजना को भी आगे बढ़ाने का निर्णय लिया गया।

बांग्लादेशी मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, दोनों देशों ने इस परियोजना को संयुक्त रूप से आगे बढ़ाने की प्रतिबद्धता जताई है। इसे ढाका की विदेश नीति में एक महत्वपूर्ण बदलाव के रूप में देखा जा रहा है, जिससे दक्षिण एशिया में भारत और चीन के बीच प्रभाव की प्रतिस्पर्धा और तेज हो सकती है।

क्यों महत्वपूर्ण है तीस्ता नदी?

पूर्वी हिमालय से निकलने वाली तीस्ता नदी भारत के सिक्किम और पश्चिम बंगाल से होकर बांग्लादेश में प्रवेश करती है। पिछले कई दशकों से भारत और बांग्लादेश के बीच इस नदी के जल बंटवारे को लेकर विवाद बना हुआ है।हालांकि, वर्तमान समझौते का महत्व केवल जल बंटवारे तक सीमित नहीं है। यह परियोजना अब सामरिक, आर्थिक और भू-राजनीतिक दृष्टि से भी बेहद महत्वपूर्ण बन चुकी है।

चीन की बढ़ती दिलचस्पी और भारत की चिंता

चीन ने कई वर्ष पहले इस परियोजना में रुचि दिखाई थी। चीनी विशेषज्ञों ने नदी की खुदाई, तटबंध निर्माण, बाढ़ नियंत्रण, सिंचाई व्यवस्था और आधारभूत ढांचे के विकास की विस्तृत योजना तैयार की थी।एक अरब अमेरिकी डॉलर से अधिक लागत वाली इस परियोजना को बांग्लादेश में चीन की सबसे महत्वाकांक्षी नदी प्रबंधन योजनाओं में गिना जाता है।

भारत की चिंता का सबसे बड़ा कारण यह रहा कि परियोजना का क्षेत्र सिलीगुड़ी कॉरिडोर के निकट स्थित है। भारतीय रणनीतिक विशेषज्ञों का मानना था कि यदि चीन यहां अपनी मौजूदगी बढ़ाता है, तो यह भारत की सुरक्षा और सामरिक हितों के लिए चुनौती बन सकता है।

शेख हसीना के कार्यकाल में बदला था समीकरण

जून 2024 में भारत यात्रा के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख हसीना ने तीस्ता नदी के संरक्षण और प्रबंधन के लिए भारत की पहल का स्वागत किया था।प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने घोषणा की थी कि भारत परियोजना का तकनीकी अध्ययन करने के लिए विशेषज्ञों की एक टीम बांग्लादेश भेजेगा।इसके बाद शेख हसीना ने सार्वजनिक रूप से कहा था कि चूंकि नदी का ऊपरी प्रवाह भारत के नियंत्रण में है, इसलिए दीर्घकालिक समाधान और प्रभावी जल प्रबंधन के लिए भारत अधिक उपयुक्त साझेदार होगा।उस समय इसे चीन के लिए कूटनीतिक झटका और भारत की बड़ी रणनीतिक सफलता के रूप में देखा गया था।

सत्ता परिवर्तन के बाद बदली विदेश नीति

शेख हसीना के सत्ता से हटने के बाद बांग्लादेश की विदेश नीति में उल्लेखनीय बदलाव देखने को मिला है।प्रधानमंत्री तारिक रहमान के नेतृत्व वाली नई सरकार ने भारत के साथ संबंध बनाए रखने के साथ-साथ चीन तथा अन्य क्षेत्रीय शक्तियों के साथ भी सहयोग बढ़ाने की नीति अपनाई है।ढाका का कहना है कि उसकी विदेश नीति किसी एक देश या गुट के बजाय राष्ट्रीय आर्थिक हितों पर आधारित होगी। तीस्ता परियोजना को इसी नई नीति का हिस्सा माना जा रहा है।

इस वर्ष की शुरुआत से ही संकेत मिलने लगे थे कि बांग्लादेश इस परियोजना में चीन की भागीदारी को फिर से बढ़ाना चाहता है। हालिया समझौते ने इन अटकलों पर लगभग मुहर लगा दी है।

जल बंटवारा समझौता अब भी अधर में

हालांकि, भारत और बांग्लादेश के बीच लंबे समय से लंबित तीस्ता जल बंटवारा समझौते पर अब भी कोई प्रगति नहीं हुई है।यह मुद्दा पिछले एक दशक से अधिक समय से लंबित है। इसका प्रमुख कारण पश्चिम बंगाल की तत्कालीन तृणमूल कांग्रेस सरकार का विरोध रहा, जिसने आशंका जताई थी कि बांग्लादेश को अधिक पानी देने से राज्य के उत्तरी हिस्सों में कृषि प्रभावित हो सकती है।

भारत के लिए क्या हैं मायने?

भारत के लिए यह घटनाक्रम मुख्य रूप से रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है। यह स्पष्ट संकेत देता है कि बांग्लादेश की नई सरकार अब बड़े बुनियादी ढांचा परियोजनाओं पर निर्णय लेते समय भारत की सुरक्षा संबंधी चिंताओं को पहले जैसी प्राथमिकता नहीं दे रही है।साथ ही यह भी दर्शाता है कि दक्षिण एशिया के कई देश अब उन क्षेत्रों में भी चीन के साथ सहयोग बढ़ाने के इच्छुक हैं, जिन्हें भारत लंबे समय से अपने रणनीतिक प्रभाव क्षेत्र का हिस्सा मानता रहा है।

बांग्लादेश में चीन की मजबूत पकड़

चीन आज बांग्लादेश के सबसे बड़े व्यापारिक साझेदारों में शामिल है और देश के प्रमुख बुनियादी ढांचा निवेशकों में भी उसकी महत्वपूर्ण भूमिका है।चीनी कंपनियाँ बंदरगाहों, पुलों, राजमार्गों, बिजली परियोजनाओं और औद्योगिक पार्कों के निर्माण में सक्रिय रूप से भाग ले रही हैं।बांग्लादेश के लिए चीन की भागीदारी वित्तीय सहायता, आधुनिक तकनीक और परियोजनाओं के तेजी से क्रियान्वयन का अवसर प्रदान करती है। यही कारण है कि तीस्ता परियोजना में चीन की वापसी को ढाका अपनी विकास रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा मान रहा है।

तीस्ता परियोजना क्यों है जरूरी?

हर वर्ष तीस्ता नदी के किनारे बसे हजारों परिवार नदी कटाव और मौसमी बाढ़ से प्रभावित होते हैं।सरकार का मानना है कि इस परियोजना के पूरा होने से सिंचाई व्यवस्था मजबूत होगी, कृषि भूमि का संरक्षण होगा, बाढ़ और नदी कटाव में कमी आएगी तथा उत्तरी बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था को नई गति मिलेगी।हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि तीस्ता नदी की जल संबंधी समस्याओं का स्थायी समाधान भारत की भागीदारी के बिना संभव नहीं है, क्योंकि नदी का अधिकांश जल भारत से होकर ही बांग्लादेश पहुंचता है।

तीस्ता परियोजना अब केवल नदी प्रबंधन या जल बंटवारे का विषय नहीं रह गई है। यह दक्षिण एशिया में भारत और चीन के बीच बढ़ती रणनीतिक प्रतिस्पर्धा का एक महत्वपूर्ण प्रतीक बन चुकी है।बांग्लादेश द्वारा चीन के साथ सहयोग को फिर से प्राथमिकता देना इस बात का संकेत है कि ढाका अपनी विदेश नीति को अधिक स्वतंत्र और आर्थिक हितों पर आधारित बनाना चाहता है। वहीं भारत के लिए यह एक नई रणनीतिक चुनौती है, क्योंकि आने वाले वर्षों में तीस्ता परियोजना को लेकर क्षेत्रीय प्रभाव की प्रतिस्पर्धा और अधिक तीव्र होने की संभावना है।

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